ठंडा पड़ा PNG पर सरकारी अभियान, सिर्फ 20% ने दिखाई रुचि; अब LPG सिलेंडर वाले ग्राहकों की क्यों बढ़ेगी टेंशन?
देश में रसोई गैस वितरण प्रणाली को आधुनिक, सुरक्षित और पाइपलाइन आधारित बनाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा छेड़ा गया महत्त्वाकांक्षी अभियान फिलहाल सुस्त रफ्तार का शिकार होता नजर आ रहा है। घरों तक पाइप से सस्ती और 24 घंटे निर्बाध प्राकृतिक गैस (PNG) पहुंचाने के लिए तैयार किए गए बुनियादी ढांचे के बावजूद देश के लाखों परिवार अब भी पारंपरिक एलपीजी (LPG) सिलेंडर का मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं। सरकार की ओर से लाखों संदेशों, विज्ञापनों और 33 हजार से अधिक जागरूकता शिविरों के बावजूद जिन इलाकों में पीएनजी पाइपलाइन बिछ चुकी है, वहां के केवल 20 प्रतिशत पात्र उपभोक्ताओं ने ही पाइप्ड गैस के लिए आवेदन किया है। उपभोक्ताओं की इस बेरुखी के बाद पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने सख्त रुख अपनाने के संकेत दिए हैं। नए नियमों के तहत यदि तय समयसीमा में नोटिस मिलने के बाद भी कोई उपभोक्ता पीएनजी पर स्विच नहीं करता है, तो उसकी रसोई से एलपीजी सिलेंडर की आपूर्ति बंद की जा सकती है।
आंकड़े बयां कर रहे हकीकत: 21.7 लाख में से सिर्फ 4.4 लाख ने किया आवेदन, 33 हजार कैंप भी बेअसर
पेट्रोलियम मंत्रालय और सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन (CGD) कंपनियों द्वारा संकलित किए गए आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि पीएनजी विस्तार की जमीनी रफ्तार अपेक्षा से काफी धीमी है। आंकड़ों के मुताबिक, सीजीडी कंपनियों ने देश के विभिन्न शहरों में ऐसे लगभग 21.7 लाख घरेलू एलपीजी उपभोक्ताओं की पहचान की थी, जिनके घरों के ठीक बाहर या उनकी हाउसिंग सोसायटियों तक पीएनजी का पाइपलाइन नेटवर्क पहुंच चुका है और वे तकनीकी रूप से तुरंत कनेक्शन लेने के लिए पूरी तरह पात्र हैं।
इन उपभोक्ताओं को पाइप वाली गैस से जोड़ने के लिए कंपनियों ने व्यापक स्तर पर संपर्क अभियान चलाया। ग्राहकों को व्हाट्सएप पर व्यक्तिगत संदेश भेजे गए, हाउसिंग सोसायटियों में फिजिकल नोटिस बांटे गए और आरडब्ल्यूए (RWA) के साथ मिलकर 33,000 से अधिक ऑन-ग्राउंड कैंप आयोजित किए गए। इसके बावजूद अब तक 21.7 लाख में से केवल 4.4 लाख उपभोक्ताओं ने ही पीएनजी कनेक्शन के लिए औपचारिक आवेदन जमा किया है। इनमें से भी करीब 3.3 लाख घरों में ही मीटर लगाकर गैस आपूर्ति चालू की जा सकी है। सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि पिछले पांच महीनों के दौरान पीएनजी अपनाने के बाद केवल 1.4 लाख परिवारों ने ही अपने पुराने एलपीजी सिलेंडर सरेंडर किए हैं। शेष परिवार या तो पीएनजी लगाने में हिचकिचा रहे हैं या फिर दोनों कनेक्शन एक साथ रखकर नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं।
