स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का विकल्प: भारतीय कंपनी EIL को मिल सकता है 1 अरब डॉलर का प्रोजेक्ट
पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक संघर्ष और ईरान से जुड़ी तनातनी के कारण दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री व्यापारिक गलियारे 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (हॉर्मुज जलडमरूमध्य) पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। इस मार्ग से कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की सुरक्षित निकासी को लेकर बढ़ती अनिश्चितता के बीच खाड़ी क्षेत्र की दो सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्तियों—सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई)—ने इस समुद्री चोकपॉइंट पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए वैकल्पिक मार्गों की तलाश तेज कर दी है। इसी कड़ी में भारत सरकार के स्वामित्व वाली नवरत्न पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग 'इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड' (EIL) दोनों खाड़ी देशों के साथ बड़े पैमाने पर तेल और गैस अवसंरचना परियोजनाओं को लेकर प्रारंभिक स्तर की बातचीत कर रही है।
ईआईएल के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक अतुल गुप्ता ने कंपनी की वार्षिक आम बैठक (AGM) के बाद मीडिया से बातचीत करते हुए इस महत्वपूर्ण रणनीतिक घटनाक्रम की पुष्टि की है। गुप्ता के अनुसार, सऊदी अरब और यूएई अपने कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पादों को बिना किसी समुद्री रुकावट के अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाने के लिए लगभग एक अरब डॉलर (करीब 8,300 करोड़ रुपये से अधिक) के भारी-भरकम पूंजी निवेश की रूपरेखा तैयार कर रहे हैं। भारतीय इंजीनियरिंग कंपनी इन मेगा प्रोजेक्ट्स के लिए प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंसी (PMC), डिटेल इंजीनियरिंग और फिजिबिलिटी स्टडी (व्यवहार्यता अध्ययन) जैसे अहम तकनीकी कार्य हासिल करने की दिशा में सक्रियता से प्रयासरत है।
1 अरब डॉलर का इंफ्रास्ट्रक्चर प्लान: नई तेल पाइपलाइन, विशाल स्टोरेज और आधुनिक शिपिंग टर्मिनल
सऊदी अरब और यूएई की इस नई साझा रणनीति का मुख्य उद्देश्य स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह बाइपास करना है। वर्तमान में फारस की खाड़ी से निकलने वाला अधिकांश कच्चा तेल इसी संकीर्ण जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है, जहां किसी भी सैन्य तनाव या ड्रोन हमले की स्थिति में वैश्विक तेल आपूर्ति अचानक ठप होने का जोखिम बना रहता है। इस दीर्घकालिक जोखिम को समाप्त करने के लिए दोनों देश लाल सागर (Red Sea) और ओमान की खाड़ी (Gulf of Oman) के तटों तक सीधी जमीनी पाइपलाइन बिछाने, विशाल रणनीतिक भंडारण सुविधाएं (Storage Depots) विकसित करने और गहरे समुद्र वाले आधुनिक क्रूड ऑयल एक्सपोर्ट टर्मिनलों के निर्माण पर केंद्रित योजनाएं बना रहे हैं।
ईआईएल के सीएमडी अतुल गुप्ता ने स्पष्ट किया कि खाड़ी देश वर्तमान में इन परियोजनाओं की विस्तृत कार्ययोजना तैयार करने के चरण में हैं और भारतीय कंपनी भी बिल्कुल इसी शुरुआती स्तर पर उनके साथ तकनीकी विमर्श कर रही है। ईआईएल के पास जटिल हाइड्रोकार्बन परियोजनाओं, क्रॉस-कंट्री पाइपलाइनों, रिफाइनरियों और पेट्रोकेमिकल प्लांट्स के डिजाइन व निष्पादन का छह दशकों से अधिक का समृद्ध वैश्विक अनुभव है। ऐसे में यदि यह परामर्श अनुबंध भारतीय कंपनी को मिलता है, तो यह भारतीय सार्वजनिक उपक्रमों की वैश्विक साख और खाड़ी क्षेत्र में भारत की ऊर्जा कूटनीति के लिए एक युगांतरकारी मील का पत्थर साबित होगा।
ईआईएल की अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर बुक में पश्चिम एशिया का दबदबा और वित्तीय प्रदर्शन
पश्चिम एशिया में उभर रही यह नई मांग इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड के लिए व्यावसायिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अतुल गुप्ता ने स्वीकार किया कि हालिया क्षेत्रीय तनाव के चलते खाड़ी क्षेत्र से नए अनुबंध मिलने की रफ्तार में कुछ समय के लिए सुस्ती जरूर आई थी, लेकिन अब तीसरी और चौथी तिमाही में नए बड़े ठेके मिलने की प्रक्रिया तेजी से गति पकड़ने की उम्मीद है। उल्लेखनीय है कि मौजूदा वैश्विक अनिश्चितताओं ने कंपनी के लिए नए परामर्श अवसरों के द्वार भी खोले हैं, क्योंकि ऊर्जा उत्पादक देश अब सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए इंफ्रास्ट्रक्चर के पुनर्गठन में जुट गए हैं।
ईआईएल की बैलेंस शीट और कारोबारी आंकड़ों पर नजर डालें तो कंपनी के कुल राजस्व और विकास में अंतरराष्ट्रीय व्यापार की भूमिका बेहद मजबूत हो चुकी है। कंपनी की कुल ऑर्डर बुक में विदेशी परियोजनाओं की हिस्सेदारी लगभग 43 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान कंपनी को मिले कुल नए व्यापार में अंतरराष्ट्रीय परामर्श सेवाओं (International Consulting Services) का योगदान 4,929 करोड़ रुपये यानी कुल ऑर्डर इनफ्लो का लगभग 62 प्रतिशत रहा है। ईआईएल पहले से ही सऊदी अरब, यूएई, बहरीन और कुवैत में कई प्रतिष्ठित रिफाइनरी और गैस इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर काम कर रही है। सऊदी अरब में कंपनी द्वारा स्थापित स्थानीय कार्यालय भी इस नए महाप्रोजेक्ट को हासिल करने में महत्वपूर्ण स्थानीय संपर्क का काम कर रहा है।
वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और भारत-खाड़ी सामरिक साझेदारी के लिए दूरगामी मायने
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के वैकल्पिक मार्गों का निर्माण केवल सऊदी अरब और यूएई के आर्थिक हितों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत समेत दुनिया भर के तेल आयातक देशों की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करता है, जिसका बड़ा हिस्सा इसी समुद्री क्षेत्र से होकर भारतीय रिफाइनरियों तक पहुंचता है। यदि खाड़ी देश सुरक्षित वैकल्पिक पाइपलाइन और बंदरगाह विकसित करने में सफल होते हैं, तो इससे वैश्विक तेल बाजारों में कीमतों की अस्थिरता और सप्लाई चेन के व्यवधान का खतरा काफी हद तक टल जाएगा।
भारतीय इंजीनियरिंग क्षमता का इस तरह के रणनीतिक मेगा-प्रोजेक्ट के केंद्र में आना यह साबित करता है कि भारत केवल ऊर्जा का बड़ा उपभोक्ता नहीं है, बल्कि वह ऊर्जा अवसंरचना के निर्माण और तकनीकी समाधान प्रदान करने में भी एक प्रमुख वैश्विक साझेदार के रूप में स्थापित हो रहा है। आगामी तिमाहियों में दोनों खाड़ी देशों की इस 1 अरब डॉलर की योजना को अंतिम रूप दिए जाने की संभावना है, जिस पर वैश्विक तेल उद्योग और शेयर बाजार के निवेशकों की पैनी नजर बनी रहेगी।