कौन हैं सीमा खन्ना? मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ विपक्ष के निशाने पर आईं ECI की IT चीफ
भारत निर्वाचन आयोग (ECI) और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को लेकर सियासी पारा पहले से ही चढ़ा हुआ था, लेकिन अब इस विवाद में आयोग की एक और वरिष्ठ अधिकारी का नाम सामने आने से हंगामा और बढ़ गया है। विपक्षी दलों ने आयोग की सूचना प्रौद्योगिकी महानिदेशक (DG-IT) डॉ. सीमा खन्ना को निशाने पर लेते हुए मतदाता सूची (Voter List) के प्रबंधन और सॉफ्टवेयर कंट्रोल में गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगाए हैं।
तृणमूल कांग्रेस (TMC) के वरिष्ठ नेताओं और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल सहित कई विपक्षी नेताओं ने दावा किया है कि चुनाव आयोग के पूरे डिजिटल ढांचे और वोटर लिस्ट के केंद्रीयकरण के पीछे सीमा खन्ना की भूमिका रही है। आइए विस्तार से समझते हैं कि सीमा खन्ना कौन हैं और उन पर क्या आरोप लगाए जा रहे हैं।
कौन हैं डॉ. सीमा खन्ना?
चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट और रिकॉर्ड्स के अनुसार, डॉ. सीमा खन्ना निर्वाचन आयोग में महानिदेशक (सूचना प्रौद्योगिकी - DG, IT) के पद पर तैनात हैं।
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वह राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) से जुड़ी वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी रही हैं और इलेक्ट्रॉनिक्स व सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स का हिस्सा रही हैं।
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पूर्व में उन्होंने कोरोना महामारी के दौरान देश भर में चर्चित हुए 'आरोग्य सेतु' (Aarogya Setu) ऐप के तकनीकी ऑपरेशंस का नेतृत्व किया था और नेशनल नॉलेज नेटवर्क (NKN) जैसे बड़े डिजिटल प्रोजेक्ट्स में अहम भूमिका निभाई थी।
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चुनाव आयोग में आने के बाद उन्हें आयोग के संपूर्ण आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर, वोटर रजिस्ट्रेशन नेटवर्क और चुनावी ऐप्स के आधुनिकीकरण की कमान सौंपी गई थी।
विवाद की मुख्य जड़: ECINet और ERONet सॉफ्टवेयर
यह पूरा विवाद उस वक्त शुरू हुआ जब मीडिया में एक खोजी रिपोर्ट सामने आई, जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयोग के दो चुनाव आयुक्तों— सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में मुख्य चुनाव आयुक्त के फैसलों पर करीब 14 बार अपनी लिखित आपत्ति दर्ज कराई थी। इन आपत्तियों में सबसे बड़ा मुद्दा 'ECINet' और 'ERONet' का केंद्रीकरण था।
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40 से ज्यादा ऐप्स का एकीकरण: आयोग ने 22 जनवरी को 'ECINet' प्लेटफॉर्म लॉन्च किया था, जिसके तहत चुनाव आयोग के 40 से अधिक अलग-अलग पोर्टल्स और ऐप्स को एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म के नीचे ला दिया गया।
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अधिकारियों के अधिकार सीमित करने का आरोप: कानूनी तौर पर मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने या संशोधित करने का वैधानिक अधिकार फील्ड में तैनात निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (EROs), सहायक निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (AEROs) और जिला निर्वाचन अधिकारियों (DEOs) के पास होता है। आरोप है कि नए सॉफ्टवेयर सिस्टम के जरिए स्थानीय अधिकारियों के अधिकारों और एक्सेस को दिल्ली में बैठे आईटी विभाग द्वारा सीमित या नियंत्रित (केंद्रीकृत) कर दिया गया।
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रोलबैक सुविधा न मिलना (गोवा का मामला): विवाद तब और गहरा गया जब गोवा में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत ईआरओ द्वारा 97 वैध मतदाताओं के नाम बहाल करने के फैसले लिए गए, लेकिन सॉफ्टवेयर में 'रोलबैक' का विकल्प एक्टिव न होने के कारण उन मतदाताओं के नाम अंतिम सूची से बाहर रह गए। आरोप है कि गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने कई बार पत्र लिखे, लेकिन दिल्ली के आईटी प्रभाग ने समय रहते सिस्टम में बदलाव नहीं किए।
विपक्ष ने लगाए डेटा में हेराफेरी के आरोप
लोकसभा सांसद कल्याण बनर्जी (TMC) ने सीधे तौर पर सीमा खन्ना पर हमला बोलते हुए कहा:
"सीमा खन्ना की भूमिका पर बहुत बड़ा विवाद है। उन्होंने डेटा में हेरफेर किया, जिसे हम एसआईआर (SIR) प्रक्रिया शुरू होने से पहले से उठाते रहे हैं। देश भर में जमीनी स्तर पर चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं और निष्पक्षता खत्म हो रही है।"
वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता और सांसद कपिल सिब्बल ने भी आरोप लगाया कि 40 पोर्टल्स और ऐप्स को एक साथ लाकर सारा नियंत्रण आयोग के शीर्ष स्तर और आईटी विंग के अधीन कर दिया गया। उन्होंने दावा किया कि इससे लाखों मतदाताओं के नाम सूची से हटने की आशंका पैदा हो गई है। तृणमूल कांग्रेस नेता अभिषेक बनर्जी भी पहले वोटर डेटा विश्लेषण की गति और प्रणाली पर सवाल उठा चुके हैं।
चुनाव आयोग की सफाई: सख्त डेटा प्रोटोकॉल के तहत काम
विपक्ष के तीखे हमलों और मीडिया में आई रिपोर्टों के बाद चुनाव आयोग ने इन आरोपों का खंडन किया है:
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आयोग का कहना है कि ईसीआई के सभी नीतिगत फैसले पूर्ण आयोग की सहमति और विचार-विमर्श से ही लिए जाते हैं।
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आयोग ने स्पष्ट किया कि ECINet जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म बेहद कड़े और सुरक्षित डेटा सुरक्षा प्रोटोकॉल (Data Security Protocols) के तहत संचालित होते हैं।
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आयोग के अनुसार, मतदाता सूची में किसी भी नागरिक का नाम जोड़ने या हटाने की शक्ति पूरी तरह से संबंधित कानून के तहत अधिकृत फील्ड अधिकारियों (EROs/DEOs) के पास ही सुरक्षित है और सॉफ्टवेयर का काम सिर्फ प्रक्रिया को पारदर्शी व सुरक्षित बनाना है।
संविधान के तहत निष्पक्ष चुनाव कराने वाली सबसे बड़ी संस्था के भीतर अधिकारियों की खींचतान और अब शीर्ष तकनीकी अधिकारी पर राजनीतिक दलों द्वारा सीधे आरोप लगाए जाने से यह विवाद सुप्रीम कोर्ट से लेकर संसद के गलियारों तक गर्माता नजर आ रहा है।