H-1B एक्सटेंशन पर बढ़ेगी सख्ती, वर्क परमिट का 540 दिनों का ऑटोमैटिक एक्सटेंशन खत्म

H-1B एक्सटेंशन पर बढ़ेगी सख्ती, वर्क परमिट का 540 दिनों का ऑटोमैटिक एक्सटेंशन खत्म

अमेरिका में काम करने और अपने सपनों को साकार करने में जुटे लाखों भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स और कुशल कामगारों के लिए वॉशिंगटन से एक बड़ी और चिंताजनक खबर सामने आई है। अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) और यूएस सिटिजनशिप एंड इमिग्रेशन सर्विसेज (USCIS) ने वीजा एक्सटेंशन और वर्क परमिट (EAD - एम्प्लॉयमेंट ऑथराइजेशन डॉक्यूमेंट) से जुड़े नियमों को बेहद कड़ा करने का अंतिम फैसला ले लिया है। बाइडन प्रशासन के दौरान लागू किए गए 540 दिनों के ऑटोमैटिक वर्क परमिट एक्सटेंशन के नियम को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है। इसके साथ ही H-1B वीजा एक्सटेंशन की अर्जियों को अब सामान्य रिन्युअल मानने के बजाय पूरी तरह से 'फ्रेश केस' (नए मामले) की तरह गहन जांच के दायरे में लाने की तैयारी कर ली गई है। अमेरिका के तकनीकी हब सिलिकॉन वैली, टेक्सास, न्यू जर्सी और सिएटल से लेकर भारत के बेंगलुरु, हैदराबाद और नोएडा तक फैले टेक जगत में इस नए नियम को लेकर हड़कंप मच गया है।

540 दिनों का ऑटोमैटिक एक्सटेंशन खत्म: क्या था नियम और अब क्या बदल गया?

इस नीतिगत बदलाव को समझने के लिए वर्क परमिट के पुराने नियमों को जानना बेहद जरूरी है। कोरोना काल और उसके बाद यूएसआईएस (USCIS) के दफ्तरों में बैकलॉग और फाइलों के अंबार को देखते हुए पूर्ववर्ती सरकार ने एक विशेष राहत दी थी। इसके तहत यदि किसी विदेशी कर्मचारी का मौजूदा ईएडी कार्ड एक्सपायर हो जाता था और उसने समय रहते रिन्युअल के लिए अर्जी दाखिल कर रखी होती थी, तो उसे अपने रिन्युअल आवेदन के पेंडिंग रहने के दौरान भी अगले 540 दिनों तक बिना किसी रुकावट के कानूनी रूप से नौकरी जारी रखने का अधिकार मिलता था। अब नए अंतिम नियम (फाइनल रूल) के तहत इस 540 दिन की स्वतः मिलने वाली कार्य अवधि को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया गया है। इसका सीधा मतलब यह है कि अगर किसी कर्मचारी का मौजूदा वर्क परमिट खत्म हो गया और रिन्युअल अर्जी स्वीकृत होकर नया कार्ड उसके हाथ में नहीं आया, तो वह कार्ड एक्सपायर होते ही एक दिन भी कानूनी रूप से काम नहीं कर सकेगा और उसे नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है या अनपेड लीव पर जाना पड़ेगा।

H-1B वीजा एक्सटेंशन अब बनेगा 'फ्रेश केस': बढ़ेगी फाइलों की जांच और आरईई (RFE)

नए नियमों का दूसरा सबसे खतरनाक पहलू H-1B वीजा एक्सटेंशन से जुड़ा है। अब तक चली आ रही 'डेफरेंस पॉलिसी' (पुराने अप्रूवल पर भरोसा करने की नीति) को दरकिनार करते हुए अप्रवासन अधिकारियों को निर्देश दिया जा रहा है कि वे वीजा एक्सटेंशन के हर आवेदन को एक नए सिरे से दाखिल याचिका की तरह देखें। इसका सीधा असर यह होगा कि भले ही कोई भारतीय इंजीनियर पिछले 3 या 6 सालों से उसी अमेरिकी कंपनी में उसी पद पर काम कर रहा हो, फिर भी वीजा एक्सटेंशन के समय अमेरिकी प्रशासन दोबारा जांचेगा कि क्या वह पद वाकई 'स्पेशियलिटी ऑक्यूपेशन' (विशेष योग्यता वाली नौकरी) की श्रेणी में आता है या नहीं। इसके साथ ही एम्प्लॉयर-एम्प्लॉई रिलेशनशिप और क्लाइंट साइट लोकेशन से जुड़े दस्तावेजों की कड़ी पड़ताल होगी। आव्रजन विशेषज्ञों का मानना है कि इस नीति से 'रिक्वेस्ट फॉर एविडेंस' (RFE) यानी अतिरिक्त सबूत मांगने के मामलों में अप्रत्याशित उछाल आएगा और वीजा रिजेक्शन की दर में भारी वृद्धि देखने को मिलेगी।

