हाईकोर्ट की डीएम को दो-टूक: 80 गांवों के हक पर लापरवाही नहीं होगी बर्दाश्त, समय सीमा में समाधान दें अफसर

हाईकोर्ट की डीएम को दो-टूक: 80 गांवों के हक पर लापरवाही नहीं होगी बर्दाश्त, समय सीमा में समाधान दें अफसर

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ग्रामीण विकास, जनसमस्याओं और बुनियादी नागरिक अधिकारों की अनदेखी पर कड़ा रुख अपनाते हुए संबंधित जिले के जिलाधिकारी (डीएम) को सख्त चेतावनी दी है। कोर्ट ने लगभग 80 गांवों से जुड़े इस अहम मामले में प्रशासनिक ढिलाई पर गहरी नाराजगी जताई और स्पष्ट शब्दों में कहा कि जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारी मामले की संवेदनशीलता और जमीनी गंभीरता को समझें। लंबे समय से फाइलों में अटके इस विवाद ने अस्सी से अधिक ग्रामीण बस्तियों के जनजीवन को सीधे तौर पर प्रभावित किया है। अदालत की इस दो-टूक टिप्पणी के बाद जिले के प्रशासनिक महकमे में हलचल तेज हो गई है और अब तक सुस्त पड़े तंत्र को सक्रिय करने की कवायद शुरू हो गई है।

80 गांवों का संकट और प्रशासनिक अनदेखी पर हाईकोर्ट की तल्खी

इस पूरे प्रकरण की पृष्ठभूमि सीधे तौर पर अस्सी ग्रामीण क्षेत्रों के निवासियों के दैनिक जीवन, बुनियादी सुविधाओं, राजस्व विवाद अथवा अधिगृहीत भूमि से जुड़े जटिल मुद्दों से संबंधित है। प्रभावित ग्रामीणों की ओर से दायर याचिका में यह दलील दी गई थी कि कई वर्षों से वे अपनी समस्याओं को लेकर तहसील स्तर से लेकर जिला कलेक्ट्रेट तक गुहार लगा रहे हैं, लेकिन केवल आश्वासन और कागजी प्रक्रिया के अलावा कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत की पीठ ने पाया कि स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक मशीनरी ने जन समस्याओं को प्राथमिकता देने के बजाय केवल कागजी कोरम पूरा करने का रवैया अपनाया। पीठ ने स्पष्ट किया कि जब कोई मुद्दा इतने बड़े दायरे और अस्सी गांवों की लाखों की आबादी से जुड़ा हो, तो प्रशासनिक अधिकारियों से सक्रियता और संवेदनशीलता की अपेक्षा की जाती है, न कि अंतहीन टालमटोल की।

अदालत ने सुनवाई के दौरान मौजूद सरकारी वकीलों और जिम्मेदार अफसरों के बयानों का संज्ञान लेते हुए कहा कि लोकतंत्र और संविधान के तहत प्रशासन जनता की सेवा और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए स्थापित है। यदि बुनियादी विवादों के समाधान के लिए नागरिकों को हर बार उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़े, तो यह प्रशासनिक मशीनरी की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।

डीएम को व्यक्तिगत रूप से निगरानी करने का स्पष्ट निर्देश

न्यायालय ने जिलाधिकारी को निर्देश दिया है कि वे इस पूरे प्रकरण की समीक्षा किसी मातहत अधिकारी के भरोसे छोड़ने के बजाय खुद करें। अदालत ने तल्ख लहजे में कहा कि शीर्ष पद पर बैठे प्रशासनिक मुखिया केवल पत्राचार का माध्यम नहीं हो सकते, बल्कि जमीनी समस्याओं के त्वरित निस्तारण के लिए उनका व्यक्तिगत हस्तक्षेप जरूरी है। बेंच ने यह भी रेखांकित किया कि सरकारी फाइलों में दर्ज आंकड़ों और जमीनी हकीकत में भारी अंतर दिख रहा है।

यदि 80 गांवों के निवासी लगातार एक ही समस्या को लेकर विवश हैं, तो इसका अर्थ है कि मैदानी स्तर पर स्थिति की सही जांच नहीं की गई। हाईकोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि निर्धारित समयसीमा के भीतर इस विवाद का ठोस, वैधानिक और पारदर्शी समाधान नहीं निकाला गया, तो न्यायालय संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध कठोर अनुशासनात्मक कदम उठाने और व्यक्तिगत जवाबदेही तय करने से पीछे नहीं हटेगा। इस टिप्पणी ने साफ कर दिया है कि न्यायिक व्यवस्था अब प्रशासनिक हीलाहवाली को हल्के में लेने के मूड में नहीं है।

ग्रामीण जनजीवन पर गहराता असर और जनहित की प्राथमिकता

यह विवाद सीधे तौर पर उन अस्सी गांवों के किसानों, मजदूरों और आम नागरिकों के अधिकारों से जुड़ा हुआ है जो लंबे समय से बुनियादी न्याय की बाट जोह रहे थे। याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं ने बेंच के सामने यह तर्क रखा कि प्रशासनिक संवेदनहीनता के चलते न केवल विकास कार्य रुके हुए हैं, बल्कि ग्रामीणों की आजीविका और दैनिक गतिविधियों पर भी इसका बुरा असर पड़ रहा है। कई मामलों में जमीन के सीमांकन, राजस्व अभिलेखों में विसंगतियों अथवा विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में स्थानीय अधिकारियों ने जानबूझकर देरी की।

उच्च न्यायालय ने इस बिंदु को बेहद गंभीरता से लिया और कहा कि न्याय केवल अदालती आदेशों में नहीं, बल्कि जमीन पर महसूस होना चाहिए। पीठ ने निर्देश दिया कि सभी प्रभावित अस्सी गांवों में संबंधित राजस्व, विकास और प्रशासनिक दलों को भेजकर संयुक्त स्थलीय निरीक्षण कराया जाए। किसी भी प्रकार की भ्रामक या अधूरी रिपोर्ट अदालत के संज्ञान में आने पर सीधे तौर पर संबंधित ब्लॉक, तहसील और जिला स्तरीय अफसरों की जवाबदेही तय की जाएगी।

तय समयसीमा में प्रगति रिपोर्ट सौंपने का अंतिम अल्टीमेटम

अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए सख्त समयसीमा निर्धारित करते हुए स्पष्ट किया है कि अगली तारीख तक उठाए गए ठोस कदमों की विस्तृत प्रगति रिपोर्ट हलफनामे के साथ पेश की जाए। न्यायालय ने यह भी हिदायत दी कि केवल प्रक्रिया शुरू करने की बात कहकर समय नहीं मांगा जा सकता; अगली तारीख तक समस्या का समाधान जमीन पर दिखना चाहिए। यदि इस दौरान प्रशासनिक तंत्र द्वारा किसी भी प्रकार की लापरवाही या आदेश की अवहेलना पाई गई, तो जिम्मेदार अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से अदालत में हाजिर होकर जवाब देना होगा।

इस कड़े न्यायिक आदेश के बाद जिला मुख्यालय से लेकर संबंधित ब्लॉकों तक हड़कंप की स्थिति है। संबंधित विभागों ने फाइलों को दोबारा खंगालना शुरू कर दिया है और संयुक्त निरीक्षण दलों के गठन की प्रक्रिया तेज कर दी गई है। अस्सी गांवों के प्रभावित निवासियों के लिए हाईकोर्ट की यह सख्त टिप्पणी राहत की उम्मीद लेकर आई है, क्योंकि अब प्रशासन के पास टालने का कोई बहाना नहीं बचा है।