क्यों बढ़ेगी LPG उपभोक्ताओं की टेंशन? नए 'कंट्रोल ऑर्डर 2026' में कनेक्शन रद्द करने का प्रावधान
उपभोक्ताओं की इसी उदासीनता को तोड़ने के लिए सरकार ने कानूनी नियमों का शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। सरकार द्वारा अधिसूचित नए 'एलपीजी (सप्लाई एंड डिस्ट्रीब्यूशन रेगुलेशन) कंट्रोल ऑर्डर 2026' और 'नेचुरल गैस डिस्ट्रीब्यूशन ऑर्डर 2026' के तहत स्पष्ट प्रावधान किया गया है कि जिन भौगोलिक क्षेत्रों या सोसायटियों में पीएनजी नेटवर्क चालू हो चुका है, वहां एक ही घर में एलपीजी सिलेंडर और पीएनजी दोनों का दोहरा कनेक्शन रखना पूरी तरह प्रतिबंधित होगा।
नए नियमों के अनुसार, जिन इलाकों में पाइपलाइन उपलब्ध है, वहां के एलपीजी ग्राहकों को तेल विपणन कंपनियों और स्थानीय प्रशासन की ओर से विधिवत नोटिस जारी किया जाएगा। नोटिस में दी गई समयावधि के भीतर यदि उपभोक्ता पीएनजी कनेक्शन के लिए आवेदन नहीं करता है और अपना एलपीजी सिलेंडर सरेंडर करने की प्रक्रिया शुरू नहीं करता, तो तेल कंपनियां उसके एलपीजी कनेक्शन को स्वतः ब्लॉक या रद्द (Cancel) कर सकती हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले दिनों में उन शहरों के उपभोक्ताओं के सामने अचानक रसोई गैस संकट खड़ा हो सकता है जो पाइपलाइन उपलब्ध होने के बाद भी केवल आदत या अनिच्छा के चलते सिलेंडर पर निर्भर बने हुए हैं।
जिला स्तर पर नोडल अफसर और PCC की निगरानी: पेट्रोलियम मंत्रालय का राज्यों को कड़ा पत्र
अभियान में तेजी लाने के लिए पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के सचिव डॉ. नीरज मित्तल ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को एक विस्तृत पत्र भेजकर प्रशासनिक मशीनरी को सीधे मैदान में उतारने का निर्देश दिया है। मंत्रालय ने राज्यों से कहा है कि वे खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग (Food & Civil Supplies) से जिला आपूर्ति अधिकारी (DSO) स्तर के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी को हर जिले में नोडल अधिकारी नियुक्त करें।
इन नोडल अधिकारियों का काम सीजीडी कंपनियों, तेल कंपनियों (IOCL, BPCL, HPCL) के एलपीजी डिस्ट्रीब्यूटर्स और रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशनों (RWA) के बीच समन्वय स्थापित करना होगा। हर जिले में एक 'पीएनजी कोऑर्डिनेशन कमेटी' (PCC) गठित की जा रही है। यह कमेटी उन सोसायटियों और मोहल्लों की सूची बनाएगी जहां पाइपलाइन पहुंच चुकी है। पाइपलाइन बिछाने में स्थानीय स्तर पर आने वाली अनुमतियों (राइट ऑफ वे), सोसायटियों के अंदर खुदाई से जुड़े विवादों और उपभोक्ताओं के भ्रम को दूर करने का जिम्मा सीधे जिला प्रशासन के हाथों में होगा ताकि कोई भी गैस वितरण कंपनी बुनियादी ढांचे के अभाव या प्रशासनिक अड़चनों का बहाना न बना सके।
मिडिल ईस्ट संकट, लॉजिस्टिक्स का बोझ और ऊर्जा सुरक्षा: सरकार क्यों उतारना चाहती है LPG का बोझ?
