यूपी चुनाव: सपा से सीट शेयरिंग से पहले इन सीटों पर कांग्रेस की नजर, समझिए पूरा गणित
उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन के दो प्रमुख घटक दलों—समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग को लेकर सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। सार्वजनिक मंचों पर भले ही अखिलेश यादव "बात सीट की नहीं, जीत की है" का संदेश दे रहे हों, लेकिन अंदरखाने दोनों खेमों में सीटों की संख्या और चयन को लेकर खींचतान तेज हो चुकी है। कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम और पार्टी रणनीतिकार जहां 150 सीटों पर दावेदारी ठोक रहे हैं, वहीं सपा खेमे से इसे अवास्तविक बताते हुए 30 से 50 सीटों तक सीमित रखने की आवाजें उठ रही हैं। इस गतिरोध के बीच कांग्रेस ने एक चतुर रणनीतिक कार्ड तैयार किया है, जिसके तहत वह सपा के सामने सीधे टकराव से बचते हुए उन सीटों को अपने पाले में लाने की तैयारी कर रही है जहां सपा वर्षों से कमजोर साबित हुई है।
2007 से सपा की कमजोर 100 सीटों पर कांग्रेस की पहली नजर
कांग्रेस के चुनावी रणनीतिकारों ने उत्तर प्रदेश की ऐसी कम से कम 100 विधानसभा सीटों की विस्तृत सूची तैयार की है, जिन पर समाजवादी पार्टी साल 2007 से लेकर अब तक एक बार भी जीत दर्ज नहीं कर सकी है। इनमें दर्जनों सीटें ऐसी हैं जहां सपा के प्रत्याशी मुकाबले में तो रहे, लेकिन चंद हजार वोटों के मामूली अंतर से पिछड़कर चुनाव हारते रहे।
कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व सीट बंटवारे की आधिकारिक मेज पर यही तर्क रखने की तैयारी में है:
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वोट ट्रांसफर का तर्क: इन सीटों पर सपा का अपना कैडर वोट बैंक मौजूद है, लेकिन वह जीत की दहलीज पार करने के लिए नाकाफी रहा है। कांग्रेस का मानना है कि यदि इन सीटों पर उसका प्रत्याशी उतरता है, तो सपा का पारंपरिक वोट और कांग्रेस के साथ जुड़ा सवर्ण व मुस्लिम-दलित वोट मिलकर जीत का अंतर आसानी से पाट सकते हैं।
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कम टकराव वाली रणनीति: इन सीटों पर दावा ठोकने से समाजवादी पार्टी के मौजूदा विधायकों के टिकट कटने का कोई खतरा नहीं होगा, जिससे गठबंधन के भीतर बगावत की आशंका न्यूनतम रहेगी।
86 आरक्षित सीटों पर दावेदारी, दलित वोट बैंक पर कांग्रेस का भरोसा
कांग्रेस की रणनीति का दूसरा सबसे बड़ा आधार प्रदेश की 86 आरक्षित विधानसभा सीटें (84 अनुसूचित जाति और 2 अनुसूचित जनजाति) हैं।
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सपा का पिछला ट्रैक रिकॉर्ड: साल 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा अपने सिंबल पर केवल 16 आरक्षित सीटें ही जीत पाई थी, जबकि भाजपा नीत एनडीए ने 65 सीटों पर एकतरफा कब्जा जमाया था। वहीं 2017 में भाजपा 77 आरक्षित सीटों पर जीती थी।
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'संविधान बचाओ' पिच का असर: कांग्रेस का आंतरिक आकलन है कि लोकसभा चुनाव के बाद दलित मतदाताओं—विशेष रूप से गैर-जाटव और जाटव वर्ग के एक बड़े हिस्से का रुझान तेजी से राहुल गांधी और कांग्रेस की ओर हुआ है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के कमजोर पड़ते जनाधार को देखते हुए कांग्रेस आरक्षित सीटों पर अधिक हिस्सेदारी चाहती है, ताकि वह भाजपा के इस मजबूत गढ़ में सेंध लगा सके।
पश्चिमी यूपी में पूर्व सांसदों और विधायकों की एंट्री से कुनबा बढ़ाने की तैयारी
सीटों पर अपनी दावेदारी को केवल कागजी आंकड़ों तक सीमित न रखकर कांग्रेस जमीनी स्तर पर भी वजन बढ़ा रही है। पार्टी की योजना पश्चिमी उत्तर प्रदेश और रूहेलखंड क्षेत्र में अपना दबदबा साबित करने की है। इसके लिए पश्चिमी यूपी के कई पूर्व सांसदों, कद्दावर पूर्व विधायकों और स्थानीय क्षत्रपों को सिलसिलेवार ढंग से कांग्रेस में शामिल कराने की पटकथा तैयार कर ली गई है। पार्टी रणनीतिकारों का मानना है कि जब मजबूत स्थानीय चेहरों की फौज उनके साथ होगी, तो सपा आलाकमान के लिए कांग्रेस की सीट मांगों को पूरी तरह नजरअंदाज करना नामुमकिन हो जाएगा।
अंतिम फैसला राहुल-अखिलेश के पाले में, लेकिन खींचतान जारी रहने के आसार
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि गठबंधन की औपचारिक बातचीत शुरू होने से लेकर अंतिम मुहर लगने तक दोनों तरफ से दबाव बनाने की राजनीति चलती रहेगी। सपा के सांसद जहां कांग्रेस की स्ट्राइक रेट और 2022 के दो विधायकों के आंकड़े का हवाला देकर उसे बैकफुट पर धकेल रहे हैं, वहीं कांग्रेस लोकसभा चुनाव 2024 के बदले हुए माहौल का हवाला देकर आधी हिस्सेदारी की मांग पर अड़ी है। हालांकि, दोनों ही दल इस बात से भली-भांति वाकिफ हैं कि वोटों के किसी भी तरह के बिखराव का सीधा फायदा सत्ताधारी भाजपा को मिलेगा। ऐसे में तय माना जा रहा है कि सीटों की अंतिम संख्या और पेचदार सीटों का फैसला दोनों दलों के शीर्ष नेता यानी राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अखिलेश यादव ही आमने-सामने बैठकर सुलझाएंगे।