'अल्लाहू अकबर' बोलकर 13 जवानों को भूनने वाले आतंकी को सजा-ए-मौत: ट्रंप ने दी फायरिंग स्क्वॉड से उड़ाने की मंजूरी

'अल्लाहू अकबर' बोलकर 13 जवानों को भूनने वाले आतंकी को सजा-ए-मौत: ट्रंप ने दी फायरिंग स्क्वॉड से उड़ाने की मंजूरी

अमेरिका के इतिहास के सबसे घातक सैन्य आतंकी हमलों में से एक 'फोर्ट हुड गोलीबारी कांड' (Fort Hood Shooting) के गुनहगार को 17 साल बाद उसके किए की अंतिम सजा मिलने जा रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2009 में टेक्सास के फोर्ट हुड सैन्य अड्डे पर 13 लोगों का कत्लेआम करने वाले पूर्व आर्मी मेजर और सैन्य मनोचिकित्सक निदाल मलिक हसन (Nidal Malik Hasan) की सजा-ए-मौत (Death Penalty) के वारंट को औपचारिक मंजूरी दे दी है।

पेंटागन के प्रवक्ता शॉन पार्नेल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जानकारी देते हुए बताया कि रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ (Pete Hegseth) की आधिकारिक सिफारिश के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने निदाल हसन को अमेरिकी सेना के 'फायरिंग स्क्वॉड' (गोली मारने वाले दस्ते) द्वारा मौत की सजा देने के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। प्रवक्ता ने लिखा—"हसन के लिए आखिरकार इंसाफ (Judgement Day) का दिन आ गया है। आर्मी सेक्रेटरी जल्द ही उसकी मौत की सजा का समय और स्थान निर्धारित करेंगे।"

यह फैसला अमेरिकी सैन्य इतिहास में एक अभूतपूर्व मोड़ है, क्योंकि अमेरिकी सेना में पिछले 65 वर्षों (1961 के बाद) में किसी भी सैन्य कैदी को सजा-ए-मौत नहीं दी गई है।

5 नवंबर 2009 का खौफनाक मंजर: 'अल्लाहू अकबर' चिल्लाते हुए बरसाई थीं गोलियां

यह नरसंहार 5 नवंबर 2009 को टेक्सास के किलीन स्थित फोर्ट हुड सैन्य ठिकाने के 'सोल्जर रेडीनेस सेंटर' में हुआ था। उस समय अफगानिस्तान और इराक जाने की तैयारी कर रहे निहत्थे अमेरिकी सैनिक अपनी मेडिकल जांच और कागजी प्रक्रिया पूरी करा रहे थे।

तभी वहां तैनात मेजर और आर्मी साइकियाट्रिस्ट निदाल हसन हाथ में सेमी-ऑटोमैटिक पिस्तौल लेकर अंदर दाखिल हुआ। हसन अचानक एक टेबल पर चढ़ा और उसने अरबी में 'अल्लाहू अकबर' का नारा बुलंद करते हुए अंधाधुंध गोलियां बरसानी शुरू कर दीं।

  • हसन ने करीब 10 मिनट तक लगातार 200 से अधिक राउंड फायर किए।

  • इस आतंकी हमले में 13 लोगों की दर्दनाक मौत हुई, जिनमें 12 अमेरिकी सैनिक (एक गर्भवती महिला सैनिक सहित) और 1 असैन्य कर्मचारी शामिल था।

  • हमले में 32 से अधिक जवान और नागरिक गंभीर रूप से घायल हो गए।

  • बेस के नागरिक पुलिस अधिकारियों द्वारा जवाबी फायरिंग में हसन को चार गोलियां लगीं, जिससे वह कमर के नीचे से हमेशा के लिए लकवाग्रस्त (Paralyzed) हो गया और उसे व्हीलचेयर पर ले जाया गया।

अल-कायदा और अनवर अल-अव्लाकी से जुड़ा था कनेक्शन

जांच में सामने आया कि अमेरिकी मूल का फिलिस्तीनी नागरिक निदाल हसन कट्टरपंथी विचारधारा से ग्रस्त था और इराक-अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना की तैनाती का घोर विरोधी था। वह यमन में छिपे अल-कायदा के खूंखार आतंकी धर्मगुरु अनवर अल-अव्लाकी के सीधे ईमेल संपर्क में था (जिसे बाद में अमेरिकी ड्रोन स्ट्राइक में मार गिराया गया था)।

सैन्य अदालत (Court-Martial) में 2013 में चले मुकदमे के दौरान हसन ने अपना बचाव करने से इनकार कर दिया था। उसने अदालत में गर्व से स्वीकार किया था कि उसने अपने 'मुस्लिम भाइयों' की रक्षा के लिए अमेरिकी सैनिकों पर गोलियां चलाईं। 13 सदस्यीय सैन्य जूरी ने उसे सर्वसम्मति से मौत की सजा सुनाई थी, जिसके बाद से वह कंसास स्थित फोर्ट लीवेनवर्थ की अत्यधिक सुरक्षित सैन्य जेल (Military Death Row) में बंद था।

फायरिंग स्क्वॉड से क्यों दी जाएगी सजा?

अमेरिका में सैन्य कानून (UCMJ) के तहत किसी भी फौजी को दी गई मौत की सजा को तब तक तामील नहीं किया जा सकता जब तक कि देश का राष्ट्रपति (कमांडर-इन-चीफ) उस पर व्यक्तिगत रूप से हस्ताक्षर न कर दे। पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा और जो बाइडन के कार्यकालों के दौरान हसन की कानूनी अपीलों और समीक्षाओं के चलते यह मामला लटका रहा। मार्च 2025 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा उसकी अंतिम अपील खारिज किए जाने के बाद कानूनी अड़चनें पूरी तरह खत्म हो गई थीं।

हाल ही में अमेरिकी सेना ने निष्पादन विधियों (Methods of Execution) में जहरीले इंजेक्शन के साथ-साथ 'फायरिंग स्क्वॉड' को फिर से अधिकृत किया था। रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने आतंकी अपराध की गंभीरता और फौजी वर्दी के साथ किए गए धोखे को देखते हुए हसन के लिए फायरिंग स्क्वॉड की सिफारिश की, जिसे ट्रंप ने स्वीकार कर लिया।

1961 के बाद पहली सैन्य सजा: क्या है इसका इतिहास?

अमेरिकी सेना ने आखिरी बार किसी सैनिक को मौत की सजा 13 अप्रैल 1961 को दी थी। तब सेना के जवान जॉन ए. बेनेट को एक 11 वर्षीय ऑस्ट्रियाई बच्ची के साथ बलात्कार और हत्या के प्रयास के जुर्म में फोर्ट लीवेनवर्थ में फांसी दी गई थी।

इसके बाद पिछले 65 सालों से अमेरिकी सैन्य डेथ रो पर किसी भी कैदी को मौत के घाट नहीं उतारा गया था। निदाल हसन को सजा दिए जाने के साथ ही अमेरिकी सेना का छह दशक से अधिक लंबा यह अंतराल समाप्त हो जाएगा। फोर्ट हुड नरसंहार में जान गंवाने वाले शहीदों के परिवारों ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि लंबे और दर्दनाक इंतजार के बाद आखिरकार उनके आंसुओं को न्याय मिला है।