सोनिया गांधी ने दिल खोलकर निभाई दोस्ती, पर ममता ने राहुल गांधी का नाम आते ही दे दिया झटका

सोनिया गांधी ने दिल खोलकर निभाई दोस्ती, पर ममता ने राहुल गांधी का नाम आते ही दे दिया झटका

दिल्ली में आयोजित विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' (INDIA Bloc) की साझा बैठक में मंच पर कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी के बीच जो व्यक्तिगत आत्मीयता और तालमेल देखने को मिला, उसने विपक्षी एकता को एक नई ऊर्जा दी। ममता के कहने पर सोनिया गांधी का मंच पर आना, ममता के भाषण पर सोनिया द्वारा मेज थपथपाना और उनकी पीठ थपथपाकर हौसला बढ़ाना इस बात का गवाह था कि सोनिया गांधी ने पुरानी राजनीतिक दोस्ती निभाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हालांकि, जैसे ही पत्रकारों ने साल 2029 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी को लेकर सवाल पूछा, ममता बनर्जी ने सीधा जवाब टालकर कांग्रेस को एक बार फिर कूटनीतिक झटका दे दिया।

मंच पर दिखी जबरदस्त बॉन्डिंग, सोनिया ने बढ़ाया हौसला

बैठक के दौरान दोनों शीर्ष महिला नेताओं के बीच की केमिस्ट्री ने मीडिया का ध्यान सबसे ज्यादा खींचा:

  • ममता के आग्रह पर आईं सोनिया: सूत्रों के अनुसार, सोनिया गांधी का साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में आने का पहले से कोई औपचारिक कार्यक्रम नहीं था। ममता बनर्जी ने ही जोर देकर उनसे इस साझा मंच पर मार्गदर्शन देने का आग्रह किया था।

  • मेजबानी और समर्थन: प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब ममता बनर्जी चुनाव आयोग और केंद्र सरकार पर हमला बोल रही थीं, तब बगल में बैठीं सोनिया गांधी लगातार मेज थपथपाकर उनके हर तर्क का समर्थन कर रही थीं। भाषण समाप्त होते ही सोनिया ने गर्मजोशी से ममता की पीठ थपथपाई।

2029 में राहुल गांधी पीएम चेहरा? ममता ने साधी चुप्पी

प्रेस वार्ता के बाद जब पत्रकारों ने ममता बनर्जी से सीधा सवाल दागा कि 'क्या 2029 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी इंडिया गठबंधन के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे?', तो ममता ने बेहद सधे अंदाज में इस पर सीधा जवाब देने से परहेज किया:

  • सवाल टालने की रणनीति: ममता ने बिना किसी का नाम लिए मुस्कुराते हुए कहा, "हम कल प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे" और सवाल को आगे बढ़ा दिया।

  • पहले भी दी थी गोलमोल प्रतिक्रिया: कुछ मौकों पर ममता बनर्जी से जब यह पूछा गया था कि 2029 में राहुल या ममता में से कौन उम्मीदवार होगा, तो उन्होंने तंजिया अंदाज में कह दिया था, "आप होंगे, आप"।

  • गठबंधन में नेतृत्व के सवाल पर ममता की यह हिचक दर्शाती है कि वे सोनिया गांधी का व्यक्तिगत तौर पर कितना भी सम्मान करती हों, लेकिन राजनीतिक रूप से राहुल गांधी के एकछत्र नेतृत्व को स्वीकार करने के मूड में वे अब भी नहीं हैं।

कांग्रेस खेमे में हलचल: अधीर रंजन चौधरी ने कसा तंज

ममता बनर्जी के इस टालमटोल भरे रवैये पर कांग्रेस के भीतर भी प्रतिक्रियाएं शुरू हो गई हैं। पश्चिम बंगाल कांग्रेस के कद्दावर नेता अधीर रंजन चौधरी ने ममता बनर्जी पर तीखा हमला बोला:

  • अधीर रंजन ने कहा, "दीदी को आज दिल्ली क्यों आना पड़ा, यह सब जानते हैं। कई तथाकथित नेताओं ने पहले भी राहुल गांधी के नेतृत्व का विरोध किया था, लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि केवल राहुल गांधी ही इस गठबंधन का स्वाभाविक नेतृत्व कर सकते हैं और उन्हें ही सबसे आगे होना चाहिए। यदि ममता ने शुरुआत से राहुल गांधी का खुलकर साथ दिया होता, तो परिस्थितियां अलग होतीं।""

सोनिया से नजदीकी, पर राहुल से दूरी क्यों?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी की सियासत हमेशा से क्षेत्रीय स्वायत्तता और खुद को राष्ट्रीय विकल्प के रूप में बनाए रखने के इर्द-गिर्द रही है।

  1. व्यक्तिगत समीकरण: ममता बनर्जी 1980 और 90 के दशक में राजीव गांधी और सोनिया गांधी के दौर की राजनीति से जुड़ी रही हैं, इसलिए सोनिया गांधी के प्रति उनका व्यक्तिगत आदर हमेशा दिखता है।

  2. नेतृत्व का खुला पेंच: यदि ममता चुनाव से पहले ही राहुल गांधी के नाम पर मुहर लगा देती हैं, तो गठबंधन के भीतर क्षेत्रीय क्षत्रपों (TMC, सपा, DMK, AAP) की सौदेबाजी की ताकत (Bargaining Power) घट जाएगी। यही वजह है कि वे 'मुद्दों पर एकता' तो दिखा रही हैं, लेकिन 'चेहरे के चुनाव' पर गेंद को हमेशा भविष्य के पाले में डाल देती हैं।