'टांय-टांय फिस्स...': सपा का तीसरा राज्यसभा कैंडिडेट नहीं उतरने पर राजभर का अखिलेश पर तंज
उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की 10 सीटों के चुनाव में समाजवादी पार्टी (सपा) द्वारा तीसरा उम्मीदवार न उतारने के फैसले के बाद सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के नेताओं ने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव पर सियासी तीरों की बौछार कर दी है। नामांकन के आखिरी दिन तक एनडीए खेमे में सेंधमारी और तीसरा प्रत्याशी लड़ाने का सस्पेंस बनाए रखने वाली सपा ने जब अचानक कदम पीछे खींच लिए, तो योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने सोशल मीडिया पर बेहद चुटीले अंदाज में अखिलेश यादव पर निशाना साधा।
अखिलेश यादव ने सुबह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा था कि "अब हमारी निगाह तीन पर नहीं, चार सौ तीन पर है"। इसके ठीक बाद ओपी राजभर ने अखिलेश के इस बयान को री-पोस्ट करते हुए तंज कसा—"मित्र अखिलेश जी, बस हो गया टांय-टांय फिस्स! वैसे कभी-कभी ही सही, आप कुछ समझदारी का काम भी कर ही लेते हैं। जैसे आज किया। रही बात 403 की तो बस यही कहूंगा कि सपने देखना बुरी बात नहीं है।" राजभर के इस तीखे कटाक्ष ने यूपी की सियासी चर्चाओं का तापमान चढ़ा दिया है।
'सपा का दांव हुआ फेल, हार के डर से भागे अखिलेश': राजभर का हमला
ओपी राजभर ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि समाजवादी पार्टी पिछले कई दिनों से माहौल बना रही थी कि उनके संपर्क में कई सत्तारूढ़ विधायक हैं और वे तीसरा प्रत्याशी जिताकर दिखाएंगे। लेकिन जब हकीकत में संख्याबल का सामना करने का वक्त आया, तो सपा नेतृत्व को अपने ही विधायकों पर भरोसा नहीं रहा।
राजभर ने तंज कसते हुए कहा कि सपा को अच्छी तरह मालूम था कि यदि मतदान की नौबत आई तो उनके अपने खेमे में भगदड़ मच जाएगी और पिछली बार की तरह इस बार भी उनके विधायकों की अंतरात्मा जाग जाएगी। इसलिए अखिलेश यादव ने '403 सीटों' का बहाना बनाकर सम्मानजनक विदाई लेने की कोशिश की है। उन्होंने कहा कि जो पार्टी अपने विधायकों को एकजुट रखकर राज्यसभा की एक अतिरिक्त सीट के लिए लड़ नहीं सकती, वह 2027 में 403 सीटें जीतने का मुंगेरीलाल का हसीन सपना देख रही है।
'पीडीए' पर भी कसा था तंज: परिवार, दौलतमंद और बागी
इससे पहले भी जब सपा ने अपने दो उम्मीदवारों—प्रोफेसर रामगोपाल यादव और कॉरपोरेट पृष्ठभूमि के धनराज परिमल नथवानी—के नामों का ऐलान किया था, तब भी ओपी राजभर ने सपा के 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले पर सवाल खड़े किए थे। राजभर ने कहा था कि सपा के 'पीडीए' का असली मतलब 'परिवार, दौलतमंद और अपराधी' है।
राजभर ने दोहराया कि जब असल हक और प्रतिनिधित्व देने की बारी आती है, तो पिछड़े, दलित और मुसलमान हाशिए पर धकेल दिए जाते हैं और केवल उद्योगपतियों व परिवार के सदस्यों को ही संसद का टिकट थमाया जाता है। उन्होंने कहा कि सपा की इसी कथनी और करनी के अंतर के चलते जमीनी कार्यकर्ताओं और विधायकों में भारी नाराजगी है।
आरएलडी ने भी दिखाई 9 विधायकों की ताकत: 'सिद्धांतों की राजनीति'
राजभर के अलावा एनडीए के सहयोगी दल राष्ट्रीय लोकदल (RLD) ने भी अखिलेश यादव के बैकफुट पर आने पर चुटकी ली। आरएलडी के राष्ट्रीय प्रवक्ता रोहित अग्रवाल ने X पर पोस्ट करते हुए लिखा—"राजनीति में संख्या ही नहीं, साथ खड़े रहने वाले सहयोगियों की ताकत भी मायने रखती है। जो लोग अपनी विचारधारा और सिद्धांतों पर कायम रहते हैं, उनकी ताकत सिर्फ संख्या की मोहताज नहीं होती। सिद्धांतों पर खड़ी राजनीति की अपनी अलग ताकत होती है। जय जयंत, जय रालोद..."
आरएलडी ने यह साफ संदेश दिया कि विधानसभा में उसके 9 विधायकों की चट्टानी एकजुटता और एनडीए के 293 विधायकों के अभेद्य किले को देखकर ही विपक्ष ने मुकाबले से मैदान छोड़ना बेहतर समझा।
सभी 10 सीटों पर निर्विरोध निर्वाचन का रास्ता साफ
सपा के मैदान छोड़ने के साथ ही उत्तर प्रदेश में राज्यसभा चुनाव का रोमांच पूरी तरह खत्म हो चुका है। 10 सीटों के सापेक्ष अब केवल 10 उम्मीदवार ही मैदान में बचे हैं—जिसमें भाजपा के 8 और सपा के 2 प्रत्याशी शामिल हैं। नामांकन पत्रों की जांच और नाम वापसी का समय बीतने के बाद सभी का निर्विरोध चुना जाना तय है।
भले ही सपा ने 2027 के विधानसभा चुनाव को मुख्य लक्ष्य बताकर इस रणनीतिक वापसी को ढकने का प्रयास किया हो, लेकिन सत्ता पक्ष इसे अखिलेश यादव की सियासी विफलता और कमजोरी के रूप में पेश करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है।