सरकार के इस आक्रामक रुख के पीछे देश की व्यापक रणनीतिक और ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) जुड़ी हुई है। भारत अपनी कुल घरेलू एलपीजी खपत का लगभग 60 से 65 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करता है। इसमें से बड़ा हिस्सा सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर और कुवैत जैसे पश्चिम एशियाई देशों से समुद्री जहाजों के जरिए आता है, जो होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे संवेदनशील समुद्री मार्गों से होकर गुजरते हैं।
पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव, अमेरिकी-ईरानी गतिरोध और लाल सागर के संकट ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एलपीजी की ढुलाई लागत और आपूर्ति जोखिम को कई गुना बढ़ा दिया है। इसके अतिरिक्त, देश भर में 30 करोड़ से अधिक एलपीजी सिलेंडरों को भारी ट्रकों के माध्यम से रिफाइनरियों से बॉटलिंग प्लांट और फिर उपभोक्ता के घर तक पहुंचाने में हजारों करोड़ रुपये का लॉजिस्टिक्स खर्च और कार्बन उत्सर्जन होता है। इसके विपरीत, घरेलू पीएनजी आपूर्ति काफी हद तक देश में उत्पादित होने वाली प्राकृतिक गैस से संचालित होती है और यह भूमिगत पाइपलाइन के जरिए सीधे रसोई तक पहुंचती है। ऐसे में यदि शहरी आबादी पीएनजी पर शिफ्ट हो जाती है, तो सरकार के लिए आयातित एलपीजी को ग्रामीण और दूरदराज के उन क्षेत्रों तक केंद्रित करना आसान हो जाएगा जहां पाइपलाइन बिछाना भौगोलिक रूप से संभव नहीं है।
1 सितंबर से CGD कंपनियों के लिए नई इंसेंटिव स्कीम: सप्लाई और सब्सिडी का गणित
पीएनजी नेटवर्क को तेज करने के लिए सरकार केवल ग्राहकों पर दबाव ही नहीं बना रही, बल्कि गैस वितरण कंपनियों को भी बड़ा आर्थिक प्रोत्साहन दे रही है। पेट्रोलियम मंत्रालय ने 'इन्सेंटिव स्कीम फॉर प्रमोशन ऑफ डोमेस्टिक पीएनजी कनेक्शंस' को मंजूरी दी है, जो 1 सितंबर से छह महीने की अवधि के लिए दो चरणों में लागू हो रही है।
इस योजना के तहत, जो भी सीजीडी कंपनी अपने क्षेत्र में बिना बिल वाले (Unbilled) निष्क्रिय कनेक्शनों को चालू करेगी या नया सक्रिय बिलिंग वाला घरेलू पीएनजी कनेक्शन जोड़ेगी, उसे प्रति नए कनेक्शन पर 200 स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर (SCM) अतिरिक्त सस्ती घरेलू प्राकृतिक गैस आवंटित की जाएगी। वर्तमान में कंपनियों को सीएनजी और वाणिज्यिक आपूर्ति के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार से महंगी एलएनजी (LNG) खरीदनी पड़ती है। सस्ती घरेलू गैस मिलने से कंपनियों की गैस सोर्सिंग लागत में भारी कमी आएगी और उनके पूंजीगत खर्च (कैपेक्स) की भरपाई 10 साल के बजाय महज तीन साल में हो सकेगी। इससे कंपनियों के पास ग्राहकों को शुरुआती कनेक्शन पर छूट या आसान किस्तों (EMI) की सुविधा देने का वित्तीय आधार तैयार होगा।
उपभोक्ताओं की हिचक और आगे की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि पीएनजी की ओर धीमी गति से बढ़ने के पीछे उपभोक्ताओं के मन में सुरक्षा से जुड़े कुछ पुराने डर और शुरुआती सिक्योरिटी डिपॉजिट का खर्च शामिल है। कई किराएदार या मकान मालिक दीवारों में अतिरिक्त पाइपलाइन की ड्रिलिंग कराने से कतराते हैं। हालांकि, लागत के लिहाज से पीएनजी आज भी एलपीजी सिलेंडर की तुलना में 15 से 20 प्रतिशत तक सस्ती पड़ती है और इसमें सिलेंडर खत्म होने, बुकिंग करने या डिलीवरी का इंतजार करने का कोई झंझट नहीं होता।
आने वाले महीनों में जब जिला प्रशासन और नोडल अधिकारी सोसायटियों में अनिवार्य वेरिफिकेशन शुरू करेंगे, तब एलपीजी उपभोक्ताओं को स्पष्ट फैसला लेना होगा। साफ है कि सरकार का विजन शहरों को पाइपलाइन नेटवर्क पर पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाने का है, और जिन इलाकों में पाइपलाइन पहुंच चुकी है, वहां एलपीजी सिलेंडर को बैकअप के रूप में रखने की छूट अब हमेशा के लिए खत्म होने जा रही है।