मचाडो से मेडल लेने के बाद क्या सच में नोबेल शांति पुरस्कार जीतेंगे ट्रंप? जानें एक्सपर्ट्स की दो टूक राय
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और नोबेल शांति पुरस्कार (Nobel Peace Prize) का रिश्ता काफी समय से सुर्खियों में रहा है। हाल ही में यह चर्चा तब और तेज हो गई जब वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरीना मचाडो—जिन्होंने लोकतंत्र की बहाली के संघर्ष के लिए 2025 का नोबेल शांति पुरस्कार जीता था—ने व्हाइट हाउस में ट्रंप से मुलाकात के दौरान प्रतीकात्मक समर्थन के तौर पर अपना मूल नोबेल मेडल उन्हें सौंप दिया था। इस घटनाक्रम के बाद खुद डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि वे वैश्विक स्तर पर कई युद्धों को सुलझाने में भूमिका निभा चुके हैं और इस प्रतिष्ठित सम्मान के वास्तविक हकदार हैं। हालांकि, उन्होंने खुद यह संदेह भी जताया कि नॉर्वेजियन नोबेल कमेटी शायद ही उन्हें यह पुरस्कार आधिकारिक रूप से देगी।
इस बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया और कूटनीतिक हलकों में सवाल उठने लगे कि क्या नोबेल समिति की नजर में ट्रंप वास्तव में इस रेस में आगे हैं? क्या मचाडो द्वारा दिया गया मेडल केवल एक प्रतीकात्मक राजनीतिक उपहार था या फिर ट्रंप का नाम सचमुच ओस्लो के विचार-विमर्श में शीर्ष पर चल रहा है?
एक्सपर्ट्स की राय: ट्रंप की संभावनाओं पर क्या कहते हैं नोबेल विश्लेषक?
नॉर्वे और अंतरराष्ट्रीय शांति संस्थानों के स्वतंत्र विश्लेषकों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार मिलने की संभावना बेहद कम है। पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट ओस्लो (PRIO) और अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक्स के विशेषज्ञों के अनुसार, नोबेल कमेटी किसी नेता को पुरस्कार देने से पहले अल्फ्रेड नोबेल की मूल वसीयत और अंतरराष्ट्रीय नियमों के प्रति उसकी दीर्घकालिक प्रतिबद्धता का मूल्यांकन करती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति, बहुपक्षीय वैश्विक समझौतों (जैसे पेरिस जलवायु समझौता या अंतरराष्ट्रीय संधियां) से किनारा करने का इतिहास और हालिया वैश्विक सैन्य तनाव उनके पक्ष को कमजोर करते हैं। नोबेल कमेटी पारंपरिक रूप से ऐसे व्यक्तियों या संस्थाओं को प्राथमिकता देती है जो अंतरराष्ट्रीय कानून, मानवाधिकार, प्रेस की स्वतंत्रता और वैश्विक सहयोग को मजबूत करने के लिए जमीन पर काम करते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, किसी विदेशी विजेता द्वारा अपना मेडल किसी अन्य नेता को भेंट कर देना नोबेल संस्थान के आधिकारिक रिकॉर्ड में कोई कानूनी बदलाव नहीं करता; आधिकारिक रिकॉर्ड में पुरस्कार विजेता केवल वही रहता है जिसे कमेटी ने चुना हो।
2026 में किन दावेदारों पर टिकी है दुनिया की नजर?
नोबेल शांति पुरस्कार की दौड़ में इस बार कई अन्य वैश्विक संगठन और मानवाधिकार कार्यकर्ता आगे बताए जा रहे हैं। विशेषज्ञों और सट्टेबाजी (Betting Odds) के रुझानों के मुताबिक, मौजूदा वैश्विक संकटों को देखते हुए इस साल निम्नलिखित नाम चर्चा में हैं:
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संयुक्त राष्ट्र से जुड़े मानवीय संगठन: युद्धग्रस्त क्षेत्रों में नागरिकों तक भोजन और बुनियादी मदद पहुंचाने वाली राहत एजेंसियां।
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अंतरराष्ट्रीय न्यायिक संस्थाएं: अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) या अंतरराष्ट्रीय आपराधिक अदालत (ICC), जो वैश्विक स्तर पर युद्ध अपराधों और न्याय के लिए काम कर रही हैं।
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प्रेस स्वतंत्रता और नागरिक अधिकार समूह: संघर्ष वाले इलाकों में निष्पक्ष पत्रकारिता की रक्षा करने वाले वैश्विक नेटवर्क।
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सूडान और मध्य पूर्व के जमीनी राहत कार्यकर्ता: 'इमरजेंसी रिस्पॉन्स रूम्स' जैसे स्थानीय समूह जो गृहयुद्ध के बीच जान जोखिम में डालकर काम कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का अंतिम निष्कर्ष यही है कि जहां ट्रंप के समर्थक 'अब्राहम अकॉर्ड्स' और उनके कूटनीतिक समझौतों को नोबेल का मजबूत आधार मानते हैं, वहीं ओस्लो की जूरी का कठोर पैमाना, बहुपक्षीय कूटनीति पर जोर और मानवाधिकारों का रिकॉर्ड ट्रंप की आधिकारिक जीत की राह में सबसे बड़ी दीवार बना हुआ है।