CJI ने शिवसेना केस की याद दिलाकर चुनाव आयोग से पूछा- कब तक आएगा अंतिम फैसला?
तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर दो गुटों के बीच पार्टी के नाम और 'फूल और घास' (जोड़ा फूल) चुनाव चिह्न के मालिकाना हक को लेकर चल रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर पहुंच चुका है। पार्टी के विभाजन के बाद चुनाव आयोग द्वारा मूल नाम और चुनाव चिह्न को फ्रीज किए जाने के अंतरिम आदेश के खिलाफ पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा दाखिल याचिका पर शीर्ष अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है।
प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग से सीधा सवाल किया कि वह इस विवाद पर अंतिम फैसला सुनाने के लिए कितना समय लेगा। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि मामले को लंबा नहीं खींचा जा सकता और आयोग एक उचित व व्यावहारिक समय-सीमा (Timeframe) बताए।
'शिवसेना विवाद में देरी का नतीजा हम देख चुके हैं': सुप्रीम कोर्ट की दो-टूक
सुनवाई के दौरान अदालत ने महाराष्ट्र के शिवसेना विवाद में हुई लंबी देरी का संदर्भ देते हुए कहा कि राजनीतिक दलों के आंतरिक विवादों को अनिश्चितकाल के लिए लटका कर नहीं रखा जा सकता।
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जब प्रतिद्वंद्वी गुट की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि आयोग ने पहले भी शिवसेना और अन्य मामलों में चुनाव चिन्ह फ्रीज करने जैसी अंतरिम व्यवस्था की है, तो पीठ में शामिल न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने दो-टूक टिप्पणी की— "हमने शिवसेना मामले में देरी का क्या नतीजा होता है, वह अच्छी तरह देखा है।"
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CJI सूर्यकांत ने चुनाव आयोग के वकील डी. एस. नायडू से कहा कि वे आयोग से निर्देश लेकर अदालत को अवगत कराएं कि विवाद के अंतिम निपटारे में कितना वक्त लगेगा।
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पीठ ने कहा कि समय-सीमा ऐसी होनी चाहिए जिसमें दोनों पक्षों को अपने दस्तावेज व सबूत पेश करने का निष्पक्ष मौका भी मिले, लेकिन साथ ही निर्णय में अनावश्यक देरी भी न हो। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर को तय की है।
कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग की नीयत पर उठाए सवाल
ममता बनर्जी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग के अंतरिम आदेश की टाइमिंग पर तीखा हमला बोला:
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सिब्बल ने कहा कि यह विवाद जुलाई में ही चुनाव आयोग के समक्ष पहुंच गया था, लेकिन आयोग महीनों तक हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा।
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जब पश्चिम बंगाल की दो विधानसभा सीटों (नंदीग्राम और रेजीनगर) पर उपचुनाव की प्रक्रिया शुरू हो गई और नामांकन दाखिल हो रहे थे, तब ऐन वक्त पर आयोग ने अचानक पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न फ्रीज कर दिया।
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सिब्बल ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग का यह कदम ममता बनर्जी के कानूनी विकल्पों और अदालती राहत के रास्ते को बंद करने की सोची-समझी मंशा जैसा है। उन्होंने मांग की कि आगामी निकाय चुनावों को देखते हुए आयोग को अक्टूबर के भीतर ही अंतिम फैसला करने का निर्देश दिया जाए।
क्या उपचुनाव की अंतरिम व्यवस्था में दखल देगा कोर्ट?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 6 अक्टूबर को होने वाले उपचुनावों के लिए चुनाव आयोग द्वारा बनाई गई अंतरिम व्यवस्था में फिलहाल दखल देना संभव नहीं होगा। न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि चुनाव का शेड्यूल पहले ही अधिसूचित हो चुका है, इसलिए जारी चुनाव प्रक्रिया के बीच अंतरिम व्यवस्था को नहीं छेड़ा जा सकता।
पीठ का मुख्य ध्यान इस बात पर है कि चुनाव आयोग दोनों पक्षों की दलीलें सुनकर इस विवाद को हमेशा के लिए जल्द से जल्द कैसे सुलझाएगा।
क्या है चुनाव आयोग का अंतरिम आदेश?
निर्वाचन आयोग ने 17 सितंबर को दोनों गुटों को मूल नाम और 'फूल-घास' चुनाव चिह्न के इस्तेमाल से रोकते हुए अस्थायी पहचान दी थी:
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ममता बनर्जी गुट: इन्हें 'ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' (Mamata All India Trinamool Congress) नाम और 'फुटबॉल खिलाड़ी' (Football Player) चुनाव चिह्न आवंटित किया गया है।
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बागी गुट (अरूप रॉय/ऋतब्रत बनर्जी): इन्हें 'डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस' (Democratic Trinamool Congress) नाम और 'लिफाफा' (Envelope) चुनाव चिह्न दिया गया है।
ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के इस कदम को पार्टी की पहचान छीनने की साजिश और देश के लोकतांत्रिक इतिहास का 'काला दिन' करार दिया था। अब 28 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई पर पूरे देश की निगाहें टिकी हैं कि चुनाव आयोग अंतिम फैसले के लिए अदालत के सामने क्या टाइमलाइन पेश करता है।