वीरेंद्र सहवाग और विजय हजारे के खास क्लब में हुए शामिल, ऐसा करने वाले बने पहले ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी
ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज मैट रेनशॉ ने टेस्ट क्रिकेट के पन्नों पर अपना नाम एक दुर्लभ और ऐतिहासिक उपलब्धि के साथ दर्ज करवा दिया है। लंबे समय से विशेषज्ञ बल्लेबाज के तौर पर अपनी पहचान बनाने वाले रेनशॉ ने गेंद और बल्ले दोनों से ऐसा अप्रत्याशित और असाधारण ऑलराउंड प्रदर्शन पेश किया, जिसने क्रिकेट जगत के बड़े-बड़े दिग्गजों को भी हैरत में डाल दिया। टेस्ट मैच की एक पारी में शानदार शतकीय पारी खेलने के बाद गेंदबाजी में एक पारी के दौरान पांच विकेट चटकाने का करिश्मा कर रेनशॉ ने एक ऐसा दुर्लभ रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया, जो इससे पहले किसी भी ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी के नाम दर्ज नहीं था।
विजय हजारे और वीरेंद्र सहवाग के एलीट क्लब में बनाई जगह
टेस्ट क्रिकेट के डेढ़ सौ से अधिक वर्षों के लंबे इतिहास में बहुत कम ऐसे मौके आए हैं जब किसी खिलाड़ी ने एक ही टेस्ट मुकाबले में शतक लगाया हो और उसी मैच में गेंद से विरोधी टीम के पांच बल्लेबाजों को पवेलियन भी भेजा हो। भारतीय क्रिकेट के महान दिग्गज विजय हजारे ने सबसे पहले यह नायाब कारनामा कर दिखाया था। इसके बाद विस्फोटक ओपनर वीरेंद्र सहवाग ने भी अपने पार्ट-टाइम ऑफ-स्पिन कौशल से एक टेस्ट मैच में शतक जड़ने के साथ-साथ पारी में पांच विकेट लेकर इस बेहद खास एलीट क्लब में अपना नाम दर्ज कराया था। अब ऑस्ट्रेलिया के मैट रेनशॉ भी विजय हजारे और वीरेंद्र सहवाग जैसे दिग्गजों की जमात में शामिल हो गए हैं।
ऑस्ट्रेलिया के 148 साल के टेस्ट इतिहास में पहला अवसर
ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट का इतिहास एक से बढ़कर एक महान ऑलराउंडरों—जैसे कीथ मिलर, रिकी पोंटिंग, शेन वॉटसन और स्टीव वॉ—से भरा पड़ा है। इसके बावजूद टेस्ट क्रिकेट के 148 साल के समृद्ध ऑस्ट्रेलियाई इतिहास में कोई भी खिलाड़ी एक ही टेस्ट मैच में शतक बनाने और उसी मुकाबले में पारी में फाइफर (5 विकेट) लेने का दोहरा कमाल नहीं कर सका था। मैट रेनशॉ, जिन्हें आमतौर पर मुख्य रूप से शीर्ष क्रम या मध्यक्रम के बल्लेबाज के रूप में ही देखा जाता रहा है, उन्होंने इस मिथक को तोड़ते हुए ऑस्ट्रेलिया के लिए यह ऐतिहासिक मील का पत्थर पार किया। इस दोहरे प्रदर्शन ने उन्हें ऑस्ट्रेलियाई टेस्ट इतिहास में एक अनूठे स्थान पर ला खड़ा किया है।
बल्ले से ठोस पारी और फिर फिरकी से पलटा मुकाबले का पासा
मुकाबले की शुरुआत में मैट रेनशॉ ने अपनी तकनीक, संयम और अनुशासन का परिचय देते हुए क्रीज पर लंबा समय बिताया और शानदार शतकीय पारी खेलकर टीम को एक मजबूत स्कोर तक पहुंचाया। उनकी यह पारी टीम के लिए बेहद नाजुक मोड़ पर आई थी, जहां एक छोर से विकेटों के पतन के बीच उन्होंने पारी को संभाला। लेकिन मैच का असली रोमांच तब देखने को मिला जब टीम को विरोधी बल्लेबाजों की मजबूत साझेदारी तोड़ने के लिए अतिरिक्त गेंदबाजी विकल्प की दरकार थी। कप्तान ने रेनशॉ के हाथों में गेंद थमाई और उन्होंने अपनी सटीक लाइन-लेंथ और टर्न से विरोधी बल्लेबाजों को पूरी तरह चकमा दे दिया। उन्होंने एक के बाद एक विरोधी बल्लेबाजों को पवेलियन भेजते हुए अपने करियर का पहला टेस्ट फाइफर मुकम्मल किया।
करियर के लिए टर्निंग पॉइंट और चयनकर्ताओं का बदला नजरिया
मैट रेनशॉ के अंतरराष्ट्रीय करियर में पिछले कुछ वर्षों में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं। घरेलू शेफील्ड शील्ड टूर्नामेंट में लगातार रन बनाने के बावजूद राष्ट्रीय टीम में नियमित जगह पक्की करने के लिए उन्हें कड़ा संघर्ष करना पड़ा था। इस मैच में किए गए इस अप्रत्याशित ऑलराउंड प्रदर्शन ने न सिर्फ उनके करियर को एक नई संजीवनी दी है, बल्कि ऑस्ट्रेलियाई चयनकर्ताओं और टीम मैनेजमेंट को भी यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि वे केवल एक शुद्ध बल्लेबाज नहीं, बल्कि दबाव के पलों में अहम विकेट चटकाने वाले एक उपयोगी पार्ट-टाइम गेंदबाज भी साबित हो सकते हैं।
क्रिकेट विश्लेषकों और दिग्गजों की ओर से सराहना
रेनशॉ के इस दुर्लभ कीर्तिमान के बाद दुनिया भर के क्रिकेट जानकारों और पूर्व दिग्गजों ने उनकी जमकर तारीफ की है। विश्लेषकों का कहना है कि टेस्ट क्रिकेट में जब कोई पार्ट-टाइम गेंदबाज इस तरह की मैच-विनिंग भूमिका निभाता है, तो टीम का संतुलन कई गुना बढ़ जाता है। सहवाग और हजारे जैसे दिग्गजों की बराबरी करना किसी भी खिलाड़ी के लिए गर्व की बात है, और रेनशॉ का यह ऐतिहासिक प्रदर्शन आने वाले कई दशकों तक ऑस्ट्रेलियाई टेस्ट क्रिकेट की सबसे यादगार और अनोखी व्यक्तिगत उपलब्धियों में गिना जाएगा।