LAC पर क्यों बार-बार टकराते हैं भारत और चीन के सैनिक? अरुणाचल के CM पेमा खांडू ने खोली सीमा विवाद की जमीनी हकीकत

LAC पर क्यों बार-बार टकराते हैं भारत और चीन के सैनिक? अरुणाचल के CM पेमा खांडू ने खोली सीमा विवाद की जमीनी हकीकत

पूर्वोत्तर भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर भारतीय सेना और चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के बीच होने वाले तनाव और आमने-सामने (Face-off) की घटनाओं को लेकर देश और दुनिया में हमेशा भारी उत्सुकता और चिंता रहती है। सीमा पर आखिर ऐसी क्या परिस्थिति बन जाती है कि दोनों महाशक्तियों के जवान एक-दूसरे के बिल्कुल करीब आ जाते हैं और धक्का-मुक्की या झड़प की नौबत आ जाती है? इस संवेदनशील और रणनीतिक सवाल पर अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने बेहद विस्तार और बेबाकी से स्थिति को स्पष्ट किया है। मुख्यमंत्री खांडू, जिनका राज्य चीन के साथ 1,126 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करता है, उन्होंने बताया कि सीमा पर होने वाले इन टकरावों के पीछे कोई अचानक उपजा विवाद नहीं, बल्कि दशकों पुरानी भू-राजनीतिक विसंगतियां और दोनों सेनाओं की भिन्न धारणाएं (Differing Perceptions) सबसे बड़ा कारण हैं।

सीमांकन का अभाव और 'परसेप्शन गैप': जहां दोनों देश अपनी-अपनी जमीन मानते हैं

मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने सीमा विवाद की तकनीकी और जमीनी हकीकत को समझाते हुए बताया कि भारत और तिब्बत (वर्तमान में चीन के कब्जे वाले क्षेत्र) के बीच खींची गई मैकमोहन रेखा को लेकर दोनों देशों के अपने-अपने अलग नक्शे और दावे हैं। एलएसी का बड़ा हिस्सा बर्फ से ढकी विशाल हिमालयी पर्वत श्रृंखलाओं, गहरी घाटियों, घने जंगलों और दुर्गम दर्रों से होकर गुजरता है। इस पूरी सीमा पर दोनों देशों द्वारा जमीनी स्तर पर कोई औपचारिक और पारस्परिक रूप से स्वीकृत सीमांकन (Demarcation on the ground) नहीं किया गया है। इसका सीधा नतीजा यह होता है कि दोनों देशों के बीच कई ऐसे सामरिक इलाके हैं जहां 'परसेप्शन गैप' यानी वास्तविक सीमा रेखा को लेकर अलग-अलग राय है। भारतीय सेना उस बिंदु तक गश्त (पैट्रोलिंग) करती है जहां तक भारत अपनी सीमा मानता है, जबकि चीनी सैनिक उस इलाके तक पेट्रोलिंग करने की कोशिश करते हैं जिसे वे अपना क्षेत्र समझते हैं। जब दोनों देशों की गश्ती टुकड़ियां एक ही समय पर इन विवादित या ओवरलैपिंग पेट्रोलिंग प्वाइंट्स पर पहुंच जाती हैं, तो स्वाभाविक रूप से दोनों सेनाओं के जवान आमने-सामने आ जाते हैं।

