पिता विपक्ष में सेंध लगाकर बने सांसद, अब बेटा सपा के सहारे जाएगा राज्यसभा; नथवानी परिवार का सियासी खेल

पिता विपक्ष में सेंध लगाकर बने सांसद, अब बेटा सपा के सहारे जाएगा राज्यसभा; नथवानी परिवार का सियासी खेल

देश की संसदीय राजनीति में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच भले ही तलवारें खिंची नजर आती हों, लेकिन जब बात रसूखदार कॉरपोरेट घरानों और उद्योगपतियों की आती है, तो विचारधारा की दीवारें अचानक ढहती दिखाई देती हैं। इसका सबसे ताजा और दिलचस्प उदाहरण नथवानी परिवार के रूप में सामने आया है। रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) के कॉरपोरेट अफेयर्स डायरेक्टर परिमल नथवानी ने झारखंड की सियासत में निर्दलीय उतरकर विपक्षी दलों के वोटों में सेंधमारी और एनडीए के खुले समर्थन से राज्यसभा का सफर तय किया था। अब उनके बेटे और रिलायंस के ग्रुप प्रेसिडेंट धनराज परिमल नथवानी को सीधे मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (सपा) उत्तर प्रदेश के कोटे से उच्च सदन भेजने की तैयारी में है। पिता का एनडीए खेमे में होना और बेटे का विपक्षी 'इंडिया' गठबंधन के सबसे मजबूत घटक दल सपा से पर्चा भरना भारतीय राजनीति के उस अनूठे समीकरण को उजागर करता है, जहां संबंधों का दायरा दलगत सीमाओं से कहीं ऊपर नजर आता है।

सपा प्रमुख अखिलेश यादव की मौजूदगी में धनराज नथवानी ने प्रो. रामगोपाल यादव के साथ अपना नामांकन दाखिल कर दिया है। इसके साथ ही संसद के उच्च सदन में पिता और पुत्र की ऐसी दुर्लभ जोड़ी देखने को मिलेगी, जिसमें दोनों अलग-अलग राज्यों का प्रतिनिधित्व करेंगे और दोनों के चुनावी मंच भी पूरी तरह विरोधी खेमों से जुड़े होंगे।

झारखंड में परिमल नथवानी की एंट्री और सियासत में सेंधमारी का इतिहास

परिमल नथवानी का संसदीय सफर हमेशा से रणनीतिक जोड़-तोड़ और अप्रत्याशित समर्थन का गवाह रहा है। साल 2008 में जब वे पहली बार झारखंड से निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर राज्यसभा के मैदान में उतरे थे, तब किसी को अंदाजा नहीं था कि गुजरात का एक कॉरपोरेट चेहरा खनिज बहुल राज्य के विधायकों का दिल जीत लेगा। नथवानी ने क्षेत्रीय दलों, निर्दलीय विधायकों और विपक्षी खेमों में ऐसी जबर्दस्त सेंधमारी की कि प्रमुख दलों के अधिकृत उम्मीदवार देखते रह गए और वे विजयी होकर उच्च सदन पहुंच गए। इसके बाद 2014 में भी उन्होंने इसी तरह विभिन्न दलों का विश्वास जीतकर दूसरी बार झारखंड से जीत हासिल की।

वर्ष 2020 में वे वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के समर्थन से आंध्र प्रदेश से राज्यसभा गए, जबकि 2026 में वे फिर से झारखंड की धरती से भाजपा व एनडीए समर्थित निर्दलीय सांसद के रूप में चौथी बार उच्च सदन पहुंचे। परिमल नथवानी की यह खूबी मानी जाती है कि सत्ता में कोई भी दल रहे, उनके राजनीतिक संबंध कभी कमजोर नहीं पड़ते। रिलायंस के संस्थापक स्वर्गीय धीरूभाई अंबानी के दौर से लेकर मुकेश अंबानी के बेहद करीबी सिपहसालार रहे परिमल नथवानी ने हमेशा अपने संपर्कों के दम पर संसद की राह आसान बनाई है।

अब बेटे धनराज पर अखिलेश यादव ने क्यों खेला बड़ा दांव?

