TMC विधायक मदन मित्रा ने राजनीति छोड़ने का दिया संकेत; हिंसा और सुरक्षा पर छलका दर्द

TMC विधायक मदन मित्रा ने राजनीति छोड़ने का दिया संकेत; हिंसा और सुरक्षा पर छलका दर्द

पश्चिम बंगाल की राजनीति में अपने बेहद मुखर, बिंदास और जुदा अंदाज के लिए मशहूर कामारहाटी विधानसभा सीट से तृणमूल कांग्रेस (TMC) के वरिष्ठ विधायक मदन मित्रा ने राजनीति से संन्यास लेने का चौंकाने वाला संकेत देकर राज्य के सियासी गलियारों में भारी हलचल पैदा कर दी है। विजयादशमी के पावन अवसर पर अपनी गहरी पीड़ा और क्षोभ व्यक्त करते हुए मदन मित्रा कैमरे के सामने काफी भावुक नजर आए। उन्होंने मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य को अनैतिकता और अवसरवादिता से भरा हुआ करार देते हुए कहा कि आज की राजनीति जिस दिशा में जा रही है, उससे उन्हें घृणा होने लगी है और एक राजनेता के रूप में इस व्यवस्था का हिस्सा बने रहने के कारण अब वे खुद से भी नफरत करने लगे हैं। हालांकि उन्होंने चुनावी राजनीति से हटने को लेकर अभी कोई औपचारिक लिखित इस्तीफा या आधिकारिक घोषणा नहीं की है, लेकिन उनके इस तल्ख और आत्ममंथन से भरे बयान ने सत्ताधारी दल तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान, गुटबाजी और राज्य में जनप्रतिनिधियों की निजी सुरक्षा के गंभीर सवालों को एक बार फिर से सतह पर लाकर खड़ा कर दिया है।

विजयादशमी पर मतदाताओं से न मिल पाने की पीड़ा: हिंसा और जानलेवा हमले के डर से घर में कैद हुए मदन मित्रा

मदन मित्रा ने अपने दिल का दर्द बयां करते हुए खुलासा किया कि वे अपने पूरे राजनीतिक जीवन में पहली बार विजयादशमी के मौके पर अपने उन मतदाताओं और कार्यकर्ताओं से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात नहीं कर सके, जिन्होंने दिन-रात मेहनत करके उन्हें चुनाव में जीत का सेहरा पहनाया था। उन्होंने इसके पीछे का मुख्य कारण बंगाल में लगातार बढ़ती राजनीतिक हिंसा और अपनी सुरक्षा को लेकर उपजी गंभीर चिंताओं को बताया। तृणमूल विधायक ने सनसनीखेज दावा किया कि हाल के दिनों में उन पर जानलेवा हमला करने की सुनियोजित साजिश रची गई थी और उन्हें शारीरिक रूप से खत्म करने की कोशिश हुई थी। मदन मित्रा के अनुसार, उन्होंने इस जानलेवा खतरे के बारे में सीधे मुख्यमंत्री को व्यक्तिगत रूप से अवगत कराया था। उन्होंने बताया कि इस गंभीर शिकायत के बाद मुख्यमंत्री ने राज्य पुलिस प्रशासन को तत्काल उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने और आवश्यक कदम उठाने के कड़े निर्देश भी जारी किए थे, लेकिन जमीनी स्तर पर बने हिंसक और तनावपूर्ण माहौल के चलते वे सार्वजनिक रूप से अपने ही समर्थकों के बीच जाने का जोखिम नहीं उठा सके।

'चावल में कंकड़ बढ़ जाएं तो बिनना नामुमकिन': राजनीति में बढ़ती अनैतिकता से बेहद थके टीएमसी विधायक

