त्योहारी सीजन में केंद्र सरकार का बड़ा फैसला: खाने के तेल पर इंपोर्ट ड्यूटी में कटौती; आम जनता को मिलेगी महंगाई से राहत
त्योहारी सीजन (दशहरा, करवा चौथ और दिवाली) से ठीक पहले आम जनता और गृहणियों की रसोई के बजट को संभालने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती लागत और रुपये में कमजोरी के बीच खाद्य तेल कंपनियों द्वारा 7 से 10 प्रतिशत तक दाम बढ़ाने की तैयारियों के बीच सरकार ने हस्तक्षेप किया है। सरकार ने कच्चे खाद्य तेलों—विशेषकर पाम ऑयल और सोयाबीन तेल—पर लागू आयात शुल्क (इंपोर्ट ड्यूटी) में कटौती का ऐलान किया है।
इस नीतिगत फैसले का सीधा असर घरेलू खुदरा बाजार पर पड़ेगा और त्योहारी मांग के चरम पर पहुंचने से पहले रिफाइंड तेल, पामोलिन और सोयाबीन तेल की कीमतों में कमी आने की संभावना बन गई है।
इंपोर्ट ड्यूटी में कटौती का गणित: 10% से घटाकर 5% किया गया शुल्क
वैश्विक बाजार में माल ढुलाई खर्च (Freight Cost) और लैंडेड कॉस्ट में बढ़ोतरी के कारण तेल कंपनियों का मार्जिन घट रहा था, जिसके चलते वे कीमतों में उछाल लाने वाली थीं। इसे बेअसर करने के लिए सरकार ने आयात शुल्क के ढांचे में राहत दी है:
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कच्चा पाम और सोयाबीन तेल: कच्चे सोयाबीन और पाम तेल पर बुनियादी आयात शुल्क को घटाकर सीधे 5 प्रतिशत के स्तर पर लाया गया है।
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सूरजमुखी तेल (Sunflower Oil): कच्चे सूरजमुखी तेल के आयात पर भी शुल्क विसंगतियों को दूर कर राहत दी गई है।
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घरेलू सप्लाई में बढ़ोतरी: शुल्क में कमी आने से बंदरगाहों से घरेलू रिफाइनरियों तक तेल की आपूर्ति तेज होगी, जिससे आने वाले हफ्तों में बाजार में तेल की उपलब्धता पर्याप्त बनी रहेगी।
त्योहारों में क्यों बढ़ जाती है खाने के तेल की मांग?
भारत में सितंबर से लेकर नवंबर के बीच त्योहारों का पीक सीजन रहता है।
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मिठाइयों और नमकीन की खपत: दुर्गा पूजा, दशहरा, करवा चौथ, दिवाली और छठ पूजा के दौरान घरों के अलावा हलवाइयों, होटल-रेस्तरां और पैकेज्ड फूड इंडस्ट्री में वनस्पति और रिफाइंड तेल की मांग में 20 से 25 फीसदी का उछाल आता है।
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आयात पर भारी निर्भरता: भारत अपनी कुल खाद्य तेल जरूरत का करीब 58 से 60 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करता है। देश मुख्य रूप से इंडोनेशिया और मलेशिया से पाम ऑयल तथा अर्जेंटीना, ब्राजील, रूस और यूक्रेन से सोयाबीन व सूरजमुखी तेल मंगाता है।
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वैश्विक हलचल या डॉलर के मुकाबले रुपये की चाल का सीधा असर भारतीय रसोई पर पड़ता है, जिसे काबू में रखने के लिए ड्यूटी कटौती सबसे कारगर कदम माना जाता है।
किसानों और उपभोक्ताओं के हितों के बीच संतुलन
सरकार ने यह कदम उठाते समय घरेलू तिलहन किसानों के हितों का भी पूरा ध्यान रखा है। वर्तमान में खरीफ सीजन की सोयाबीन और मूंगफली की नई फसल अक्टूबर-नवंबर में मंडियों में आने वाली है।
अधिकारियों के मुताबिक, शुल्क में संतुलन इस तरह साधा गया है ताकि:
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आम उपभोक्ताओं को त्योहारी पकवानों के लिए सस्ता तेल मिल सके।
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साथ ही घरेलू सोयाबीन और तिलहन के थोक भाव सरकार द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से नीचे न गिरें, जिससे किसानों को भी उनकी उपज का पूरा और सही दाम मिल सके।
केंद्र सरकार के इस समयबद्ध फैसले से खुदरा बाजार में एडिबल ऑयल के पैकेटों पर प्रति लीटर 5 से 10 रुपये तक की राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।