18 साल के उच्चतम स्तर 5.08% पर पहुंचा 10-वर्षीय यील्ड; शेयर बाजार में बिकवाली का खौफ, FII निकाल सकते हैं पैसा
वैश्विक वित्तीय बाजारों में एक बार फिर भारी हलचल और अनिश्चितता का माहौल बन गया है। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका के बॉन्ड मार्केट (US Treasury Market) में बड़ा उछाल दर्ज किया गया है। अमेरिकी सरकार के 10-वर्षीय बेंचमार्क ट्रेजरी नोट का यील्ड बढ़कर 5.08% के पार निकल गया है, जो कि जुलाई 2007 के बाद यानी पिछले 18 से 19 सालों का उच्चतम स्तर है।
बॉन्ड यील्ड में आई इस अचानक तेजी ने वॉल स्ट्रीट से लेकर दलाल स्ट्रीट (भारतीय शेयर बाजार) तक निवेशकों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। वित्त और अर्थशास्त्र के बुनियादी सिद्धांत के अनुसार, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और शेयर बाजार के बीच उलटा (Inverted) संबंध माना जाता है। जब बॉन्ड पर गारंटीड रिटर्न ऐतिहासिक स्तरों पर पहुंचता है, तो जोखिम भरे इक्विटी बाजार से पैसा निकलना लगभग तय हो जाता है।
बॉन्ड यील्ड में क्यों आया इतना बड़ा उछाल?
अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में इस रिकॉर्ड तेजी के पीछे तीन प्रमुख कारक काम कर रहे हैं:
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हॉकिश फेडरल रिजर्व (ब्याज दरों में बढ़ोतरी की आशंका): हालिया मजबूत अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों (सर्विसेज व मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई में उछाल) और महंगाई के दबाव के चलते अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा आगामी बैठकों में ब्याज दरों में एक और 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी की संभावना 54% से 60% तक बढ़ गई है।
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सप्लाई का दबाव और भारी राजकोषीय घाटा: अमेरिकी सरकार द्वारा बढ़ते बजट घाटे को पाटने के लिए रिकॉर्ड मात्रा में नए बॉन्ड्स जारी किए जा रहे हैं। आपूर्ति बढ़ने और मांग में नरमी के कारण बॉन्ड की कीमतें गिरी हैं और यील्ड (रिटर्न) बढ़ गया है।
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'हायर फॉर लॉन्गर' का डर: बाजार अब यह मान चुका है कि ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची बनी रहेंगी, जिससे तुरंत किसी नीतिगत राहत की उम्मीदें धुंधली हो गई हैं।
शेयर बाजारों पर क्या होगा असर? समझिए 4 बड़े झटके
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड का 18 साल के हाई पर जाना शेयर बाजार के लिए नकारात्मक संकेत माना जाता है:
1. इक्विटी के मुकाबले बॉन्ड अधिक आकर्षक (Risk-Free Return)
अमेरिकी सरकार के ट्रेजरी बॉन्ड को दुनिया का सबसे सुरक्षित निवेश (Risk-free asset) माना जाता है। जब निवेशकों को बिना किसी जोखिम के डॉलर में 5% से अधिक का सुनिश्चित सालाना रिटर्न मिल रहा हो, तो वे शेयर बाजार जैसे उतार-चढ़ाव वाले माध्यम में अतिरिक्त जोखिम लेने से बचते हैं। इससे संस्थागत निवेशक इक्विटी बेचकर पैसा डेट मार्केट में शिफ्ट करने लगते हैं।
2. वैल्यूएशन में कटौती और कंपनियों पर दबाव (Discount Rate Impact)
फाइनेंस के नियमों के मुताबिक, किसी भी कंपनी के शेयरों का मूल्यांकन (Valuation) भविष्य में होने वाली कमाई के डिस्काउंटेड कैश फ्लो (DCF) पर निर्भर करता है। डिस्काउंट रेट के रूप में 10-वर्षीय यील्ड का उपयोग किया जाता है। यील्ड बढ़ने से डिस्काउंट रेट बढ़ जाता है, जिससे आईटी, टेक और हाई-ग्रोथ कंपनियों के मौजूदा वैल्यूएशन काफी महंगे दिखने लगते हैं और उनमें तेज बिकवाली आती है।
3. कंपनियों की फंडिंग लागत में इजाफा
जब सॉवरेन बॉन्ड यील्ड बढ़ती है, तो कॉरपोरेट जगत के लिए कर्ज लेना भी महंगा हो जाता है। होम लोन, ऑटो लोन और बिजनेस लोन की दरें ऊंची बनी रहती हैं, जिससे कंपनियों के मुनाफे (Profit Margin) और उपभोक्ता मांग पर सीधा असर पड़ता है।
4. उभरते बाजारों और भारत से FII की निकासी
यह सबसे संवेदनशील पहलू है। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और डॉलर इंडेक्स (DXY) मजबूत होने से विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) भारत जैसे उभरते बाजारों (Emerging Markets) से अपनी पूंजी निकालकर वापस अमेरिकी डॉलर और डेट पेपर्स में लगाने लगते हैं:
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भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ सकता है।
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भारतीय शेयर बाजार (निफ्टी और सेंसेक्स) में विदेशी फंड्स की बिकवाली के चलते मध्यम अवधि में करेक्शन या कंसोलिडेशन देखने को मिल सकता है।
भारतीय निवेशकों को क्या करना चाहिए?
विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक स्तर पर जब तक अमेरिकी 10-वर्षीय यील्ड 5% के आसपास टिकी रहेगी, तब तक इक्विटी बाजारों में सीमित दायरे और तेज उतार-चढ़ाव (Volatility) का दौर बना रहेगा।
हालांकि, भारत की मजबूत घरेलू जीडीपी ग्रोथ और घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs व म्यूचुअल फंड SIPs) के निरंतर प्रवाह के कारण भारतीय बाजार विकसित देशों के मुकाबले बेहतर लचीलापन दिखा सकते हैं। ऐसे माहौल में अत्यधिक वैल्यूएशन वाले अनप्रॉफिटेबल स्टॉक्स से बचकर मजबूत कैश-फ्लो और कम कर्ज वाली दिग्गज लार्ज-कैप कंपनियों पर ध्यान केंद्रित करना अधिक सुरक्षित रणनीति मानी जाती है।