दाने-दाने को मोहताज अवाम और चांद पर कदम रखने के दावे: कंगाली और कर्ज के भंवर में फंसा पाकिस्तान
गंभीर आर्थिक संकट, रिकॉर्ड तोड़ महंगाई और अंतरराष्ट्रीय कर्ज के बोझ तले दबे पाकिस्तान की प्राथमिकताओं को लेकर एक बार फिर पूरी दुनिया में उसकी जगंसाई हो रही है। एक तरफ देश की शहबाज शरीफ सरकार और सैन्य नेतृत्व अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), विश्व बैंक और सऊदी अरब-यूएई जैसे मित्र देशों के सामने चंद अरब डॉलर के बेलआउट पैकेज और 'वित्तीय मदद' के लिए लगातार गुहार लगा रहे हैं; वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान की राष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसी 'सुपारको' (SUPARCO) और सत्ताधारी हलकों से चांद पर मिशन भेजने और बड़े-बड़े स्पेस प्रोग्राम लॉन्च करने के खोखले दावे किए जा रहे हैं। बुनियादी सुविधाओं, सस्ती बिजली, स्वास्थ्य और दो वक्त की रोटी के लिए तरसती अवाम के बीच सरकारी हुक्मरानों का यह 'चांद वाला सपना' न केवल हास्यास्पद बन चुका है, बल्कि खुद पाकिस्तान के भीतर और बाहर भारी आलोचना और मीम्स का शिकार हो रहा है।
कंगाली का आलम: विदेशी कर्ज से चल रहा सरकारी खर्च
पाकिस्तान के जमीनी आर्थिक आंकड़े उसकी खस्ताहाली की भयावह तस्वीर बयां करते हैं। देश का विदेशी मुद्रा भंडार लंबे समय से खतरनाक स्तर पर झूल रहा है, जहां आयात बिल भरने और पुराने कर्ज की किस्तें चुकाने के लिए भी नए कर्जों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। देश में आटा, दूध, दाल और रसोई गैस जैसी बुनियादी चीजों की कीमतें आम नागरिक की पहुंच से बाहर हो चुकी हैं। बिजली और पेट्रोल के बिलों ने मध्यम वर्ग की कमर तोड़ दी है। आलम यह है कि देश को दिवालिया होने से बचाने के लिए सरकार हर कुछ महीनों में आईएमएफ की सख्त शर्तों के आगे घुटने टेकती है, जिसके चलते अवाम पर टैक्स और महंगाई का नया बोझ लाद दिया जाता है। जिस देश की अर्थव्यवस्था विदेशी इमदाद और वित्तीय 'चंदे' की बैसाखियों पर टिकी हो, उसके नेताओं द्वारा अरबों डॉलर के महत्वाकांक्षी मून मिशन की बात करना किसी क्रूर मजाक से कम नहीं लगता।
भारत की स्पेस उपलब्धियों से पैदा हुई बेचैनी और चीन की बैसाखी
पाकिस्तान के इस अचानक उपजे 'स्पेस प्रेम' के पीछे भारत की ऐतिहासिक अंतरिक्ष सफलताओं की गहरी टीस और हीनभावना मानी जा रही है। भारत द्वारा 'चंद्रयान-3' की चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर ऐतिहासिक सॉफ्ट लैंडिंग और गगनयान मिशन की तैयारियों ने इस्लामाबाद के रणनीतिकारों की नींद उड़ा दी है। वैश्विक मंच पर अपनी फजीहत मिटाने के लिए पाकिस्तान खुद की तकनीकी क्षमता विकसित करने के बजाय चीन की बैसाखी का सहारा ले रहा है। पिछले दिनों चीन के 'चांग'ई-6' लूनर मिशन में पाकिस्तान के एक छोटे से पेलोड (ICUBE-Q) को शामिल कराया गया था, जिसे पाकिस्तानी हुक्मरानों ने अपनी बहुत बड़ी राष्ट्रीय और वैज्ञानिक उपलब्धि बताकर खूब ढिंढोरा पीटा। जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान के पास न तो क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन जैसी उन्नत लॉन्च तकनीक है और न ही बड़े स्पेस प्रोग्राम को फंडिंग देने का बजट। चीन के रॉकेट पर किराए का डिब्बा चढ़ाकर चांद पर जाने का क्रेडिट लेना सिर्फ घरेलू राजनीति में वाहवाही लूटने का एक सस्ता पैंतरा है।
आवाम का फूटा गुस्सा: 'पहले जमीनी भूख मिटाओ, फिर फलक की बातें करो'
पाकिस्तान के इस दोहरे चरित्र पर खुद वहां के प्रबुद्ध नागरिक, पत्रकार और सोशल मीडिया यूजर्स अपनी ही सरकार को जमकर लताड़ रहे हैं। सोशल मीडिया पर व्यंग्य करते हुए लोग लिख रहे हैं कि जिस मुल्क में सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह देने के लाले पड़े हैं, जहां अस्पताल जीवनरक्षक दवाओं की कमी से जूझ रहे हैं और लाखों बच्चे कुपोषण का शिकार हैं, वहां के हुक्मरान अवाम को चांद की सैर कराने के ख्वाब दिखा रहे हैं। वरिष्ठ पाकिस्तानी विश्लेषकों का भी मानना है कि जब तक देश में राजनीतिक स्थिरता नहीं आती, भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगती और शिक्षा व उद्योग में बुनियादी निवेश नहीं होता, तब तक ऐसे भव्य ऐलान केवल जनता का ध्यान असल समस्याओं से भटकाने का छलावा साबित होंगे। फिलहाल, जमीन पर खाली थाली और आसमान में चांद का सपना—यही आज के पाकिस्तान की सबसे कड़वी हकीकत बनकर रह गया है।