किस्तान के खैबर पख्तूनख्वा में दर्दनाक हादसा: भारी बारिश के बीच अचानक भरभराकर गिरी स्कूल की छत

किस्तान के खैबर पख्तूनख्वा में दर्दनाक हादसा: भारी बारिश के बीच अचानक भरभराकर गिरी स्कूल की छत

पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में स्थित खैबर पख्तूनख्वा के एक दूरदराज इलाके में गुरुवार की सुबह उस वक्त मातम में बदल गई, जब पढ़ाई के दौरान एक प्राथमिक विद्यालय की जर्जर छत अचानक भरभराकर सीधे बच्चों पर आ गिरी। सुबह के वक्त जब कक्षाएं पूरी तरह भरी हुई थीं और बच्चे अपनी किताबों में व्यस्त थे, तभी जोरदार धमाके जैसी आवाज हुई और पूरी इमारत का ऊपरी ढांचा ताश के पत्तों की तरह ढह गया। इस भीषण और दिल दहला देने वाले हादसे में कम से कम 28 मासूम छात्र-छात्राओं की मौके पर ही दबकर जान चली गई, जबकि 40 से अधिक बच्चे और शिक्षक मलबे के नीचे बुरी तरह जख्मी हो गए। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक हादसा इतना अचानक हुआ कि किसी को भी कमरे से बाहर निकलने का संभलने तक का मौका नहीं मिला और पूरा क्लासरूम धूल के गुबार और चीख-पुकार के बीच मलबे के ढेर में तब्दील हो गया।

भारी मानसूनी बारिश और प्रशासनिक लापरवाही ने छीनी मासूमों की जिंदगी

स्थानीय अधिकारियों और आपदा प्रबंधन दल के प्रारंभिक बयानों के अनुसार, यह इलाका पिछले कई दिनों से मूसलाधार बारिश और सीलन की चपेट में था। स्कूल की इमारत दशकों पुरानी थी और उसकी मरम्मत को लेकर स्थानीय ग्रामीणों व अभिभावकों ने कई बार शिक्षा विभाग को लिखित शिकायतें दी थीं, लेकिन प्रशासन ने कभी इस पर ध्यान नहीं दिया। लगातार हो रहे जलभराव और भारी नमी के कारण छतों के बीम कमजोर पड़ चुके थे और भार सहन करने की स्थिति में बिल्कुल नहीं थे। जैसे ही सुबह की पहली घंटी बजी और बच्चे अपनी-अपनी बेंचों पर बैठे, छत का मध्य भाग अचानक बैठ गया और सैकड़ों टन वजनी कंक्रीट व गारे का मलबा सीधे मासूमों के सिर पर आ गिरा। इस लापरवाही ने एक झटके में दर्जनों परिवारों के चिराग बुझा दिए और पूरे गांव को आंसुओं में डुबो दिया।

राहत और बचाव कार्य में ग्रामीणों ने दिखाई हिम्मत, मलबे से निकाले शव

हादसे की आवाज सुनते ही आसपास के खेतों और घरों में मौजूद ग्रामीण बदहवास होकर स्कूल परिसर की ओर दौड़ पड़े। प्रशासनिक टीमों और भारी क्रेन के पहुंचने से पहले ही स्थानीय लोगों ने अपने हाथों, फावड़ों और लकड़ी के डंडों से पत्थरों को हटाना शुरू कर दिया ताकि सांस ले रहे बच्चों को बाहर निकाला जा सके। कुछ ही देर में पुलिस, सेना और प्रांतीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (PDMA) की टीमें भी मौके पर पहुंचीं और संयुक्त बचाव अभियान छेड़ा गया। कंक्रीट के भारी स्लैब को हटाने के लिए गैस कटर और हाइड्रोलिक मशीनों का सहारा लिया गया। मलबे से खून से लथपथ बच्चों को जब एक-एक कर निकाला जा रहा था, तो मंजर देखकर रेस्क्यू कर्मियों की आंखें भी नम हो गईं। गंभीर रूप से घायल बच्चों को नजदीकी जिला मुख्यालय अस्पताल और सैन्य अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां कई की हालत अब भी नाजुक बनी हुई है।

बदहाल शिक्षा ढांचे और भ्रष्टाचार पर फिर उठे तीखे सवाल

इस दुखद घटना ने एक बार फिर पूरे पाकिस्तान में सार्वजनिक बुनियादी ढांचे, खासकर दूरदराज और ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों की खस्ताहाली की पोल खोल दी है। स्थानीय मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि शिक्षा बजट का एक बड़ा हिस्सा केवल फाइलों में सिमट कर रह जाता है, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि हजारों बच्चे आज भी जर्जर और असुरक्षित इमारतों के साए में पढ़ाई करने को मजबूर हैं। अभिभावकों का रो-रोकर बुरा हाल है और वे सीधे तौर पर शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों पर गैर-इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज करने की मांग कर रहे हैं। प्रांतीय मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री ने हादसे पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए घटना की उच्चस्तरीय न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं और मृतकों के परिजनों के लिए मुआवजे की घोषणा की है, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि खोए हुए बच्चों की भरपाई कोई मुआवजा नहीं कर सकता।

अस्पतालों में मची अफरातफरी, खून देने के लिए उमड़े नागरिक

हादसे के बाद नजदीकी सरकारी अस्पतालों में इमरजेंसी घोषित कर दी गई है और सभी डॉक्टरों व पैरामेडिकल स्टाफ की छुट्टियां रद्द कर दी गई हैं। जैसे ही खबर फैली कि घायल बच्चों को तुरंत रक्त की जरूरत है, बड़ी संख्या में स्थानीय युवा और सामाजिक संगठनों से जुड़े लोग अस्पताल परिसरों में रक्तदान करने के लिए कतारों में खड़े हो गए। हालांकि अस्पताल में बेड और जीवन रक्षक दवाओं की कमी के चलते परिजनों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। डॉक्टरों का कहना है कि मलबे के भारी दबाव के कारण अधिकांश बच्चों को सिर और रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोटें आई हैं, जिस वजह से अगले 24 से 48 घंटे बेहद संवेदनशील हैं। यह त्रासदी लंबे समय तक इस सवाल को जिंदा रखेगी कि विकास के खोखले दावों के बीच बच्चों की सुरक्षा को आखिरकार कब प्राथमिकता दी जाएगी।