अमेरिका नहीं जा पाए भारतीय तो यूएस से काम खुद आएगा इंडिया: एचसीएल के पूर्व सीईओ विनीत नायर ने समझाया ग्लोबल टेक शिफ्ट

अमेरिका नहीं जा पाए भारतीय तो यूएस से काम खुद आएगा इंडिया: एचसीएल के पूर्व सीईओ विनीत नायर ने समझाया ग्लोबल टेक शिफ्ट

वैश्विक स्तर पर वीजा नियमों को लेकर बढ़ती अनिश्चितताओं और अमेरिकी संरक्षणवादी नीतियों के बीच सूचना प्रौद्योगिकी (IT) जगत के जाने-माने दिग्गज और एचसीएल टेक्नोलॉजीज (HCL Technologies) के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) विनीत नायर का एक बेहद दिलचस्प और व्यावहारिक नजरिया सामने आया है। नायर का मानना है कि यदि अमेरिका भारतीय टेक पेशेवरों के लिए अपने दरवाजे सीमित करता है या वीजा नियमों को सख्त बनाता है, तो इससे भारत के तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र को घबराने की कोई जरूरत नहीं है। उनका सीधा तर्क है कि यदि भारत के योग्य इंजीनियर और पेशेवर ऑन-साइट काम के लिए अमेरिका नहीं जा सकेंगे, तो अमेरिकी कंपनियों के पास काम को ही आउटसोर्स कर सीधे भारत भेजने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचेगा। यह बदलाव भारतीय प्रौद्योगिकी क्षेत्र के लिए नुकसान के बजाय एक बहुत बड़ा आर्थिक और रणनीतिक अवसर बनकर उभर सकता है।

एच-1बी वीजा प्रतिबंध और ऑन-साइट मॉडल की बदलती हकीकत

पारंपरिक भारतीय आईटी मॉडल लंबे समय से ऑन-साइट तैनाती पर काफी हद तक निर्भर रहा है, जिसके तहत भारतीय टेक कंपनियां अपने इंजीनियरों को अमेरिका भेजकर ग्राहकों के प्रोजेक्ट्स का संचालन कराती थीं। हालांकि, अमेरिकी राजनीति में 'हायर अमेरिकन' नीतियों और वीजा लॉटरी प्रणाली की जटिलताओं के चलते अब यह मॉडल महंगा और जोखिम भरा होता जा रहा है। विनीत नायर के अनुसार, इस पूरे समीकरण में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी 'टैलेंट' यानी प्रतिभा की उपलब्धता है। पश्चिमी देशों में स्टेम (STEM - साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, मैथ्स) स्नातकों की भारी कमी है, जबकि भारत हर साल लाखों कुशल इंजीनियर तैयार करता है। जब कंपनियों को स्थानीय स्तर पर कुशल कार्यबल नहीं मिलता, तो वे भौगोलिक सीमाओं की परवाह किए बिना काम को वहां ले जाती हैं जहां उच्च गुणवत्ता वाली प्रतिभा किफायती लागत पर उपलब्ध हो।

जीसीसी (GCCs) का बूम: बैक ऑफिस से इनोवेशन हब बनता भारत

विनीत नायर के इस आकलन को ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCC) के विस्तार से सीधा समर्थन मिल रहा है। पिछले कुछ वर्षों में भारत केवल तृतीय-पक्ष आईटी सेवा प्रदाताओं तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि फॉर्च्यून 500 की अधिकांश कंपनियों ने बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में अपने इन-हाउस तकनीकी केंद्र स्थापित कर लिए हैं। ये वैश्विक कंपनियां अब जटिल उत्पाद डिजाइन, क्लाउड आर्किटेक्चर, साइबर सुरक्षा और डेटा एनालिटिक्स जैसे मुख्य कार्यों को भारत के इन केंद्रों से संचालित कर रही हैं। यदि वीजा प्रतिबंध बढ़ते हैं, तो अमेरिकी निगम ऑन-साइट टीमों पर निर्भर रहने के बजाय भारत में स्थित अपने कैपेबिलिटी सेंटर्स का आकार और जिम्मेदारी दोनों तेजी से बढ़ाएंगे, जिससे देश में उच्च वेतन वाली नौकरियों का सृजन होगा।

जेनरेटिव एआई और रिमोट वर्क कल्चर ने आसान बनाई राह

कोरोना महामारी के बाद विकसित हुए रिमोट और हाइब्रिड वर्क मॉडल ने वैश्विक कंपनियों को यह सिखा दिया है कि महत्वपूर्ण सॉफ्टवेयर और डिजिटल विकास के लिए ऑन-साइट मौजूदगी हमेशा अनिवार्य नहीं होती। इसके साथ ही जेनरेटिव एआई (GenAI) और क्लाउड कोलैबोरेशन टूल्स ने दुनिया के किसी भी कोने से रियल-टाइम कोडिंग और समस्या निवारण को बेहद सुगम बना दिया है। विनीत नायर के मुताबिक, यह तकनीकी बदलाव भारत के पक्ष में काम कर रहा है। जब प्रोजेक्ट की उत्पादकता और गुणवत्ता भारत की धरती से भी उतनी ही प्रभावी साबित हो रही है, तो अमेरिकी कंपनियों के लिए वीजा स्पॉन्सरशिप और विदेशी जीवन-यापन के महंगे भत्तों को वहन करने का कोई आर्थिक औचित्य नहीं रह जाता।

भारतीय अर्थव्यवस्था और प्रतिभा पलायन (Brain Drain) के लिए वरदान

यदि अमेरिकी परियोजनाएं सीधे भारत की धरती से संचालित होती हैं, तो इसके दूरगामी परिणाम भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बेहद सकारात्मक हो सकते हैं। इससे सबसे बड़ा लाभ 'ब्रेन ड्रेन' यानी प्रतिभा के स्थायी पलायन पर रोक लगने के रूप में सामने आएगा। उच्च कौशल वाले इंजीनियर भारत में रहकर ही वैश्विक स्तर के प्रोजेक्ट्स पर काम कर सकेंगे, देश में अपना वेतन खर्च करेंगे, करों का भुगतान करेंगे और स्थानीय स्टार्टअप इकोसिस्टम को मजबूती देंगे। विनीत नायर का यह दृष्टिकोण संकेत देता है कि वैश्विक संरक्षणवाद चाहे जितनी भी दीवारें खड़ी कर ले, लेकिन प्रतिभा और दक्षता की जरूरत उन सीमाओं को लांघकर भारत के आर्थिक विकास की रफ्तार को नई गति देने का काम करेगी।