ईरान से भिड़ना अमेरिका को पड़ा भारी, फूंक डाले 45.1 अरब डॉलर; नेपाल की पूरी GDP के बराबर हुआ युद्ध का खर्च
पश्चिम एशिया में ईरान के साथ जारी सैन्य टकराव दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका के सरकारी खजाने पर भारी आर्थिक बोझ साबित हो रहा है। फरवरी 2026 में शुरू हुए इस सैन्य अभियान को सात महीने से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन परिणाम निकलने के बजाय केवल अमेरिकी टैक्सपेयर्स का पैसा पानी की तरह बह रहा है। अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) और कांग्रेस के गैर-पक्षपाती बजट कार्यालय (CBO) द्वारा अमेरिकी संसद के सामने पेश किए गए ताजा वित्तीय आंकड़ों ने वाशिंगटन से लेकर अंतरराष्ट्रीय गलियारों तक हड़कंप मचा दिया है। पेंटागन के नए अनुमानों के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के तहत ईरान के खिलाफ चलाए गए ऑपरेशनों में अमेरिका अब तक 45.1 अरब डॉलर (करीब 4 लाख 30 हजार करोड़ रुपये) स्वाहा कर चुका है। यह आंकड़ा इतना बड़ा है कि यह भारत के पड़ोसी देश नेपाल की पूरी सालाना अर्थव्यवस्था (GDP) के बराबर पहुंच चुका है।
नेपाल की पूरी जीडीपी के बराबर स्वाहा हुआ अमेरिकी रक्षा बजट
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक के आर्थिक अनुमानों के अनुसार, वर्ष 2026 में नेपाल की कुल अनुमानित जीडीपी लगभग 45.8 अरब डॉलर रहने की संभावना है। नेपाल जैसा देश अपनी 3 करोड़ की आबादी के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचा, उद्योग और पूरे साल के बजट को इसी राशि के भीतर संचालित करता है। इसके विपरीत, अमेरिका ने महज 7 महीनों के भीतर एक अकेले क्षेत्रीय सैन्य संघर्ष में 45.1 अरब डॉलर झोंक दिए हैं।
आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि जितने पैसे अमेरिका ने मिसाइलों, गोला-बारूद, लड़ाकू विमानों की उड़ानों और नौसैनिक बेड़े की तैनाती में खर्च किए हैं, उतने धन से नेपाल जैसा एक पूरा नया विकासशील देश खड़ा किया जा सकता था या किसी छोटे देश का कायाकल्प किया जा सकता था। यह चौंकाने वाली तुलना सीधे तौर पर दर्शाती है कि आधुनिक तकनीक से लड़ी जाने वाली जंगें कितनी विनाशकारी और आर्थिक रूप से थका देने वाली होती हैं।
पेंटागन की रिपोर्ट: गोला-बारूद और हथियारों की भरपाई में लगे 28 अरब डॉलर
सीएनएन और अंतरराष्ट्रीय मीडिया द्वारा समीक्षा की गई पेंटागन और यूएस सेंट्रल कमांड (CENTCOM) की रिपोर्ट से इस भारी-भरकम खर्च की पूरी आंतरिक परतें खुली हैं। पेंटागन के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 3 सितंबर तक के प्रत्यक्ष परिचालन में 43.6 अरब डॉलर और अतिरिक्त जेट ईंधन व लॉजिस्टिक्स के लिए 1.5 अरब डॉलर खर्च हुए हैं, जिससे कुल आंकड़ा 45.1 अरब डॉलर पर पहुंच गया।
इस खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा इस्तेमाल किए जा चुके हथियारों और मिसाइलों की भरपाई में गया है। पेंटागन के अनुसार, ईरान समर्थित ठिकानों पर दागी गई क्रूज मिसाइलों और ईरान के ड्रोन व बैलिस्टिक मिसाइल हमलों को हवा में मार गिराने के लिए दागे गए हाई-टेक एयर डिफेंस इंटरसेप्टर (जैसे SM-3 और पैट्रियट मिसाइलें) की जगह नए हथियार खरीदने में ही करीब 28.1 अरब डॉलर का खर्च आ रहा है। इसके अलावा, अभियानों के दौरान नष्ट या क्षतिग्रस्त हुए सैन्य उपकरणों की भरपाई के लिए 4.3 अरब डॉलर और सैन्य अभियानों के दैनिक संचालन में 11.2 अरब डॉलर खर्च किए जा चुके हैं।
