बसपा के 'परिवारवाद' में भाई-भतीजा नहीं आता? मायावती ने छोटे भतीजे ईशान आनंद को बनाया नंबर-2

बसपा के 'परिवारवाद' में भाई-भतीजा नहीं आता? मायावती ने छोटे भतीजे ईशान आनंद को बनाया नंबर-2

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय राजनीति में इन दिनों एक अजीबोगरीब विरोधाभास देखने को मिल रहा है। दूसरे राजनीतिक दलों—विशेषकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस—पर 'परिवारवाद' और 'वंशवाद' का ठप्पा लगाकर हमला बोलने वाली बसपा सुप्रीमो मायावती के अपने ही फैसलों पर अब सवाल खड़े होने लगे हैं। बड़े भतीजे आकाश आनंद को 'अपरिपक्व' बताकर पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाने के महज कुछ ही दिनों बाद, मायावती ने अपने सगे भाई आनंद कुमार के छोटे बेटे यानी अपने दूसरे भतीजे ईशान आनंद (Ishan Anand) को सीधे पार्टी के राष्ट्रीय समन्वयक (नेशनल कोऑर्डिनेटर) पद पर बैठा दिया है।

बसपा में नेशनल कोऑर्डिनेटर का पद पार्टी सुप्रीमो के बाद सीधे नंबर-2 की हैसियत रखता है। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषक और विपक्षी दल यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या मायावती की डिक्शनरी में 'परिवारवाद' की परिभाषा सिर्फ विरोधियों के लिए है, जबकि उनके अपने भाई-बहन और भतीजे इसके दायरे से बाहर आते हैं?

कभी कहा था परिवार से कोई नहीं आएगा, फिर ईशान की हुई ताजपोशी

पार्टी के अंदरूनी हलकों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि मायावती अपने ही बयानों पर कितनी जल्दी यू-टर्न ले लेती हैं। कुछ समय पहले जब उन्होंने आकाश आनंद और उनके ससुर अशोक सिद्धार्थ के प्रभाव को लेकर कड़े फैसले लिए थे, तब सार्वजनिक रूप से यह संदेश दिया गया था कि पार्टी मान्यवर कांशीराम के मिशन पर चलेगी और परिवार के किसी भी सदस्य को अनावश्यक रूप से आगे नहीं बढ़ाया जाएगा।

लेकिन लखनऊ में आयोजित राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में सारे दावों के उलट दृश्य देखने को मिला। 27 वर्षीय ईशान आनंद ने मंच पर मायावती के पैर छुए और मायावती ने खुले तौर पर उन्हें पार्टी का नेशनल कोऑर्डिनेटर घोषित कर दिया।

विपक्षी दलों का तंज है कि अगर आकाश आनंद से पद छीना भी गया, तो पार्टी के किसी समर्पित, जमीनी और वर्षों से दरी बिछाने वाले दलित कार्यकर्ता को नंबर-2 नहीं बनाया गया, बल्कि सत्ता की चाबी फिर से भाई आनंद कुमार के ही परिवार (छोटे बेटे) के हाथ में सौंप दी गई।

पर्दे के पीछे से सीधे शीर्ष पर: जमीनी संघर्ष से दूर रहे हैं ईशान

ईशान आनंद की राजनीतिक पृष्ठभूमि को लेकर भी पार्टी के भीतर दबी जुबान में सुगबुगाहट है। बहुजन समाज पार्टी का इतिहास संघर्षों, साइकिल यात्राओं और गांव-गांव कैडर कैंपों से जुड़ा रहा है। लेकिन लंदन की वेस्टमिंस्टर यूनिवर्सिटी से वकालत पढ़कर लौटे ईशान आनंद का अब तक का राजनीतिक तजुर्बा केवल पार्टी के डिजिटल प्लेटफॉर्म, आईटी सेल और सोशल मीडिया तक ही सीमित रहा है।

उन्होंने न तो कभी किसी बड़े जन-आंदोलन की अगुवाई की है, न ही जमीन पर पुलिस की लाठियां खाई हैं और न ही चुनावी सभाओं में भाषण दिए हैं। ऐसे में सीधे राष्ट्रीय स्तर का दायित्व मिलने से पार्टी के उन पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं में भारी मायूसी है, जो दशकों से मायावती के साथ निष्ठा से खड़े रहे हैं लेकिन उन्हें कभी राष्ट्रीय पटल पर आने का मौका नहीं मिला।

'गाइडेंस' के नाम पर सीनियर नेताओं की ढाल, पर्दे के पीछे पिता का साया

मायावती ने ईशान को पद देते वक्त यह जरूर कहा कि वे पार्टी के दो सबसे वरिष्ठ नेताओं—राजाराम और रामजी गौतम—की देखरेख में काम करेंगे और स्वतंत्र फैसले नहीं लेंगे। इसके अलावा उनके पिता आनंद कुमार (जो पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं) भी उनका मार्गदर्शन करेंगे।

लेकिन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह केवल कार्यकर्ताओं के असंतोष को दबाने की एक रणनीति है। वास्तविकता यही है कि संगठन की असल बागडोर आनंद कुमार के परिवार के इर्द-गिर्द ही सिमट कर रह गई है। पिता राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं, बुआ राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और अब छोटा बेटा नेशनल कोऑर्डिनेटर बन चुका है। ऐसे में यह ढांचा किसी भी अन्य पारिवारिक पार्टी से अलग नजर नहीं आता।

संसद-विधानसभा में शून्य पर पहुंची पार्टी, क्या परिवार का कार्ड बचा पाएगा बसपा?

यह पूरा घटनाक्रम ऐसे वक्त में हो रहा है जब बसपा अपने इतिहास के सबसे बुरे चुनावी दौर से गुजर रही है। उत्तर प्रदेश विधानसभा में पार्टी का एक भी विधायक नहीं है, 2024 लोकसभा में पार्टी का खाता नहीं खुला और राज्यसभा में भी पार्टी शून्य पर पहुंचने वाली है। दलित और पिछड़े समाज का युवा वर्ग तेजी से चंद्रशेखर आजाद की 'आजाद समाज पार्टी' या सपा-कांग्रेस की तरफ आकर्षित हो रहा है।

ऐसे नाजुक दौर में पार्टी को मजबूत करने के लिए नए विजन, आक्रामक जमीनी राजनीति और लोकतांत्रिक सांगठनिक सुधारों की दरकार थी। लेकिन मायावती का फिर से 'पारिवारिक उत्तराधिकार' पर दांव लगाना यह साबित करता है कि बसपा में वफादारी का सबसे बड़ा पैमाना आज भी खून का रिश्ता ही बना हुआ है। अब 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता और बहुजन समाज का कैडर मायावती के इस 'नए पारिवारिक प्रयोग' को कितना स्वीकार करता है।