2008 के वित्तीय संकट के बाद सबसे महंगा हुआ सरकारी कर्ज, वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं पर बढ़ा भारी दबाव

2008 के वित्तीय संकट के बाद सबसे महंगा हुआ सरकारी कर्ज, वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं पर बढ़ा भारी दबाव

वर्तमान समय में दुनिया भर की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के सामने एक बार फिर से गंभीर वित्तीय चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। वर्ष 2008 के विनाशकारी वैश्विक वित्तीय संकट के बाद यह पहला मौका है जब सरकारों के लिए कर्ज लेना इतना महंगा साबित हो रहा है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और जापान जैसे विकसित देशों में सरकारी बॉन्ड की यील्ड (ब्‍याज दरें) में बेतहाशा बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस वित्तीय दबाव के कारण दुनिया भर के बाजारों में अनिश्चितता का माहौल बन गया है और नीति निर्माताओं की चिंताएं काफी बढ़ गई हैं।

क्यों बढ़ रही है सरकारी कर्ज की लागत?

विशेषज्ञों के अनुसार, इस स्थिति के पीछे कई प्रमुख आर्थिक कारण जिम्मेदार हैं। वैश्विक स्तर पर लगातार बनी हुई महंगाई और केंद्रीय बैंकों की सख्त मौद्रिक नीतियां मुख्य वजह हैं। इसके अलावा, पश्चिम एशिया (Middle East) में जारी भू-राजनीतिक तनाव और संघर्ष के कारण कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है। कच्चे तेल के महंगे होने से वैश्विक स्तर पर महंगाई के लंबे समय तक टिके रहने का खतरा पैदा हो गया है, जिसके चलते निवेशक सरकारी बॉन्ड पर ज्यादा रिटर्न की मांग कर रहे हैं।

प्रमुख देशों के बॉन्ड बाजार का हाल

दुनिया के प्रमुख देशों में ऋण की लागत रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी है:

  • अमेरिका: अमेरिकी अर्थव्यवस्था में लंबी अवधि के सरकारी कर्ज की लागत 2007-2008 के क्रेडिट क्रंच के बाद के सबसे ऊपरी स्तर पर पहुंच गई है, जहां 30 साल की ट्रेजरी यील्ड बढ़कर 5.29% हो गई है।

  • फ्रांस और जर्मनी: फ्रांस के 30 साल के बॉन्ड की यील्ड सितंबर 2008 के बाद के सबसे ऊंचे स्तर यानी लगभग 4.85% से ऊपर निकल गई है। वहीं, जर्मनी के बॉन्ड यील्ड में भी 2011 के बाद की सबसे बड़ी तेजी दर्ज की गई है।

  • जापान: जापान में 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड तीन दशकों के सबसे उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है, जो निवेशकों के बीच बढ़ती घबराहट को स्पष्ट करता है।

केंद्रीय बैंकों के सामने नीतिगत उलझन

बढ़ती महंगाई और सुस्त पड़ती आर्थिक वृद्धि दर के दोहरे दबाव ने दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों को एक कठिन असमंजस में डाल दिया है। यदि केंद्रीय बैंक ब्याज दरों को बढ़ाते हैं, तो अर्थव्यवस्था की रफ्तार और धीमी हो सकती है, और यदि ब्याज दरें नहीं बढ़ाई जाती हैं, तो महंगाई बेकाबू हो सकती है। वित्तीय बाजार के जानकारों का मानना है कि यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ECB) और अन्य प्रमुख बैंक आने वाले महीनों में ब्याज दरों में और बढ़ोतरी करने पर विचार कर सकते हैं, जिससे सरकारों के लिए अपना पुराना कर्ज चुकाना और नया कर्ज लेना और अधिक महंगा हो जाएगा।

वैश्विक बाजारों और भारत पर इसका संभावित असर

जब दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं कर्ज के भारी बोझ और ऊंची ब्याज दरों से जूझती हैं, तो इसका असर पूरी वैश्विक व्यापार श्रृंखला पर पड़ता है। विकासशील देशों के लिए विदेशी पूंजी जुटाना महंगा हो जाता है और मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है। निवेशकों के बीच जोखिम की आशंका बढ़ने से शेयर बाजारों में भी करेक्शन देखने को मिल सकता है। वित्तीय विशेषज्ञों का सुझाव है कि मौजूदा वैश्विक आर्थिक हालातों को देखते हुए निवेशकों को बेहद सतर्क रहने और अपनी वित्तीय रणनीतियों को नए सिरे से आंकने की आवश्यकता है।