असली बिल इससे भी बड़ा, क्षतिग्रस्त ठिकानों की मरम्मत का खर्च शामिल नहीं
कांग्रेसनल बजट ऑफिस (CBO) और रक्षा विश्लेषकों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि 45.1 अरब डॉलर का यह आंकड़ा भी युद्ध का संपूर्ण अंतिम खर्च नहीं है। इस रिपोर्ट में मध्य पूर्व के कई देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों, रडार स्टेशनों और एयरबेस की इमारतों को ईरानी मिसाइलों और ड्रोनों से पहुंचे नुकसान की भविष्य की मरम्मत लागत शामिल नहीं की गई है।
साथ ही, कूटनीतिक मिशनों, विदेशी सहायता और घायल हुए 750 से अधिक अमेरिकी सैनिकों के दीर्घकालिक इलाज और देखभाल का खर्च भी इस बजट से बाहर रखा गया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि जब इन सभी अप्रत्यक्ष नुकसानों का अंतिम ऑडिट होगा, तो यह वॉर-बिल 50 से 60 अरब डॉलर के आंकड़े को भी पार कर सकता है।
हर महीने 2 से 3 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ, अमेरिकी संसद में उठे सवाल
कांग्रेसनल बजट ऑफिस ने अपनी रिपोर्ट में अमेरिकी सांसदों को सचेत किया है कि जब तक यह सैन्य गतिरोध जारी रहेगा, तब तक अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर हर महीने अरबों डॉलर की चपत लगती रहेगी। CBO के आकलन के मुताबिक, यदि संघर्ष की तीव्रता मई और जून के स्तर जैसी सामान्य भी रहती है, तो पेंटागन को हर महीने लगभग 2 अरब डॉलर (करीब 16 हजार करोड़ रुपये से अधिक) अतिरिक्त खर्च करने होंगे। वहीं अगर टकराव जुलाई जैसे भीषण स्तर पर पहुंचता है, तो यह मासिक खर्च बढ़कर 3 अरब डॉलर प्रति माह तक पहुंच जाएगा।
ट्रंप प्रशासन द्वारा कांग्रेस से 87.6 अरब डॉलर के पूरक रक्षा बजट (सप्लीमेंटल एप्रोप्रिएशन) की मांग किए जाने के बाद डेमोक्रेट्स और कई रिपब्लिकन सांसदों ने भी सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं कि बिना किसी स्पष्ट राजनीतिक या रणनीतिक लक्ष्य के कब तक अमेरिकी नागरिकों का टैक्स इस अंतहीन जंग में झोंका जाता रहेगा।
वैश्विक ऊर्जा संकट और घरेलू महंगाई का दोहरा झटका
ईरान से सीधे टकराव का खामियाजा केवल रक्षा बजट तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसने दुनिया भर में और खुद अमेरिका के भीतर भी आर्थिक संकट को गहरा दिया है। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज (हॉर्मुज जलडमरूमध्य) और लाल सागर में शिपिंग लेन बाधित होने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास झूल रही हैं।
ऊर्जा कीमतों में आए इस भारी उछाल के कारण अमेरिका में गैसोलीन की कीमतें बढ़ रही हैं, जिससे मुद्रास्फीति (महंगाई) पर नए सिरे से दबाव बन रहा है। CBO ने अंदेशा जताया है कि इस युद्ध के प्रभाव से अमेरिकी ट्रेजरी बिलों की ब्याज दरें और महंगाई दर अनुमान से अधिक रह सकती हैं। महंगे होते हथियार भंडार, मध्य पूर्व में फंसी नौसेना और नेपाल की पूरी जीडीपी के बराबर स्वाहा हुआ धन यह साबित कर रहा है कि ईरान के साथ यह सैन्य दांव वाशिंगटन के लिए इतिहास के सबसे महंगे और अप्रभावी संघर्षों में से एक बनता जा रहा है।