धनराज परिमल नथवानी भी अपने पिता की तरह कॉरपोरेट और खेल प्रबंधन की दुनिया में खासे रसूखदार माने जाते हैं। 5 फरवरी 1986 को जन्मे धनराज ने लंदन के रीजेंट्स बिजनेस स्कूल से इंटरनेशनल बिजनेस की पढ़ाई की है। वे वर्तमान में रिलायंस इंडस्ट्रीज में ग्रुप प्रेसिडेंट हैं और रिलायंस न्यू एनर्जी लिमिटेड के डायरेक्टर पद की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। इसके अलावा वे गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन (GCA) के अध्यक्ष हैं, जहां उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बाद यह पद संभाला था।

सवाल यह उठ रहा है कि जिस परिवार की जड़ें गुजरात में हैं और जिनके संबंध केंद्र की सत्ता के शीर्ष नेतृत्व से बेहद गहरे हैं, उन्हें समाजवादी पार्टी ने अपना राज्यसभा उम्मीदवार क्यों बनाया? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश यादव ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। सपा यह संदेश देना चाहती है कि वह सिर्फ पारंपरिक 'पीडीए' या जातिगत राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के शीर्ष कॉरपोरेट जगत के साथ भी उसके संबंध बेहद मजबूत हैं। इसके अलावा धनराज नथवानी की मौजूदगी से उत्तर प्रदेश की राज्यसभा लड़ाई में सपा को क्रॉस वोटिंग से बचाव और निर्दलीय या अन्य दलों के विधायकों को अपने पाले में लाने का एक अदृश्य रणनीतिक कवच भी मिल गया है।

पिता एनडीए खेमे में, बेटा सपा के साथ: संसद में दिखेगा अनोखा नजारा

उत्तर प्रदेश से धनराज नथवानी की जीत तय मानी जा रही है, क्योंकि समाजवादी पार्टी के पास अपने दो उम्मीदवारों को जिताने के लिए पर्याप्त 74 से अधिक विधायकों का संख्याबल उपलब्ध है। जब वे शपथ लेंगे, तो यह राज्यसभा के इतिहास का एक बेहद दुर्लभ क्षण होगा। पिता परिमल नथवानी जहां झारखंड कोटे से एनडीए के पाले में बैठकर सरकार के विधेयकों का समर्थन करते दिखाई देंगे, वहीं बेटा धनराज नथवानी समाजवादी पार्टी और विपक्षी बेंच पर बैठकर सदन की कार्यवाही का हिस्सा बनेगा।

राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि इस फैसले से समाजवादी पार्टी के उन नेताओं को निराशा जरूर हुई है जो लंबे समय से पार्टी की अग्रिम पंक्ति में रहकर राज्यसभा के टिकट की उम्मीद लगाए बैठे थे। पूर्व नौकरशाह आलोक रंजन और सलीम इकबाल शेरवानी जैसे वरिष्ठ नाम दौड़ में शामिल थे, लेकिन अखिलेश यादव ने जमीनी सियासत और सांगठनिक चेहरों के बजाय कॉरपोरेट प्रभाव को प्राथमिकता देकर सबको चौंका दिया।

विचारधारा पर भारी पड़ा कॉरपोरेट रसूख

इस पूरे घटनाक्रम ने यह एक बार फिर साबित कर दिया है कि आधुनिक राजनीति में विचारधारा की सीमाएं केवल चुनावी भाषणों और रैलियों तक सीमित रह गई हैं। पर्दे के पीछे सत्ता और विपक्ष दोनों ही खेमे बड़े औद्योगिक घरानों और प्रभावशाली चेहरों के साथ अपने संबंध प्रगाढ़ बनाए रखने के लिए हमेशा दरवाजे खुले रखते हैं।

झारखंड में जहां परिमल नथवानी ने विपक्षी मतों को तोड़कर अपनी जीत की पटकथा लिखी थी, वहीं अब उत्तर प्रदेश में उनके पुत्र धनराज नथवानी समाजवादी पार्टी की लाल टोपी के सहारे संसद में अपनी नई पारी की शुरुआत करने जा रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि दोनों सदनों के भीतर पिता-पुत्र की यह जोड़ी किस तरह अपनी-अपनी पार्टियों के राजनीतिक दायित्वों का निर्वहन करती है।