लंबे समय तक बंगाल की सत्ता और जनआंदोलनों के केंद्र में रहे मदन मित्रा ने वर्तमान राजनीतिक गिरावट पर गहरा कटाक्ष करते हुए एक मार्मिक उदाहरण दिया। उन्होंने मौजूदा राजनीतिक तंत्र की तुलना चावल में मिले कंकड़ों से करते हुए कहा कि जब चावल की थाली में कंकड़ों की संख्या जरूरत से ज्यादा बढ़ जाती है, तो फिर उन्हें एक-एक करके चुनना और अलग करना पूरी तरह नामुमकिन हो जाता है। उन्होंने कहा कि राजनीति में आज अनैतिक और भ्रष्ट आचरण वाले तत्वों की भरमार हो चुकी है, जिसके चलते ईमानदार और पुराने निष्ठावान नेताओं के लिए काम करना असंभव हो गया है। मदन ने भारी मन से स्वीकार किया कि वे दशकों तक इस व्यवस्था में लड़ने के बाद अब शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह थक चुके हैं। इस घुटन भरे माहौल में बने रहने के बजाय अब वे सक्रिय राजनीतिक जीवन को हमेशा के लिए अलविदा कहने और एकांत की राह चुनने पर बेहद गंभीरता से विचार कर रहे हैं।

गुटबाजी और सत्ता के समीकरणों पर चुप्पी: 'मुश्किल वक्त में ईश्वर के अलावा कोई किसी को आश्रय नहीं देता'

तृणमूल कांग्रेस के भीतर हाल के महीनों में देखे गए शक्ति-संघर्ष और समीकरणों में आए बदलावों को लेकर भी मदन मित्रा से तीखे सवाल पूछे गए। गौरतलब है कि पार्टी के आंतरिक विवादों के बीच मदन मित्रा शुरुआत में ममता बनर्जी के पक्ष में मजबूती से खड़े दिखाई दिए थे, लेकिन बाद के घटनाक्रमों में वे ऋतब्रत गुट के साथ नजर आने लगे थे। जब पत्रकारों ने उनसे इस खेमेबाजी और पाला बदलने की वजह जाननी चाही, तो उन्होंने कोई सीधा या राजनीतिक जवाब देने से साफ तौर पर परहेज किया। मदन मित्रा ने दार्शनिक अंदाज में टिप्पणी करते हुए कहा कि जब जीवन में कठिन और विपरीत परिस्थितियां आती हैं, तो संसार में केवल परमपिता परमेश्वर के अलावा कोई भी इंसान किसी दूसरे को सच्चा आश्रय या सहारा नहीं दे सकता। उनके इस गूढ़ बयान को टीएमसी की अंदरूनी राजनीति में उनके अलग-थलग पड़ने और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के साथ उपजे अविश्वास के रूप में देखा जा रहा है।

ममता बनर्जी और शुभेंदु को विजयादशमी की शुभकामनाएं: 'सत्ता के अहंकार में चूर होकर जनता को न भूलें'

अपने भावुक संबोधन के अंत में मदन मित्रा ने एक अप्रत्याशित कदम उठाते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और भाजपा के कद्दावर नेता व विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी, दोनों को विजयादशमी के पावन पर्व की शुभकामनाएं दीं। राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को एक साथ शुभकामनाएं भेजकर उन्होंने राज्य की तीखी दलगत राजनीति से ऊपर उठने का संदेश दिया। इसके साथ ही उन्होंने सत्ता के शीर्ष पर बैठे तमाम राजनीतिक दिग्गजों को सख्त नसीहत देते हुए अपील की कि किसी भी नेता को सत्ता की ताकत और कुर्सी के अहंकार में इस कदर नहीं डूब जाना चाहिए कि वह उन आम नागरिकों और जनता को ही भूल जाए जिनकी बदौलत वह आज इस मुकाम पर पहुंचा है। मदन मित्रा के इस बयान के बाद अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि तृणमूल कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व अपने इस पुराने और जनाधार वाले सिपहसालार को मनाने के लिए क्या कदम उठाता है या फिर बंगाल की राजनीति से मदन मित्रा का यह चर्चित अध्याय हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा।