नोएडा डीएम मेधा रूपम को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत: इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश पर लगाई रोक

नोएडा डीएम मेधा रूपम को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत: इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश पर लगाई रोक

गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) की जिलाधिकारी (डीएम) मेधा रूपम को सुप्रीम कोर्ट से बहुत बड़ी राहत मिली है। दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA/रासुका) लगाने के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा डीएम के खिलाफ की गई तीखी टिप्पणियों और उनके वेतन से 5 लाख रुपये हर्जाना वसूलने के निर्देश पर शीर्ष अदालत ने अंतरिम रोक लगा दी है।

जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने मेधा रूपम की विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के 2 सितंबर के फैसले के अमल पर फिलहाल रोक लगा दी और मामले की अगली सुनवाई 7 अक्टूबर को तय की है।

सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी में पूछा: 'सिर्फ डीएम पर ही जुर्माना क्यों?'

बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। पीठ ने सवाल उठाया कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगाने का फैसला किसी भी जिले में अकेले जिलाधिकारी का नहीं होता है।

अदालत ने कहा:

  • पूरी प्रक्रिया का हिस्सा: एनएसए की सिफारिश पहले संबंधित थाना प्रभारी (SHO) और डीसीपी स्तर से तैयार होकर आती है। इसके बाद डीएम संस्तुति करते हैं और फिर मामला राज्य सरकार, राज्यपाल और हाई कोर्ट के सिटिंग जज की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय सलाहकार समिति (Advisory Board) तक जाता है।

  • अकेले अधिकारी को अलग-थलग करना अनुचित: शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की कि जब यह प्रक्रिया बहुस्तरीय प्रशासनिक और न्यायिक जांच से होकर गुजरती है, तो ऐसे में केवल एक युवा आईएएस अधिकारी को अलग-थलग कर व्यक्तिगत वेतन से हर्जाना वसूलने का आदेश देना उचित नहीं ठहराया जा सकता।

  • मुकुल रोहतगी की दलील: डीएम मेधा रूपम की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि हाई कोर्ट का आदेश पूरी तरह त्रुटिपूर्ण है। उन्होंने कहा कि आरोपी छात्रा के खिलाफ हिंसा भड़काने के पुख्ता पुलिस इनपुट्स थे और डीएम ने कानून के तहत प्रदत्त शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए अपनी जिम्मेदारी निभाई थी।

क्या था पूरा मामला और इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला?

यह पूरा विवाद इसी साल अप्रैल में नोएडा में हुए औद्योगिक श्रमिकों और कामगारों के बड़े विरोध-प्रदर्शन से जुड़ा हुआ है। इस प्रदर्शन के दौरान सड़क जाम, पथराव और आगजनी की घटनाएं सामने आई थीं। आरोप था कि डीयू से इतिहास में स्नातक कर चुकी छात्रा आकृति चौधरी (25) ने श्रमिकों को उकसाकर हिंसा भड़काने में भूमिका निभाई थी।

पुलिस की रिपोर्ट पर डीएम मेधा रूपम ने छात्रा के खिलाफ एनएसए के तहत हिरासत (डिटेंशन) का आदेश जारी किया था। इसके खिलाफ छात्रा ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका दाखिल की।

2 सितंबर को इलाहाबाद हाई कोर्ट की खंडपीठ ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए छात्रा की एनएसए हिरासत को रद्द कर दिया था। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में डीएम और नौकरशाही पर बेहद तल्ख टिप्पणियां करते हुए कहा था कि लापरवाह और मनमाना रवैया राज्य को निरंकुश शासन में बदल सकता है। इसके साथ ही अदालत ने हिरासत को गैर-कानूनी बताते हुए निर्देश दिया था कि छात्रा को 5 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए, जिसकी वसूली डीएम मेधा रूपम और संबंधित पुलिस अधिकारियों के वेतन से की जाए।

डीएम ने सुप्रीम कोर्ट में लगाई थी गुहार

हाई कोर्ट की इस तीखी टिप्पणी और वेतन से कटौती के आदेश के खिलाफ डीएम मेधा रूपम ने तुरंत सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनका कहना था कि ऐसे आदेशों से फील्ड में कानून-व्यवस्था संभालने वाले प्रशासनिक अधिकारियों का मनोबल टूटता है।

सुप्रीम कोर्ट ने अब हाई कोर्ट के फैसले के उन पैराग्राफों (विशेषकर पैराग्राफ 27 से 33) और हर्जाने की वसूली के निर्देश पर अंतरिम रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने दूसरे पक्ष को नोटिस जारी कर दो हफ्ते में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत के इस दखल के बाद प्रशासनिक हलकों और खासकर युवा नौकरशाहों ने बड़ी राहत की सांस ली है।