'जब भरोसा दिया था तो फिर कैसे किया गिरफ्तार?' नंदीग्राम उपचुनाव कैंडिडेट केस में शुभेंदु सरकार को हाईकोर्ट की कड़ी फटकार

'जब भरोसा दिया था तो फिर कैसे किया गिरफ्तार?' नंदीग्राम उपचुनाव कैंडिडेट केस में शुभेंदु सरकार को हाईकोर्ट की कड़ी फटकार

पश्चिम बंगाल की हाई-प्रोफाइल नंदीग्राम विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव से ठीक पहले सियासी और कानूनी घमासान चरम पर पहुंच गया है। इस सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार मिलन प्रधान की 2007 के भूमि आंदोलन से जुड़े पुराने आपराधिक मामलों में गिरफ्तारी को लेकर कलकत्ता हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई है।

जस्टिस सौगत भट्टाचार्य की एकल पीठ ने राज्य सरकार से कड़े लहजे में पूछा कि जब 22 सितंबर को अदालत में आश्वासन दिया गया था कि पुराने मामलों में उम्मीदवार के खिलाफ कोई और दंडात्मक कदम नहीं उठाया जाएगा, तो फिर 2007 के एक और मामले में उन्हें चुपके से 'गिरफ्तार' (Shown Arrest) कैसे दिखा दिया गया? अदालत ने राहत देते हुए आदेश दिया कि खेजुरी थाने के इस केस में मिलन प्रधान को 12 अक्टूबर तक गिरफ्तार नहीं माना जाएगा और पुलिस उनके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं करेगी।

कोर्ट में क्या हुआ? '2021 से वारंट पेंडिंग था तो 18 सितंबर तक क्या कर रहे थे?'

सुनवाई के दौरान जब यह बात सामने आई कि 22 सितंबर को हाईकोर्ट के आश्वासन के बावजूद 23 सितंबर को निचली अदालत से मिलन प्रधान को खेजुरी थाने के एक पुराने केस में 7 अक्टूबर तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया, तो अदालत ने गहरी नाराजगी जताई:

  • वारंट छुपाने पर सवाल: जस्टिस सौगत भट्टाचार्य ने पूछा कि जब पिछली सुनवाई में राज्य सरकार ने कहा था कि पांच मामलों में गिरफ्तारी हुई है, पांच बंद हो चुके हैं और एक में वह आरोपी नहीं हैं, तो फिर यह नया छठा मामला अचानक कहां से आ गया? इसका खुलासा पहले कोर्ट के सामने क्यों नहीं किया गया?

  • जज का तीखा सवाल: राज्य की ओर से एडिशनल एडवोकेट जनरल (AAG) राजदीप मजूमदार ने दलील दी कि 2021 में हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच द्वारा केस बहाल किए जाने के बाद से ही गिरफ्तारी वारंट पेंडिंग थे। इस पर जज ने सीधा सवाल दागा— "अगर 2021 में वारंट जारी हुए थे, तो जांच अधिकारी 18 सितंबर 2026 तक क्या कर रहे थे? ऐन चुनाव के वक्त ही पुलिस क्यों जागी?"

  • अदालत का सम्मान करने की नसीहत: हाईकोर्ट ने कहा कि जब राज्य के अपने बयान के आधार पर आदेश दर्ज हुआ था, तो प्रशासन को अदालत का सम्मान करना चाहिए था और उम्मीदवार के खिलाफ इस तरह नए केस नहीं थोपने चाहिए थे।

नंदीग्राम उपचुनाव: ममता के समर्थन के बाद गरमाई सियासत

नंदीग्राम में 6 अक्टूबर को मतदान होना है, जो मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के इस सीट से इस्तीफा देने (भवानीपुर सीट बरकरार रखने) के बाद खाली हुई है। इस उपचुनाव में सियासी समीकरण बेहद दिलचस्प हो चुके हैं:

  1. ममता बनर्जी का कांग्रेस को समर्थन: टीएमसी उम्मीदवार सचिता प्रधान डे द्वारा पर्चा वापस लिए जाने के बाद ममता बनर्जी गुट ने कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान को अपना खुला समर्थन दे दिया था।

  2. समर्थन मिलते ही गिरफ्तारी: जैसे ही विपक्ष लामबंद हुआ, पुलिस ने 18 सितंबर को 19 साल पुराने 2007 नंदीग्राम आंदोलन से जुड़े मामलों (जिनमें हत्या, दंगा और आर्म्स एक्ट शामिल हैं) में गैर-जमानती वारंट के आधार पर मिलन प्रधान को गिरफ्तार कर लिया।

  3. कांग्रेस और विपक्ष के आरोप: कांग्रेस और विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार उपचुनाव में हार के डर से उम्मीदवार को पूरे प्रचार अभियान से बाहर रखने के लिए जेल में डाल रही है, ताकि वह 4 अक्टूबर को प्रचार खत्म होने तक बाहर न आ सकें।

'उम्मीदवार को चुनाव लड़ने दिया जाए': हाईकोर्ट का मौखिक निर्देश

हाईकोर्ट ने मौखिक टिप्पणी में यह भी स्पष्ट किया कि प्रशासन को मिलन प्रधान को चुनाव लड़ने की पूरी अनुमति देनी चाहिए। यदि वह अन्य मामलों में जमानत हासिल कर लेते हैं, तो पुलिस को उन्हें चुनाव प्रक्रिया से वंचित करने के लिए पुराने मामलों का सहारा नहीं लेना चाहिए।

हालांकि, एकल पीठ के इस आदेश के खिलाफ राज्य सरकार ने चीफ जस्टिस आर. वी. घुगे की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच का दरवाजा खटखटाया है, जिस पर आगे की कानूनी जंग जारी रहेगी।