H-4 वीजा धारक जीवनसाथियों पर सबसे बड़ा वज्रपात: करियर और पारिवारिक आय पर संकट

इस नए नियम की सबसे दर्दनाक और प्रत्यक्ष मार H-1B वीजा धारकों के जीवनसाथियों (खासकर पत्नियों) पर पड़ने जा रही है, जो H-4 EAD के तहत अमेरिकी कंपनियों में काम करती हैं। वर्तमान में लाखों भारतीय महिलाएं H-4 वर्क परमिट के जरिए अमेरिकी कॉरपोरेट जगत, वित्तीय संस्थानों और शोध केंद्रों में अपनी सेवाएं दे रही हैं। चूंकि विदेशी कामगार अपने मौजूदा वर्क परमिट की समय सीमा समाप्त होने से 180 दिन (छह महीने) पहले ही रिन्युअल फाइल कर सकते हैं, और दूसरी ओर यूएसआईएस में ईएडी प्रोसेसिंग का औसत समय 8 से 12 महीने या उससे भी ज्यादा चल रहा है, इसलिए 540 दिन का ग्रेस पीरियड हटने से लाखों लोगों का वर्क स्टेटस बीच में ही एक्सपायर हो जाएगा। जब तक नई मंजूरी नहीं मिलेगी, तब तक वे काम नहीं कर सकेंगी। इससे भारतीय परिवारों की दोहरी आय (डबल इनकम) सीधे तौर पर प्रभावित होगी और कई घरों पर होम लोन, बच्चों की पढ़ाई और बुनियादी खर्चों का संकट गहरा जाएगा।

यूएसआईएस का भारी-भरकम बैकलॉग: 4 लाख से ज्यादा फाइलें पहले से पेंडिंग

अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग का तर्क है कि 540 दिनों का ऑटोमैटिक एक्सटेंशन खत्म करने का मकसद सुरक्षा जांच और बैकग्राउंड वेरिफिकेशन को बार-बार और सख्त तरीके से सुनिश्चित करना है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अमेरिकी आव्रजन प्रणाली पहले से ही फाइल पेंडेंसी के भीषण संकट से जूझ रही है। आंकड़ों के मुताबिक, 4 लाख 30 हजार से ज्यादा वर्क परमिट रिन्युअल आवेदन 6 महीने से अधिक समय से लंबित पड़े हैं, जिनमें से 90 हजार से ज्यादा अर्जियां पिछले 18 महीनों से निर्णय की राह देख रही हैं। ऐसी सुस्त और जटिल सरकारी मशीनरी के बीच 540 दिन की ढाल छीन लेने से उन ईमानदार करदाताओं का जीवन दांव पर लग गया है जो सभी कानूनी प्रक्रियाओं का समय पर पालन करते हैं। हालांकि कैलिफोर्निया की फेडरल कोर्ट में इस नीति के खिलाफ कुछ याचिकाएं दायर की गई हैं, लेकिन जब तक देशव्यापी स्टे नहीं मिलता, तब तक यह तलवार कर्मचारियों के सिर पर लटकती रहेगी।

अमेरिकी टेक कंपनियों और अर्थव्यवस्था को भी अरबों डॉलर का झटका

यह नीतिगत बदलाव केवल भारतीय कर्मचारियों के लिए ही नहीं, बल्कि सिलिकॉन वैली की दिग्गज टेक कंपनियों जैसे गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, मेटा, एप्पल और अमेजन के साथ-साथ इन्फोसिस, टीसीएस और विप्रो जैसी वैश्विक आईटी सेवा प्रदाताओं के लिए भी बड़ा झटका है। होमलैंड सिक्योरिटी विभाग के अपने आंतरिक आकलन के अनुसार, वर्क परमिट में आने वाले इस अंतर (गैप) के चलते 20 हजार से 33 हजार कर्मचारियों के परमिट लैप्स हो सकते हैं। इससे अमेरिकी कंपनियों को वर्कफोर्स टर्नओवर और प्रोजेक्ट्स रुकने के कारण 238 मिलियन डॉलर से अधिक की उत्पादकता हानि झेलनी पड़ सकती है। इसके अलावा अचानक खाली हुए पदों पर नए लोगों को तलाशने और लीगल प्रोसेसिंग में करीब 312 मिलियन डॉलर का अतिरिक्त कॉरपोरेट खर्च आएगा। शीर्ष टेक कंपनियों ने अमेरिकी प्रशासन से अपील की है कि वे प्रीमियम प्रोसेसिंग का दायरा बढ़ाएं ताकि योग्य कामगारों को नौकरी गंवाने से बचाया जा सके।

भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए कानूनी सलाह: अब क्या कदम उठाना जरूरी है?

इस बदले हुए माहौल में अमेरिका में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए सतर्कता और कानूनी समयबद्धता ही एकमात्र बचाव का रास्ता है। इमिग्रेशन वकीलों ने भारतीय कामगारों को सलाह दी है कि वे अपने वर्क परमिट और वीजा की एक्सपायरी डेट पर पैनी नजर रखें। जैसे ही उनके दस्तावेज की वैधता में 180 दिन बाकी रह जाएं, पहले ही दिन रिन्युअल की फाइल यूएसआईएस में सबमिट कर दें। इसके अलावा जिन मामलों में प्रीमियम प्रोसेसिंग की सुविधा उपलब्ध है, वहां बिना किसी हिचकिचाहट के अतिरिक्त शुल्क देकर 15 दिनों के भीतर फैसला कराने का विकल्प चुनें। साथ ही अपने नियोक्ताओं के एचआर और लीगल डिपार्टमेंट को पहले से सतर्क रखें ताकि यदि कोई आरईई या ऑडिट नोटिस आता है, तो उसका जवाब बिना देरी के तकनीकी साक्ष्यों के साथ दिया जा सके।