सड़कों पर लाखों गारमेंट मजदूर और 500 से ज्यादा कारखानों पर ताला: भारी विरोध के बाद बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था फिर पटरी से उतरी
बांग्लादेश की रीढ़ मानी जाने वाली रेडीमेड गारमेंट (RMG) इंडस्ट्री एक बार फिर भारी उथल-पुथल और उग्र विरोध प्रदर्शनों की चपेट में आ गई है। राजधानी ढाका, मीरपुर, गाजीपुर, आशुलीया और सावर जैसे प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में 500 से अधिक कपड़ा कारखानों में उत्पादन पूरी तरह ठप हो गया है और मालिकों ने ताले लटका दिए हैं। बढ़ती कमरतोड़ महंगाई, खाने-पीने की चीजों के आसमान छूते दाम और मकान किराए के बोझ तले दबे लाखों गारमेंट मजदूर अपनी बुनियादी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं। पिछले तीन दिनों से जारी इस राष्ट्रव्यापी हड़ताल के चलते ढाका-तंगेल हाईवे समेत कई राष्ट्रीय राजमार्गों पर चक्का जाम हो गया है। कारखानों के बाहर खड़ी गाड़ियों में आगजनी, पथराव और बैरिकेडिंग की घटनाओं ने पूरे इलाके को छावनी में तब्दील कर दिया है। बांग्लादेश गारमेंट मैन्युफैक्चरर्स एंड एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (BGMEA) के अनुसार, सुरक्षा व्यवस्था के अभाव और हिंसक झड़पों के डर से 529 से अधिक इकाइयों को अपने संचालन को पूरी तरह निलंबित करना पड़ा है।
न्यूनतम वेतन को 30,000 टका करने की मांग पर अड़े मजदूर संगठन
मजदूरों के इस उग्र आंदोलन की मुख्य वजह मौजूदा न्यूनतम वेतन और जीवन यापन के खर्च में बढ़ता असंतुलन है। वर्तमान में बांग्लादेश में एक गारमेंट वर्कर को प्रतिमाह लगभग 12,500 टका (करीब 101 अमेरिकी डॉलर) का न्यूनतम वेतन मिलता है। आंदोलनकारी यूनियनों और सड़कों पर उतरे श्रमिकों का कहना है कि मौजूदा महंगाई दर को देखते हुए इस वेतन में एक छोटे परिवार का गुजारा करना भी नामुमकिन हो चुका है। मजदूर संगठनों ने सरकार और फैक्ट्री मालिकों के सामने दो टूक मांग रखी है कि उनके न्यूनतम मासिक वेतन को बढ़ाकर सीधे 30,000 टका (लगभग 242 अमेरिकी डॉलर) किया जाए। इसके साथ ही हर साल नियमित 10 से 15 प्रतिशत इंक्रीमेंट और चिकित्सा व राशन भत्ते में बढ़ोतरी की शर्त भी रखी गई है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे केवल खोखले आश्वासनों पर काम पर नहीं लौटेंगे, जब तक आधिकारिक नोटिफिकेशन जारी नहीं होता, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा।
पुलिस-प्रशासन का लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले, कई घायल
सड़कों पर लगातार बढ़ते तनाव को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन ने पुलिस, रैपिड एक्शन बटालियन (RAB) और बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) की टुकड़ियों को तैनात कर दिया है। मीरपुर और आशुलीया में जब प्रदर्शनकारी मजदूरों ने मेट्रो रेल स्टेशनों और मुख्य चौराहों को जाम करने की कोशिश की, तो सुरक्षा बलों के साथ उनकी सीधी भिड़ंत हो गई। भीड़ को तितर-बितर करने के लिए सुरक्षाबलों ने लाठीचार्ज किया, साउंड ग्रेनेड फोड़े और दर्जनों आंसू गैस के गोले दागे। जवाबी कार्रवाई में आक्रोशित मजदूरों ने सुरक्षाबलों पर जमकर ईंट-पत्थर बरसाए। इस टकराव में दर्जनों पुलिसकर्मी और सैकड़ों प्रदर्शनकारी घायल हो चुके हैं, जिन्हें स्थानीय अस्पतालों में भर्ती कराया गया है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कई इलाकों में सार्वजनिक सभाओं पर पाबंदी लगा दी गई है।
फैक्ट्री मालिकों की दलील: 'लागत बढ़ने और वैश्विक मंदी के बीच मांग पूरी करना असंभव'
दूसरी ओर, फैक्ट्री मालिकों और उद्योगपतियों के संघ (BGMEA व BKMEA) ने हाथ खड़े करते हुए संकट की अलग ही तस्वीर पेश की है। मालिकों का कहना है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, कच्चे माल की बढ़ती लागत और पश्चिमी देशों से मिलने वाले एक्सपोर्ट ऑर्डर्स में आई कमी के चलते उद्योग पहले से ही भारी दबाव में है। फैक्ट्री मालिकों का तर्क है कि वेतन में एकमुश्त 100 प्रतिशत से अधिक का इजाफा करने से उत्पादन लागत असहनीय हो जाएगी, जिससे कई छोटी और मध्यम कपड़ा इकाइयां हमेशा के लिए दिवालिया हो जाएंगी। मालिकों ने चेतावनी दी है कि यदि मजदूर तुरंत काम पर वापस नहीं लौटते, तो श्रम कानून की धारा 13(1) (नो वर्क, नो पे) लागू करते हुए अनिश्चितकाल के लिए कारखानों को बंद घोषित कर दिया जाएगा।
सरकार ने गठित किया नया 'वेतन बोर्ड', क्या निकलेगा इस गतिरोध का हल?
उद्योग को पूरी तरह तबाह होने से बचाने और कानून व्यवस्था बहाल करने के लिए अंतरिम सरकार ने आनन-फानन में एक नए 'न्यूनतम वेतन समीक्षा बोर्ड' (Minimum Wage Board) का गठन कर दिया है। श्रम मंत्रालय के अधिकारियों ने सभी पक्षों के साथ आपात बैठक की है और मजदूरों से शांति बनाए रखते हुए फैक्ट्रियों में लौटने की अपील की है। हालांकि, मजदूरों का कहना है कि पहले भी वेतन बोर्ड के वादे केवल फाइलों में दबकर रह गए हैं। बांग्लादेश के कुल निर्यात राजस्व का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अकेले गारमेंट सेक्टर से आता है और इसमें 40 लाख से ज्यादा लोग—जिनमें 60-70 प्रतिशत महिलाएं हैं—काम करते हैं। यदि यह गतिरोध अगले कुछ दिनों में नहीं सुलझा, तो क्रिसमस और विंटर सीजन के अरबों डॉलर के अंतरराष्ट्रीय एक्सपोर्ट ऑर्डर्स रद्द हो सकते हैं, जिसका सीधा असर देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ेगा। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि वेतन बोर्ड और यूनियनों के बीच होने वाली अगली त्रिपक्षीय वार्ता में क्या कोई बीच का रास्ता निकल पाता है या यह बवाल और विकराल रूप लेगा।