फ्लाईदुबई विमान में नहीं होते वे 2 पायलट तो... डेडहेडिंग पर सवार थे संकटमोचक, बचा ली सैकड़ों जानें
फ्लाईदुबई की फ्लाइट संख्या FZ1073 (दुबई से तेल अवीव) के कॉकपिट में 36,000 फीट की ऊंचाई पर जो खौफनाक साजिश रची गई थी, उसमें सैकड़ों मासूम जिंदगियों और मौत के बीच का फासला महज कुछ सेकंड का था। जब कट्टरपंथी सोच से ग्रसित ओमानी को-पायलट हमाम अल-हमामी ने इमरजेंसी कुल्हाड़ी से भारतीय मुख्य कैप्टन स्मित मच्छार पर जानलेवा हमला कर विमान के दोनों इंजन बंद करने और उसे तेल अवीव की इमारत से टकराने का प्रयास किया, तब ऐन वक्त पर दो 'देवदूतों' ने इस भयावह अंजाम को टाल दिया।
ये दोनों शख्स कोई आम यात्री नहीं, बल्कि एयरलाइन के ही दो ऑफ-ड्यूटी पायलट थे। यदि उस दिन, उस वक्त वे दोनों उस विमान में मौजूद न होते, तो इतिहास का एक और भयानक 9/11 जैसा विमान हादसा टाला नहीं जा सकता था।
विमान में क्यों सवार थे वे दोनों पायलट? समझिए 'डेडहेडिंग' (Deadheading) का गणित
विमानन की भाषा में इसे 'डेडहेडिंग' (Deadheading) या पोजिशनिंग क्रू कहा जाता है।
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ड्यूटी पर नहीं थे: ये दोनों पायलट उस उड़ान के एक्टिव ऑपरेटिंग क्रू का हिस्सा नहीं थे, बल्कि आम यात्रियों की तरह बिजनेस या इकोनॉमी क्लास की सीटों पर बैठकर सामान्य सफर कर रहे थे।
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सवार होने का कारण: कमर्शियल एयरलाइंस में अक्सर ऐसा होता है कि पायलटों को अपनी अगली निर्धारित ड्यूटी (Next Flight Assignment) के लिए किसी दूसरे शहर या बेस पर पहुंचना होता है। रोस्टर मैनेजमेंट के तहत एयरलाइन अपने पायलट्स और क्रू को अगली फ्लाइट ऑपरेट करने के लिए उसी कंपनी की फ्लाइट में पैसेंजर बनाकर भेजती है।
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संयोग से, इन दोनों योग्य पायलटों को तेल अवीव पहुंचकर वहां से अपनी अगली वापसी उड़ान या आगामी सेक्टर की कमान संभालनी थी। इसी रूटीन ट्रैवल प्रोटोकॉल के चलते वे फ्लाइट FZ1073 में सवार हुए थे।
कॉकपिट का गेट खुला, खून से लथपथ कैप्टन और इन दोनों की एंट्री
जब कॉकपिट के भीतर मुख्य कैप्टन स्मित मच्छार लहूलुहान अवस्था में भी अंतिम सांस तक लड़े और दरवाजा आंशिक रूप से खोलने में कामयाब रहे, तब केबिन में अचानक हड़कंप मच गया था। विमान 16,000 फीट का रोलर-कोस्टर जैसा गोता लगा चुका था और केबिन की इमरजेंसी लाइट्स जल चुकी थीं।
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स्थिति को तुरंत भांपा: एक आम यात्री शायद यह समझ भी नहीं पाता कि हवा में विमान के साथ क्या हो रहा है, लेकिन एक ट्रेंड पायलट के कान इंजन की आवाज में आए बदलाव, जी-फोर्स (G-force) के झटके और कॉकपिट डोर के अनलॉकिंग सिग्नल को एक सेकंड में पहचान लेते हैं।
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कॉकपिट में धावा: जैसे ही कैप्टन का इशारा मिला, इन दोनों ऑफ-ड्यूटी पायलटों ने कुछ दिलेर यात्रियों और केबिन क्रू के साथ मिलकर तुरंत कॉकपिट में प्रवेश किया।
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हमलावर को दबोचा: इन दोनों ने अपनी जान की परवाह किए बिना सिरफिरे को-पायलट अल-हमामी पर झपट्टा मारा, उसके हाथ से हथियार छीना और उसे शारीरिक रूप से पूरी तरह काबू करके फर्श पर गिरा दिया।
कॉकपिट की कमान संभाली और कराई सुरक्षित इमरजेंसी लैंडिंग
हमलावर को बंधक बनाने के बाद सबसे बड़ी चुनौती विमान को क्रैश होने से बचाना और हवा में उसकी दिशा को स्थिर करना था, क्योंकि मुख्य कैप्टन स्मित मच्छार गंभीर रूप से घायल थे।
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इंजन रिस्टार्ट और एटीट्यूड रिकवरी: दोनों डेडहेडिंग पायलटों में से एक ने तुरंत को-पायलट की सीट संभाली और कॉकपिट के कंट्रोल्स को हाथ में लिया। उन्होंने कटऑफ हो चुके इंजन फ्यूल सिस्टम को रिस्टार्ट किया और विमान के नोज-डाउन एंगल को लेवल-ऑफ किया।
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ट्रांसपोंडर कोड 7500 एक्टिव: एयर ट्रैफिक कंट्रोल को तुरंत पहले इमरजेंसी कोड 7700 और फिर विमान अपहरण का अंतरराष्ट्रीय कोड 7500 ब्रॉडकास्ट किया गया।
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तबूक में सुरक्षित लैंडिंग: इन दोनों संकटमोचकों की सूझबूझ और सटीक फ्लाइंग स्किल्स के दम पर विमान को जॉर्डन एयरस्पेस से सुरक्षित मोड़कर सऊदी अरब के तबूक हवाई अड्डे पर कुशलतापूर्वक इमरजेंसी लैंड करा लिया गया।
विमानन विशेषज्ञों का साफ कहना है कि ऑटोमेशन और आधुनिक तकनीक कितनी भी हो, लेकिन उस दिन रोस्टर के तहत सवार हुए वे दो अनचाहे 'डेडहेड पायलट' नियति का ऐसा फैसला साबित हुए, जिन्होंने एक निश्चित सामूहिक मौत के मुंह से विमान और उसमें सवार सैकड़ों यात्रियों को सकुशल बाहर खींच लिया।