अखिलेश यादव ने राज्यसभा चुनाव से खींचे पांव; सपा से नहीं उतरेगा तीसरा प्रत्याशी

अखिलेश यादव ने राज्यसभा चुनाव से खींचे पांव; सपा से नहीं उतरेगा तीसरा प्रत्याशी

उत्तर प्रदेश से राज्यसभा की 10 सीटों के लिए चल रही सियासी शह और मात के खेल में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बड़ा यू-टर्न लेते हुए अपने कदम पीछे खींच लिए हैं। नामांकन के आखिरी दिन तक इस बात की अटकलें लगाई जा रही थीं कि सपा संख्याबल जुटाकर तीसरे प्रत्याशी के जरिए एनडीए खेमे में हलचल पैदा करेगी। लेकिन सुबह होते ही अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक लाइन का बयान जारी कर पूरे सियासी समीकरण को एक झटके में बदल दिया।

अखिलेश यादव ने लिखा—"अब हमारी निगाह तीन पर नहीं, चार सौ तीन पर है।"

सपा प्रमुख के इस ऐलान के साथ ही उत्तर प्रदेश में मतदान की संभावना खत्म हो गई है और सभी 10 सीटों पर प्रत्याशियों का निर्विरोध चुना जाना तय हो गया है। जहां भाजपा के सभी 8 प्रत्याशी आसानी से संसद पहुंच रहे हैं, वहीं सपा के दोनों आधिकारिक उम्मीदवार—प्रो. रामगोपाल यादव और धनराज परिमल नथवानी—भी बिना किसी मुकाबले के उच्च सदन के सदस्य बन जाएंगे।

क्यों पीछे हटे अखिलेश? क्या था 37 वोटों का अंकगणित

सियासी गलियारों में चर्चा थी कि सपा तीसरे उम्मीदवार के तौर पर किसी मजबूत चेहरे को उतारकर भाजपा खेमे में सेंध लगाने की फिराक में थी। लेकिन जमीनी गणित के मुताबिक एक सीट जीतने के लिए कम से कम 37 प्रथम वरीयता वोटों की दरकार थी।

403 सदस्यीय उत्तर प्रदेश विधानसभा में संख्याबल का गणित पूरी तरह अखिलेश के खिलाफ जा रहा था:

  • सपा गठबंधन: सपा के पास कागजों पर 101 विधायक और कांग्रेस के 2 विधायक मिलाकर कुल 103 वोट थे। दो उम्मीदवारों (रामगोपाल यादव और धनराज नथवानी) को जिताने के लिए 74 वोटों की जरूरत थी, जिसके बाद सपा के पास केवल 29 सरप्लस वोट बचते थे।

  • घाटा और बागी विधायक: तीसरे उम्मीदवार को निकालने के लिए सपा को कम से कम 8 से 9 अतिरिक्त वोटों की आवश्यकता थी। इससे भी बड़ा झटका तब लगा जब सपा के बागी विधायकों (मनोज पांडेय, अभय सिंह और राकेश सिंह) के साथ-साथ एक अन्य विधायक विनोद चतुर्वेदी की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की खबरें सामने आईं।

सपा आलाकमान को यह स्पष्ट हो गया कि यदि तीसरा प्रत्याशी उतारा गया तो पिछले राज्यसभा चुनाव की तरह पार्टी में फिर से क्रॉस वोटिंग हो सकती है और फजीहत झेलनी पड़ सकती है। इस संभावित सियासी नुकसान से बचने के लिए अखिलेश ने व्यावहारिक रुख अपनाते हुए मैदान छोड़ना ही बेहतर समझा।

एनडीए का मजबूत किला: 293 विधायकों का अटूट समर्थन

दूसरी तरफ, सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के पास 291 विधायक (भाजपा के 255 सहित) और जनसत्ता दल (लोकतांत्रिक) के 2 विधायकों का समर्थन मिलाकर कुल 293 विधायकों का ठोस संख्याबल था।

भाजपा ने अपने 8 उम्मीदवारों—धर्मपाल सिंह, राधाकांत ओझा, प्रकाश पाल, विद्यासागर सोनकर, गोपी कृष्ण पांडेय, प्रियंका सिंह रावत, राम प्रताप सिंह चौहान और श्रुति गंगवार—को मैदान में उतारा है। 8 सीटों के लिए भाजपा को 296 वोटों की जरूरत थी, जिसे एनडीए आसानी से जुटाने की स्थिति में था। सपा के तीसरे उम्मीदवार न उतारने से भाजपा को क्रॉस वोटिंग या जोड़-तोड़ की मशक्कत से पूरी तरह मुक्ति मिल गई।

'3 नहीं 403': 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव का शंखनाद

अखिलेश यादव के इस बयान का सियासी निहितार्थ बेहद गहरा माना जा रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के बूते 37 सीटें जीतकर उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बनने वाली सपा अब किसी भी हाल में अपना मोमेंटम नहीं खोना चाहती।

सपा की रणनीति यह है:

  1. विधायकों में टूट का खतरा टला: तीसरे उम्मीदवार की जिद में पार्टी के बाकी विधायकों की वफादारी का सार्वजनिक इम्तिहान लेने से पार्टी बच गई।

  2. संगठन पर फोकस: 403 विधानसभा सीटों पर अभी से बूथ स्तर की कमेटियों को मजबूत करना और प्रत्याशियों की स्क्रीनिंग शुरू करना।

  3. मुद्दों की राजनीति: बेरोजगारी, पेपर लीक, महंगाई और कानून-व्यवस्था के मुद्दों पर योगी सरकार को घेरने की मुहिम जारी रखना।

सत्ता पक्ष का तंज: ओपी राजभर बोले- 'हो गया टांय-टांय फिस्स'

अखिलेश यादव के इस ऐलान के बाद सत्ता पक्ष ने सपा पर तीखा हमला बोला है। उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री और सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने सोशल मीडिया पर तंज कसते हुए लिखा—"बस हो गया टांय-टांय फिस्स! वैसे कभी-कभी ही सही, आप कुछ समझदारी का काम भी कर ही लेते हैं, जैसे आज किया। रही बात 403 की, तो बस यही कहूंगा कि सपने देखना बुरी बात नहीं है।"

वहीं, भाजपा के नवनिर्वाचित होने जा रहे प्रत्याशियों ने भी सपा पर हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि सपा केवल धनवानों को टिकट देती है और कार्यकर्ताओं की अनदेखी करती है।

फिलहाल, उत्तर प्रदेश की राज्यसभा जंग बिना किसी चुनावी घमासान के शांत हो गई है। अखिलेश यादव ने राज्यसभा की एक सीट गंवाने का जोखिम टालकर अपना पूरा दांव 2027 के लखनऊ के सिंहासन यानी 403 विधानसभा सीटों की महालड़ाई पर लगा दिया है।