जंग में धोखा देंगे एलन मस्क? यूक्रेन में स्टारलिंक की स्पीड घटाई, ड्रोन मिशन ठप होने पर भड़के राष्ट्रपति जेलेंस्की

जंग में धोखा देंगे एलन मस्क? यूक्रेन में स्टारलिंक की स्पीड घटाई, ड्रोन मिशन ठप होने पर भड़के राष्ट्रपति जेलेंस्की

रूस और यूक्रेन के बीच जारी भीषण जंग के मोर्चे से एक ऐसा बड़ा विवाद सामने आया है जिसने आधुनिक युद्ध में निजी तकनीकी कंपनियों पर निर्भरता को लेकर गंभीर खतरे उजागर कर दिए हैं। अरबपति कारोबारी एलन मस्क की एयरोस्पेस कंपनी स्पेसएक्स (SpaceX) द्वारा संचालित सैटेलाइट इंटरनेट नेटवर्क स्टारलिंक (Starlink) ने अग्रिम मोर्चे पर तैनात यूक्रेनी ड्रोन की इंटरनेट स्पीड पर अचानक पाबंदी लगा दी है। इस अप्रत्याशित फैसले के चलते 160 किलोमीटर प्रति घंटा (लगभग 100 मील प्रति घंटा) से अधिक रफ्तार से उड़ने वाले यूक्रेनी ड्रोन्स का ग्राउंड ऑपरेटरों से संपर्क टूट गया और वे हवा में ही दिशाहीन हो गए। इस तकनीकी नाकेबंदी के कारण रूस के तेज गति वाले ड्रोन्स को ट्रैक करना और उन पर जवाबी हमला करना यूक्रेन के लिए असंभव हो गया, जिसके बाद यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की मस्क और अमेरिकी प्रशासन पर बुरी तरह भड़क उठे हैं।

क्या है पूरा विवाद? 160 किमी/घंटा की स्पीड लिमिट ने कैसे रोकी यूक्रेन की सांसें

यूक्रेनी रक्षा मंत्रालय और सेना के शीर्ष तकनीकी सलाहकारों के अनुसार, मंगलवार की रात बिना किसी पूर्व चेतावनी के स्टारलिंक टर्मिनलों पर एक नया प्रतिबंध लागू कर दिया गया। इसके तहत जैसे ही कोई मानवरहित विमान (ड्रोन) 160 किमी/घंटा की गति सीमा को पार करता, सैटेलाइट से उसकी इंटरनेट कनेक्टिविटी तुरंत कट जाती।

युद्ध के मैदान में इसका विनाशकारी असर देखने को मिला:

  • रूसी ड्रोन्स को रोकने में नाकामी: यूक्रेन पर हमला करने वाले रूसी जेट-पावर्ड और कामिकेज ड्रोन्स 300 किमी/घंटा से अधिक की रफ्तार से उड़ान भरते हैं। यूक्रेन के इंटरसेप्टर ड्रोन्स को उन्हें हवा में नष्ट करने के लिए 200 से 250 किमी/घंटा की रफ्तार से उड़ना पड़ता है। स्पीड कैप लगते ही यूक्रेनी इंटरसेप्टर हवा में अंधे हो गए।

  • ऊर्जा ठिकानों पर भीषण तबाही: जिस रात स्टारलिंक की कनेक्टिविटी पर यह रोक लगी, उसी रात रूसी सेना ने यूक्रेन के ऊर्जा ग्रिडों और बुनियादी ढांचे पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले कर दिए। एयर डिफेंस समन्वय न होने के चलते यूक्रेन कई हमलों को समय पर नहीं रोक सका, जिससे 6 लाख से अधिक लोग अंधेरे में डूब गए।

भड़के जेलेंस्की: बोले- 'यह फैसला कई लोगों की जान ले रहा है'

यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने इस कदम को सामान्य तकनीकी गड़बड़ी मानने से साफ इनकार कर दिया। यूरोपीय नेताओं के सामने प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए जेलेंस्की ने सख्त लहजे में कहा कि जंग के नाजुक मोड़ पर अचानक इस तरह की पाबंदियां लगाना एक बहुत बड़ी गलती है, जो सीधे तौर पर यूक्रेनी नागरिकों और सैनिकों की जान जोखिम में डाल रही है। यूक्रेनी अधिकारियों ने आरोप लगाया कि यह कदम संयोग नहीं हो सकता और इसके पीछे अमेरिकी सत्ता और कूटनीतिक दबाव की बू आ रही है। उन्होंने स्पेसएक्स और नाटो से तत्काल प्रभाव से सभी कृत्रिम गति सीमाओं को हटाने की मांग की है ताकि एयर डिफेंस नेटवर्क को फिर से पूरी तरह बहाल किया जा सके।

एलन मस्क की सफाई: 'स्टारलिंक नहीं, सेना का स्टारशील्ड है; फैसला हमारा नहीं'

यूक्रेन के कड़े विरोध के बाद एलन मस्क ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर सफाई पेश की। मस्क ने दावा किया कि पाबंदी वाणिज्यिक 'स्टारलिंक' पर नहीं, बल्कि सैन्य-ग्रेड उपग्रह नेटवर्क 'स्टारशील्ड' (Starshield) पर लगी है। मस्क के अनुसार:

  • स्टारशील्ड सिस्टम का मालिकाना हक और रणनीतिक नियंत्रण पूरी तरह अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के पास है।

  • मस्क ने दोहराया कि स्टारलिंक एक कमर्शियल सर्विस है, जिसे मानवीय और रक्षात्मक संचार के लिए दिया गया था, न कि आक्रामक मिसाइल हमलों या रूस के भीतर दूरगामी ड्रोन स्ट्राइक को गाइड करने के लिए।

  • हालांकि, पेंटागन और व्हाइट हाउस ने इस पर आधिकारिक तौर पर कोई टिप्पणी करने से परहेज किया है कि क्या यह पाबंदी किसी उच्च-स्तरीय अमेरिकी नीतिगत फैसले का हिस्सा थी।

निजी सैटेलाइट पर यूक्रेन की निर्भरता: भारत के लिए भी बड़ा सबक

फरवरी 2022 में युद्ध की शुरुआत के बाद से ही स्टारलिंक यूक्रेन की सैन्य रीढ़ की हड्डी बना हुआ है। पारंपरिक रेडियो और मोबाइल टावरों के रूसी हमलों में तबाह होने के बाद स्टारलिंक ही यूक्रेनी आर्टिलरी, ड्रोन पायलट्स और फ्रंटलाइन कमांडरों को लाइव डेटा देता रहा है। इस घटना ने साबित कर दिया है कि किसी एक विदेशी अरबपति या निजी तकनीकी कंपनी के रहमो-करम पर राष्ट्रीय सुरक्षा को छोड़ना कितना आत्मघाती हो सकता है।

सैन्य विश्लेषक इसे भारत जैसे संप्रभु देशों के लिए भी एक बड़ी सीख मान रहे हैं। जिस तरह 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान अमेरिका द्वारा जीपीएस (GPS) डेटा रोके जाने के बाद भारत ने अपना स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम 'नाविक' (NavIC) विकसित किया था, उसी तरह अंतरिक्ष संचार और सैटेलाइट इंटरनेट के मामले में भी आत्मनिर्भरता ही राष्ट्रीय सुरक्षा की अंतिम गारंटी है। यदि युद्धकाल में कोई विदेशी कंपनी अपने नियम थोपने लगे, तो पूरा सैन्य अभियान पलक झपकते ही धराशायी हो सकता है।