बंगाल में राजनीतिक हिंसा के पीड़ितों को सरकारी नौकरी: पिछले 25 साल में जान गंवाने वालों के परिजनों के लिए बड़ा ऐलान

बंगाल में राजनीतिक हिंसा के पीड़ितों को सरकारी नौकरी: पिछले 25 साल में जान गंवाने वालों के परिजनों के लिए बड़ा ऐलान

पश्चिम बंगाल के सियासी और प्रशासनिक हलकों में एक बड़ा नीतिगत कदम सामने आया है। राज्य में पिछले ढाई दशकों (25 वर्षों) के दौरान राजनीतिक प्रतिहिंसा, चुनावी झड़पों और संघर्षों में जान गंवाने वाले लोगों के परिवारों के एक आश्रित सदस्य को सरकारी नौकरी देने की तैयारी की जा रही है। राज्य सचिवालय (नबन्ना) और प्रशासनिक सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, इस प्रस्ताव को लेकर प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ाई जा रही है। बंगाल की राजनीति दशकों से राजनीतिक हिंसा और खूनी संघर्षों के लिए चर्चा में रही है; ऐसे में पीड़ितों के परिजनों को सामाजिक व आर्थिक सुरक्षा देने के उद्देश्य से यह कदम उठाया जा रहा है।

25 वर्षों का दायरा: वाममोर्चा और तृणमूल दोनों दौर के पीड़ित होंगे शामिल

इस घोषणा की सबसे अहम बात इसका समय दायरा है। सरकार की इस पहल के तहत केवल हालिया वर्षों की घटनाएं ही नहीं, बल्कि पिछले 25 वर्षों के दौरान हुई सभी हिंसक वारदातों को शामिल करने की योजना है। इसका मतलब यह है कि वाममोर्चा (लेफ्ट फ्रंट) शासनकाल के अंतिम दशक और उसके बाद तृणमूल कांग्रेस के शासनकाल के दौरान राजनीतिक कारणों से मारे गए नागरिकों व कार्यकर्ताओं के परिवार इसके दायरे में आएंगे। 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद हुई व्यापक चुनाव-बाद हिंसा (Post-Poll Violence) में जान गंवाने वाले कार्यकर्ताओं के परिजनों को भी इस योजना का प्रमुख लाभार्थी माना जा रहा है।

कैसे होगी आवेदन प्रक्रिया? जिला प्रशासन के जरिए नबन्ना पहुंचेगी फाइल

प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, इस योजना को धरातल पर उतारने के लिए सरकार जल्द ही औपचारिक दिशा-निर्देश और विज्ञापन जारी करने वाली है। नौकरी पाने की प्रक्रिया इस प्रकार तय की जा रही है:

  • पीड़ित परिवार को अपने संबंधित जिले के डीएम (जिलाधिकारी) कार्यालय में औपचारिक आवेदन और आवश्यक दस्तावेज जमा कराने होंगे।

  • इन दस्तावेजों में हिंसा में मृत्यु से संबंधित पुलिस एफआईआर, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अन्य कानूनी साक्ष्य शामिल होंगे।

  • जिला प्रशासन इन सभी कागजातों की जमीनी जांच और सत्यापन करेगा।

  • सत्यापन रिपोर्ट तैयार होने के बाद जिला स्तर से सूची अंतिम मंजूरी के लिए राज्य सचिवालय (नबन्ना) भेजी जाएगी, जिसके आधार पर नियुक्ति पत्र जारी किए जाएंगे।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं: विपक्ष ने उठाए सवाल, पीड़ितों ने ली राहत की सांस

इस फैसले के सामने आते ही राज्य की राजनीति में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। पीड़ित परिवारों और उनके सहयोगियों ने इस कदम का स्वागत करते हुए कहा है कि दशकों से राजनीतिक रंजिशों में बर्बाद हुए परिवारों को आखिरकार आजीविका का सहारा मिलेगा। वहीं, विपक्षी दलों ने इस पर सवाल उठाते हुए इसे कानूनी और प्रक्रियात्मक दृष्टि से कसौटी पर परखा है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि सरकारी नौकरियों में बिना प्रतियोगी परीक्षा या स्पष्ट सेवा नियमों के इस तरह की नियुक्तियों की संवैधानिक वैधता और पारदर्शिता की जांच की जानी चाहिए। बहरहाल, बंगाल के चुनावी और राजनीतिक इतिहास में पीड़ितों के पुनर्वास को लेकर यह घोषणा एक बड़े विमर्श का केंद्र बन गई है।