अनंत सिंह बनाम नीरज कुमार की पुरानी अदावत और पटना स्नातक सीट पर PK की 'जन सुराज' का सियासी गणित

अनंत सिंह बनाम नीरज कुमार की पुरानी अदावत और पटना स्नातक सीट पर PK की 'जन सुराज' का सियासी गणित

बिहार विधान परिषद (MLC) की पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र सीट पर होने वाले चुनाव ने राज्य के सियासी तापमान को अचानक बढ़ा दिया है। इस मुकाबले की सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि मुख्य लड़ाई एनडीए बनाम महागठबंधन से ज्यादा खुद सत्तारूढ़ जनता दल (यूनाइटेड) के दो दिग्गज चेहरों—मौजूदा एमएलसी व मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार और मोकामा के बाहुबली नेता अनंत सिंह के बीच आमने-सामने आ गई है। पार्टी द्वारा नीरज कुमार को आधिकारिक प्रत्याशी बनाए जाने के बावजूद अनंत सिंह ने उनके खिलाफ खुला मोर्चा खोल दिया है और जन सुराज समर्थित प्रत्याशी डॉ. अनुज कुमार सिंह को खुला समर्थन देकर उनके नामांकन में ताल ठोक दी है। इस बगावत ने जेडीयू आलाकमान को असहज कर दिया है और पटना स्नातक सीट के पारंपरिक समीकरणों को पूरी तरह उलट-पुलट कर रख दिया है।

अनंत सिंह और नीरज कुमार की जंग: किस बात की है यह पुरानी अदावत?

अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच की यह तल्खी किसी तात्कालिक चुनावी टिकट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पटना ग्रामीण, बाढ़ और मोकामा बेल्ट में दशकों से चले आ रहे राजनीतिक व जातीय वर्चस्व की लड़ाई है।

  • वर्चस्व और राजनीतिक प्रभाव की होड़: दोनों नेता मोकामा-बाढ़ के भूमिहार बहुल इलाके से आते हैं। नीरज कुमार हमेशा से नीतीश कुमार के कोर बौद्धिक और वैचारिक सिपहसालार रहे हैं, जबकि अनंत सिंह बाहुबल और जमीनी प्रभाव के दम पर अपनी अलग सल्तनत चलाते रहे हैं।

  • 2019 का AK-47 केस और पुरानी रंजिश: दोनों के बीच टकराव उस वक्त चरम पर पहुंच गया था जब 2019 में अनंत सिंह के लदमा स्थित पैतृक आवास से AK-47 राइफल और हैंड ग्रेनेड बरामद हुए थे। उस दौरान अनंत सिंह ने खुले तौर पर आरोप लगाया था कि उन्हें फंसाने और जेल भिजवाने में नीरज कुमार का हाथ था। अदालत से बरी होने के बाद भी अनंत सिंह के मन से वह गुस्सा शांत नहीं हुआ। अब एमएलसी चुनाव में नीरज कुमार के सामने विरोधी प्रत्याशी को समर्थन देकर अनंत सिंह सीधे तौर पर अपना राजनीतिक हिसाब चुकता करने की कोशिश में हैं।

जेडीयू में सुलह की कोशिशें और डैमेज कंट्रोल का संकट

अनंत सिंह की इस खुली बगावत ने पार्टी सुप्रीमो नीतीश कुमार और संगठन के शीर्ष रणनीतिकारों के माथे पर बल ला दिए हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए पार्टी ने केंद्रीय मंत्री ललन सिंह और वरिष्ठ नेता संजय झा को दोनों के बीच विवाद सुलझाने की जिम्मेदारी दी। हालांकि, कई दौर की बैठकों के बाद भी अनंत सिंह अपने रुख से पीछे हटने को तैयार नहीं दिखे और उन्होंने सार्वजनिक रूप से दोहराया कि वे अनुज सिंह को जिताने के लिए पूरी ताकत झोंकेंगे। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के हस्तक्षेप के बावजूद यह दरार पटने का नाम नहीं ले रही, जिससे संगठन के स्थानीय कैडर और मतदाताओं में भारी भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है।

क्या पटना स्नातक सीट पर प्रशांत किशोर के लिए बन रहा है सबसे बड़ा मौका?

इस अंदरूनी रार का सीधा राजनीतिक लाभ प्रशांत किशोर (पीके) और उनकी नवगठित 'जन सुराज पार्टी' को मिलता दिख रहा है। पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का चरित्र आम विधानसभा चुनाव से बिल्कुल अलग होता है—यहाँ केवल पंजीकृत डिग्रीधारी स्नातक ही वोट डालते हैं। इस वोटर वर्ग में शिक्षित युवा, सरकारी कर्मचारी और शहरी मध्यम वर्ग शामिल है, जो लंबे समय से बिहार में एक नए राजनीतिक विकल्प की तलाश में हैं।

  • वोट बैंक में सीधा बिखराव: जदयू और एनडीए का मुख्य आधार वोट बैंक—विशेषकर अगड़ी जाति और शहरी मतदाता—नीरज कुमार और अनंत सिंह के समर्थित उम्मीदवार के बीच बंटने की पूरी संभावना है।

  • पीके का सधा हुआ दांव: प्रशांत किशोर ने इस सीट पर डॉ. अनुज कुमार सिंह को मैदान में उतारा है। पीके ने चतुराई से अनंत सिंह के समर्थन को 'बिन मांगा आशीर्वाद' की तरह स्वीकार किया है, लेकिन औपचारिक मंचों पर खुद को बाहुबल की राजनीति से अलग दिखाते हुए केवल वैचारिक और विकास के एजेंडे को आगे रख रहे हैं।

  • शिक्षित मतदाताओं में जन सुराज की पैठ: स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में परंपरागत दलगत वफादारी की तुलना में रोजगार, शिक्षा और पलायन जैसे मुद्दे ज्यादा असर डालते हैं। पीके लगातार 10 हजार नौकरियों और व्यवस्था परिवर्तन के जिस नैरेटिव को आगे बढ़ा रहे हैं, वह पटना के युवा ग्रेजुएट्स को आकर्षित कर रहा है।

विधान परिषद चुनाव का यह मुकाबला बिहार की राजनीति के लिए क्यों है अहम?

पटना स्नातक सीट का यह मुकाबला केवल एक एमएलसी सीट जीतने या हारने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आगामी बिहार विधानसभा चुनाव से पहले सत्ता पक्ष की एकजुटता और तीसरे मोर्चे की स्वीकार्यता की पहली अग्निपरीक्षा बन चुका है। यदि जदयू की अंदरूनी कलह का फायदा उठाकर जन सुराज का उम्मीदवार यह सीट निकाल लेता है, तो यह प्रशांत किशोर की पार्टी के लिए राज्य की मुख्यधारा की राजनीति में बेहद मजबूत और औपचारिक शुरुआत साबित होगी। वहीं, यदि नीरज कुमार अपनी सीट बचाने में कामयाब रहते हैं, तो यह अनंत सिंह के राजनीतिक रसूख पर बड़ा सवालिया निशान लगा देगा। यही वजह है कि राजधानी पटना का यह चुनाव इस समय पूरे बिहार के राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है।