IAS छोड़ राजनीति में उतरीं दिव्या मित्तल: यूपी की इन सीटों पर टिकी नजरें

IAS छोड़ राजनीति में उतरीं दिव्या मित्तल: यूपी की इन सीटों पर टिकी नजरें

उत्तर प्रदेश कैडर की 2013 बैच की चर्चित पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने अपनी 13 साल की प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा देकर राजनीति के अखाड़े में कदम रखने का औपचारिक ऐलान कर दिया है। आईआईटी दिल्ली, आईआईएम बैंगलोर से पढ़ाई और लंदन में जेपी मॉर्गन की लाखों की नौकरी छोड़कर भारत लौटीं दिव्या मित्तल मिर्जापुर और देवरिया में बतौर जिलाधिकारी अपने जनहितैषी कार्यों को लेकर खूब सुर्खियों में रही थीं। हाल ही में शासन द्वारा उनका इस्तीफा मंजूर होने के बाद जारी किए गए वीडियो संदेश ने उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है।

दिव्या मित्तल ने स्पष्ट किया है कि वे किसी स्थापित राजनीतिक दल के सिंबल या झंडे के नीचे काम करने के बजाय सीधे जनता के बीच जाकर राजनीति करेंगी। अब सवाल यह उठ रहा है कि आगामी 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर दिव्या मित्तल किस जिले और किन सीटों से चुनावी रण में अपनी किस्मत आजमा सकती हैं।

मिर्जापुर: सबसे मजबूत दावेदारी और भावनात्मक जुड़ाव

राजनीतिक जानकारों और सूत्रों के मुताबिक, दिव्या मित्तल के लिए पहली और सबसे मुफीद पसंद मिर्जापुर जिला माना जा रहा है। मिर्जापुर में डीएम रहने के दौरान उन्होंने लहुरियादह जैसे दुर्गम पहाड़ी गांव में आजादी के 75 साल बाद नल से पाइपलाइन के जरिए पानी पहुंचाया था। जब उनका वहां से तबादला हुआ था, तो स्थानीय महिलाओं और आम जनता ने आंसुओं और गुलाब की पंखुड़ियों की बारिश के साथ उन्हें विदाई दी थी।

अपने राजनीतिक वीडियो संदेश में भी दिव्या ने मिर्जापुर के लहुरियादह गांव की एक महिला का जिक्र किया, जिसने पानी की जगह बच्चों के लिए 5वीं के बाद का स्कूल मांगा था। उन्होंने कहा कि नियम होने और उनके द्वारा मंजूरी दिए जाने के बावजूद 3 साल तक स्कूल नहीं बन पाया, जिससे उन्हें व्यवस्था की लाचारी का अहसास हुआ।

  • मिर्जापुर की मझवां या सदर विधानसभा सीट पर उनकी मजबूत जमीनी पकड़ और जनता के बीच 'काम करने वाली अधिकारी' की छवि उन्हें सीधा फायदा पहुंचा सकती है।

पूर्वांचल की अन्य सीटें: बलिया और देवरिया पर भी नजर

मिर्जापुर के अलावा पूर्वांचल के कुछ अन्य जिलों की सीटों को लेकर भी अंदरखाने चर्चाएं चल रही हैं:

  • बलिया: राजनीतिक रणनीतिकारों का मानना है कि बागी बलिया की राजनीतिक तासीर हमेशा से क्रांतिकारी और लीक से हटकर सोचने वाले चेहरों को पसंद करती रही है। सूत्रों के मुताबिक, वे बलिया की किसी सामान्य सीट पर भी अपने समीकरण तलाश रही हैं।

  • देवरिया: देवरिया में भी डीएम रहते हुए दिव्या मित्तल ने जनसुनवाई, स्वास्थ्य सुविधाओं और ग्रामीण सड़कों पर सीधा दखल दिया था। वहां के युवाओं और किसानों के बीच उनका सीधा संपर्क रहा है, जिससे देवरिया की सदर सीट भी एक विकल्प के रूप में देखी जा रही है।

'बिना पार्टी झंडा, बिना जाति कार्ड': क्या होगी चुनावी रणनीति?

उत्तर प्रदेश की राजनीति जहां पूरी तरह से जातीय गोलबंदी और स्थापित दलों (भाजपा, सपा, बसपा, कांग्रेस) के इर्द-गिर्द घूमती है, वहां दिव्या मित्तल ने बिल्कुल अलग रास्ता चुना है।

उन्होंने ऐलान किया है कि उनकी राजनीति किसी जाति या पार्टी पर आधारित नहीं होगी। वे छात्रों, युवाओं, किसानों, वकीलों, डॉक्टरों और शिक्षकों को एक मंच पर जोड़कर बुनियादी मुद्दों—जैसे पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में देरी, टूटी सड़कें, स्वास्थ्य और शिक्षा में जवाबदेही—पर जनता का मोर्चा तैयार करेंगी। इसके लिए उन्होंने जनता से सीधे जुड़ने के लिए एक डिजिटल प्लेटफॉर्म और संपर्क नंबर भी जारी किया है।

स्थापित दलों के लिए बन सकती हैं सिरदर्द

भले ही दिव्या मित्तल ने किसी दल में शामिल होने से इनकार किया हो, लेकिन जमीनी विश्लेषकों का मानना है कि उनका मैदान में उतरना पारंपरिक दलों के वोटों में सेंध लगा सकता है। एक शिक्षित, ईमानदार और बेदाग छवि वाली महिला पूर्व प्रशासनिक अधिकारी के आने से शहरी और युवा मतदाताओं का रुझान उनकी तरफ हो सकता है।

आगामी 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले उनका यह कदम पूर्वांचल की राजनीति में एक नया ध्रुवीकरण पैदा कर सकता है। फिलहाल वे जिलों में लोगों से फीडबैक ले रही हैं, जिसके बाद ही वे अपनी सीट का अंतिम और औपचारिक ऐलान करेंगी।