भारत पर 100% अमेरिकी टैरिफ के खतरे पर खुश हुआ यूक्रेन: जेलेंस्की ने अमेरिकी सांसदों से मिलकर कहा 'थैंक्यू'; नई दिल्ली ने दिया करारा जवाब

भारत पर 100% अमेरिकी टैरिफ के खतरे पर खुश हुआ यूक्रेन: जेलेंस्की ने अमेरिकी सांसदों से मिलकर कहा 'थैंक्यू'; नई दिल्ली ने दिया करारा जवाब

रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते कूटनीतिक तनाव के बीच एक नया अंतरराष्ट्रीय बखेड़ा खड़ा हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा 'लिंडसे ग्राहम सेंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट' (SRIA) पर दस्तखत कर उसे कानून का रूप देने के बाद यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की बेहद उत्साहित नजर आ रहे हैं। इस कानून के तहत अमेरिका को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी तक का भारी आयात शुल्क (Tariff) लगाने का अधिकार मिल गया है।

इस नए अमेरिकी कानून का सबसे बड़ा निशाना भारत और चीन जैसे प्रमुख ऊर्जा आयातक देश माने जा रहे हैं। भारत के खिलाफ अमेरिकी हथियार के तैयार होते ही जेलेंस्की ने अमेरिका के इस कदम का खुला समर्थन किया है और अमेरिकी सीनेटरों से मुलाकात कर बाकायदा 'थैंक्यू' कहा है। युद्ध के साये में घिरे देश के इस रुख पर भारत के कूटनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।

जेलेंस्की ने सीनेटरों से मिलकर जताया आभार: बोले- 'यह सही कदम है'

संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) सत्र के सिलसिले में न्यूयॉर्क पहुंचे यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने अमेरिकी सीनेटरों के साथ उच्चस्तरीय बैठक की। इस बैठक के तुरंत बाद जेलेंस्की ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पोस्ट साझा कर अमेरिका के इस कानून की जमकर तारीफ की।

जेलेंस्की ने अपने बयान में कहा:

"मैंने अपनी न्यूयॉर्क यात्रा की शुरुआत अमेरिकी सीनेटरों के साथ द्विपक्षीय बैठक से की। यूक्रेन को मिल रहे मजबूत समर्थन और 'लिंडसे ग्राहम प्रतिबंध विधेयक' को पारित करने के लिए मैंने अमेरिकी सांसदों का दिल से आभार व्यक्त किया। यह बिल्कुल सही और निर्णायक कदम है। एक बार जब इस कानून को पूरी तरह से जमीन पर लागू कर दिया जाएगा, तो शांति और सुरक्षा निश्चित रूप से हमारे और करीब आ जाएगी।"

जेलेंस्की का मानना है कि रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर आर्थिक चोट पहुंचाकर ही मॉस्को के युद्ध राजस्व (War Chest) को सुखाया जा सकता है। हालांकि, उनका यह रुख सीधे तौर पर भारत जैसे विशाल और मित्र देश के आर्थिक हितों को नुकसान पहुंचाने की वकालत करता है।

क्या है 100% टैरिफ वाला अमेरिकी कानून?

अमेरिका की कांग्रेस (संसद) द्वारा पारित और राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा हस्ताक्षरित इस कानून में कड़े प्रावधान रखे गए हैं:

  • शीर्ष 5 आयातक निशाने पर: कानून के तहत रूस से सबसे ज्यादा कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले शीर्ष देशों को चिन्हित कर उन पर 10% से लेकर 100% तक का दंडात्मक टैरिफ लगाया जा सकता है।

  • भारत और चीन मुख्य लक्ष्य: 2022 में युद्ध शुरू होने के बाद से भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा रूस से पूरा किया है। अमेरिकी सांसदों का तर्क है कि भारत की खरीद रूस की अर्थव्यवस्था को सहारा दे रही है।

  • यूरोपीय देशों को छूट: आश्चर्यजनक रूप से इस कानून में उन 15 यूरोपीय देशों को छूट का प्रावधान दिया गया है जो अपनी जरूरत का 15% से कम गैस रूस से लेते हैं, जो अमेरिका के दोहरे चरित्र को उजागर करता है।

भारत का करारा पलटवार: 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं

यूक्रेन की खुशी और अमेरिका के टैरिफ के चाबुक पर भारत सरकार ने अपना रुख पहले ही पूरी स्पष्टता के साथ रख दिया है। विदेश मंत्रालय (MEA) और विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने अमेरिकी नेतृत्व को दो टूक कह दिया है कि भारत अपनी नीतियों को किसी तीसरे देश के दबाव या प्रतिबंधों के आधार पर तय नहीं करता।

भारतीय विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है:

  1. ऊर्जा सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता: भारत एक विकासशील अर्थव्यवस्था है और अपने 1.4 अरब नागरिकों को किफायती व निरंतर ऊर्जा उपलब्ध कराना सरकार की पहली संवैधानिक जिम्मेदारी है।

  2. वैश्विक बाजार में स्थिरता: भारत ने दुनिया को आईना दिखाते हुए कहा कि यदि भारत ने रूसी तेल न खरीदा होता, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम 150 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुके होते, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था में हाहाकार मच जाता।

  3. हितों की रक्षा के लिए तैयार: भारत ने साफ चेतावनी दी है कि वह अपनी अर्थव्यवस्था और व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाने के लिए पूरी तरह सक्षम और तैयार है।

जेलेंस्की द्वारा भारत को प्रभावित करने वाले अमेरिकी कानून का स्वागत करना भारतीय जनमानस और रणनीतिकारों को रास नहीं आ रहा है, खासकर तब जब भारत ने युद्ध के दौरान यूक्रेन को निरंतर मानवीय सहायता भेजी है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं कीव जाकर शांति का संदेश दिया था।