तवांग और यांग्त्से की भौगोलिक स्थिति: चोटी पर कब्जे की सामरिक होड़

अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले का यांग्त्से सेक्टर इसका सबसे बड़ा और जीवंत उदाहरण है, जहां दिसंबर 2022 में दोनों देशों के सैनिकों के बीच तीखी झड़प हुई थी। पेमा खांडू ने रेखांकित किया कि यांग्त्से का इलाका समुद्र तल से करीब 17,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। इस चोटी पर जो भी सेना काबिज होती है, उसे आसपास के पूरे इलाके और नीचे की घाटियों पर सीधा सामरिक व विजुअल नियंत्रण मिल जाता है। भारतीय सेना रणनीतिक रूप से इन अहम पर्वत शिखरों पर पूरी मजबूती से तैनात है। चीनी सेना जब भी मौसम का फायदा उठाकर या अंधेरे की आड़ में इन शिखरों की ओर बढ़ने की कोशिश करती है, तो सतर्क भारतीय जवान उन्हें तुरंत रोक देते हैं। मुख्यमंत्री ने जोर देकर कहा कि इस तरह के टकराव भारतीय क्षेत्र के भीतर नहीं होते, बल्कि यह सीमावर्ती गश्ती बिंदुओं पर एक-दूसरे की मौजूदगी का विरोध करने के दौरान सामने आते हैं।

बुनियादी ढांचे की क्रांति: पहले चीनी सेना अंदर घुस आती थी, अब तुरंत मिलता है मुंहतोड़ जवाब

मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने सीमा पर बढ़ते टकरावों का एक सकारात्मक और रणनीतिक पहलू भी सामने रखा। उन्होंने कहा कि 2014 से पहले अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा बेहद कमजोर था। सड़कें बॉर्डर से कई किलोमीटर दूर खत्म हो जाती थीं, जिससे भारतीय सैनिकों को पेट्रोलिंग प्वाइंट्स तक पैदल चलकर पहुंचने में कई दिन लग जाते थे। उस दौर में चीनी सैनिक आसानी से सीमावर्ती इलाकों में गश्त लगाकर पत्थर या निशान छोड़ जाते थे और भारतीय पक्ष को इसकी भनक काफी देर से लगती थी। लेकिन पिछले एक दशक में सीमा पर स्थिति 180 डिग्री बदल चुकी है। बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन (BRO) ने सीमा के अंतिम छोर तक ऑल-वेदर सड़कों, विशाल पुलों और उन्नत हवाई पट्टियों का जाल बिछा दिया है। सेला सुरंग (Sela Tunnel) और नेचिफू सुरंग जैसी विशाल परियोजनाओं ने तवांग तक हर मौसम में भारी हथियारों और सैन्य टुकड़ियों की आवाजाही को बेहद आसान और तेज बना दिया है। इसके अलावा प्रस्तावित 1,700 किलोमीटर लंबे अरुणाचल फ्रंटियर हाईवे से सीमा सुरक्षा और मजबूत हो रही है। अब जैसे ही चीनी सैनिक एलएसी के पास कोई हरकत करते हैं, भारतीय सेना के जवान मिनटों के भीतर मौके पर पहुंचकर उनका रास्ता रोक देते हैं।

'वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम': सरहद के गांव अब वीरान नहीं, देश के 'पहले प्रहरी'

पेमा खांडू ने यह भी साफ किया कि सीमा सुरक्षा केवल सेना के भरोसे नहीं, बल्कि वहां रहने वाली आबादी की खुशहाली से तय होती है। केंद्र सरकार के 'वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम' (VVP) का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि पहले बुनियादी सुविधाओं, बिजली, पानी और इंटरनेट के अभाव में सीमावर्ती गांवों से बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा था, जिससे सीमाएं खाली हो रही थीं। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इन दूरदराज के सीमावर्ती गांवों को देश का 'अंतिम गांव' नहीं बल्कि 'पहला गांव' मानकर विकसित किया जा रहा है। किबिथू, तवांग और मेचुका जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों में 4G कनेक्टिविटी, चौबीसों घंटे बिजली, पक्की सड़कें और होमस्टे पर्यटन को बढ़ावा दिया जा रहा है। खांडू ने कहा कि सीमा पर रहने वाले स्थानीय जनजातीय नागरिक और चरवाहे भारतीय सेना की 'आंख और कान' हैं, जो किसी भी चीनी घुसपैठ की सूचना सबसे पहले सुरक्षा बलों तक पहुंचाते हैं।

