कच्चे तेल की कीमतें 91 डॉलर के पार जाते ही भारत पर मंडराया बड़ा आर्थिक संकट, रूसी डिस्काउंट खत्म और खाड़ी देशों का तेल महंगा होने से क्या अब आसमान छूएंगे पेट्रोल-डीजल के दाम?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आए अचानक और बेकाबू उछाल ने पूरी दुनिया के साथ-साथ भारत की अर्थव्यवस्था के सामने भी एक बड़ी चिंता खड़ी कर दी है। वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति की कमियों के चलते ब्रेंट क्रूड का भाव 91 डॉलर प्रति बैरल के अहम आंकड़े को पार कर चुका है, जिससे दुनिया के तीसरे सबसे बड़े ऊर्जा आयातक देश यानी भारत के लिए मुश्किलें काफी बढ़ गई हैं। पिछले कुछ समय से भारतीय रिफाइनरियों को रूस से रियायती दरों पर जो कच्चा तेल मिल रहा था, उसकी वह भारी छूट अब लगभग समाप्त हो चुकी है। इसके साथ ही पारंपरिक खाड़ी देशों से आने वाला तेल भी प्रीमियम कीमतों पर मिलने लगा है, जिसके कारण देश पर दोहरी मार पड़ती दिख रही है और आम जनता के मन में यह बड़ा सवाल उठ रहा है कि क्या अब पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने वाले हैं।
रूसी तेल पर मिलने वाली रियायतें हुई लगभग समाप्त
यूक्रेन युद्ध के बाद के शुरुआती दौर में भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सुरक्षित रखते हुए रूस से भारी डिस्काउंट पर बड़े पैमाने पर कच्चा तेल खरीदना शुरू किया था। इस सस्ते आयात से देश के विदेशी मुद्रा भंडार और राजकोषीय घाटे को नियंत्रित रखने में बहुत बड़ी मदद मिली थी। लेकिन अब वैश्विक समीकरणों में आए बदलाव और व्यापारिक नीतियों के कारण रूस से मिलने वाली वह भारी छूट लगभग खत्म हो चुकी है। मॉस्को ने अब बाजार की मौजूदा कीमतों के करीब ही तेल बेचना शुरू कर दिया है, जिसका सीधा असर भारतीय तेल विपणन कंपनियों (OMCs) के मुनाफे और आयात बिल पर पड़ रहा है। सस्ते रूसी तेल का विकल्प महंगा होने से देश के लिए क्रूड ऑयल खरीदना काफी खर्चीला साबित हो रहा है।
खाड़ी देशों के तेल और समुद्री ढुलाई पर भी बढ़ गया भारी वित्तीय दबाव
रूस के अलावा मिडिल ईस्ट यानी खाड़ी देशों से आयात होने वाला कच्चा तेल भी अब काफी महंगा हो गया है। सप्लायरों द्वारा बेंचमार्क कीमतों पर अतिरिक्त प्रीमियम वसूला जा रहा है, जिससे भारतीय रिफाइनरियों की इनपुट लागत आसमान छू रही है। इसके अलावा वैश्विक स्तर पर कार्गो जहाजों और टैंकरों की भारी कमी तथा प्रमुख समुद्री मार्गों पर बढ़ते सुरक्षा जोखिमों के कारण ढुलाई लागत यानी फ्रेट कॉस्ट में भी बेतहाशा वृद्धि दर्ज की गई है। पश्चिम अफ्रीका और अन्य वैकल्पिक बाजारों से क्रूड ऑयल मंगवाने पर भी कंपनियों को पारंपरिक दरों से ज्यादा भुगतान करना पड़ रहा है, जिससे देश का कुल ऊर्जा आयात बिल भारी दबाव में आ गया है।
क्या आम आदमी की जेब पर पड़ेगा असर और बढ़ेंगे पेट्रोल-डीजल के दाम?
कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में लगातार हो रही इस बढ़ोतरी और रिफाइनरियों की आयात लागत बढ़ने के कारण सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। वर्तमान स्थिति को देखते हुए फिलहाल भारत में सरकारी तेल कंपनियों की ओर से पेट्रोल और डीजल के खुदरा दामों में तुरंत बढ़ोतरी को लेकर कोई आधिकारिक और अंतिम फैसला नहीं लिया गया है। हालांकि, पेट्रोलियम मंत्रालय और ऑयल मार्केटिंग कंपनियां वैश्विक बाजार के उतार-चढ़ाव और क्रूड कीमतों की रोजाना की चाल पर बेहद बारीकी से नजर बनाए हुए हैं। यदि कच्चे तेल के दाम इसी उच्च स्तर पर लंबे समय तक टिके रहते हैं और आयात का यह दबाव कम नहीं होता है, तो आने वाले दिनों में ईंधन की कीमतों को लेकर नए सिरे से विचार करना पड़ सकता है।
देश की अर्थव्यवस्था और महंगाई पर संभावित प्रभाव
ऊर्जा क्षेत्र के वरिष्ठ विश्लेषकों का मानना है कि कच्चे तेल के 91 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने से देश के आयात बिल में भारी इजाफा होगा, जिसका असर सीधे तौर पर चालू खाता घाटे (Current Account Deficit) पर पड़ सकता है। यदि ईंधन के दाम बढ़ते हैं तो परिवहन लागत महंगी होने से रोजमर्रा की जरूरी वस्तुएं, फल, सब्जियां और अन्य उपभोक्ता सामान भी महंगे हो सकते हैं, जिससे महंगाई दर में उछाल आने का खतरा पैदा हो जाता है। सरकार और नीति निर्माताओं के सामने इस समय एक बड़ी चुनौती यह है कि वे अंतरराष्ट्रीय बाजार के इस झटके से घरेलू अर्थव्यवस्था और आम नागरिकों को किस प्रकार सुरक्षित रखते हैं। आने वाले हफ्तों में वैश्विक तेल बाजार की दिशा ही यह तय करेगी कि भारतीय उपभोक्ताओं को महंगाई के मोर्चे पर कितनी राहत मिलती है।