ऐतिहासिक संदर्भ: 'हमारा पड़ोसी चीन नहीं, ऐतिहासिक रूप से तिब्बत रहा है'

मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने इतिहास के पन्नों को पलटते हुए एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और ऐतिहासिक तथ्य भी दोहराया। उन्होंने कहा कि अरुणाचल प्रदेश और भारत की जनता को यह याद रखना चाहिए कि ऐतिहासिक रूप से भारत की उत्तरी सीमा तिब्बत के साथ लगती थी, न कि मुख्य भूमि चीन के साथ। 1959 में तिब्बत पर चीनी कब्जे के बाद से ही यह पूरी सीमा एक जटिल सैन्यीकृत क्षेत्र में तब्दील हो गई। 1914 के शिमला समझौते के तहत तय की गई मैकमोहन रेखा को भारत कानूनी और संप्रभु अंतरराष्ट्रीय सीमा मानता है, जबकि बीजिंग की विस्तारवादी मानसिकता इसे स्वीकार करने में आनाकानी करती है। खांडू ने स्पष्ट किया कि अरुणाचल प्रदेश का एक-एक नागरिक खुद को पूरी तरह भारतीय मानता है और राज्य की संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं हो सकता।

स्थापित सैन्य प्रोटोकॉल: बैनर ड्रिल से लेकर फ्लैग मीटिंग तक की प्रक्रिया

एलएसी पर जब भी दोनों गश्ती दल आमने-सामने आते हैं, तो हालात को युद्ध में तब्दील होने से रोकने के लिए दोनों देशों के बीच विस्तृत सैन्य संधियां और प्रोटोकॉल लागू होते हैं। सीएम खांडू और रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, आमने-सामने आने पर दोनों पक्ष 'बैनर ड्रिल' का इस्तेमाल करते हैं, जिसमें अंग्रेजी और चीनी भाषा में लिखे बैनर लहराकर एक-दूसरे को याद दिलाया जाता है कि वे विवादित क्षेत्र में हैं और उन्हें अपनी पुरानी चौकियों पर लौट जाना चाहिए। 1996 और 2005 के द्विपक्षीय समझौतों के तहत एलएसी के दो किलोमीटर के दायरे में आग्नेयास्त्रों (बंदूकों) या गोला-बारूद के इस्तेमाल पर रोक है, यही वजह है कि जवान हथियारों से गोली चलाने के बजाय लाठी-डंडों, धक्का-मुक्की या शारीरिक बल के जरिए एक-दूसरे को पीछे धकेलते हैं। इसके बाद दोनों देशों के स्थानीय सैन्य कमांडर हॉटलाइन पर बात करते हैं और 'बॉर्डर पर्सनल मीटिंग' (BPM) बुलाकर तनाव को शांत करते हैं।

एक इंच जमीन भी नहीं खोई: सेना के शौर्य पर अटूट विश्वास

पेमा खांडू ने देश के नागरिकों को आश्वस्त करते हुए विपक्ष और आलोचकों के उन दावों को सिरे से खारिज कर दिया कि चीन ने अरुणाचल में भारतीय जमीन पर कब्जा कर लिया है। मुख्यमंत्री ने दो-टूक कहा कि भारतीय सेना पूरी मुस्तैदी और आक्रामकता के साथ देश की संप्रभुता की रक्षा कर रही है। आज का भारत 1962 का भारत नहीं है; देश की सीमाओं पर तैनात जवान किसी भी दुस्साहस का माकूल जवाब देने के लिए पूरी तरह सक्षम, आधुनिक हथियारों से लैस और उच्च मनोबल से भरे हुए हैं। जब तक सीमा पर दोनों देशों के बीच औपचारिक सीमांकन पूरा नहीं हो जाता, तब तक इस तरह के फेस-ऑफ होते रहेंगे, लेकिन भारत अपनी एक इंच जमीन पर भी किसी का अवैध कब्जा नहीं होने देगा।