पायलटों की ड्रग टेस्टिंग प्रक्रिया में हो सकता है बड़ा बदलाव, फेडरेशन ऑफ इंडियन पायलट्स (FIP) ने डीजीसीए (DGCA) से की ओरल-फ्लूइड टेस्टिंग अपनाने की मांग
भारतीय विमानन क्षेत्र में सुरक्षा और अनुशासन को हमेशा से सबसे सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। देश के विमान चालकों यानी पायलटों के स्वास्थ्य, फिटनेस और उनकी कार्यक्षमता पर कड़ी नजर रखने के लिए समय-समय पर विभिन्न मेडिकल और ड्रग टेस्ट किए जाते हैं। इसी कड़ी में अब पायलटों की ड्रग टेस्टिंग (Drug Testing for Pilots) की मौजूदा प्रक्रिया में बड़े बदलाव की सुगबुगाहट तेज हो गई है। फेडरेशन ऑफ इंडियन पायलट्स (FIP) ने नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) के सामने एक औपचारिक मांग रखी है, जिसमें पारंपरिक परीक्षण विधियों के स्थान पर 'ओरल-फ्लूइड टेस्टिंग' (Oral-Fluid Testing) यानी मुंह के लार के परीक्षण की पद्धति को अपनाने का आग्रह किया गया है। इस नई मांग के बाद एविएशन सेक्टर में एक बार फिर सुरक्षा मानकों और टेस्टिंग के तरीकों को लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।
क्या है फेडरेशन ऑफ इंडियन पायलट्स (FIP) की मुख्य मांग और तर्क?
फेडरेशन ऑफ इंडियन पायलट्स ने डीजीसीए को सौंपे अपने प्रस्ताव में मुख्य रूप से यह तर्क दिया है कि वर्तमान समय में ड्रग्स की जांच के लिए जो तरीके अपनाए जाते हैं, वे कई मायनों में काफी जटिल और असुविधाजनक साबित होते हैं। ओरल-फ्लूइड या सलाइवा आधारित टेस्टिंग (Saliva Drug Test) को दुनिया भर के कई आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विमानन बाजारों में अधिक वैज्ञानिक, तेज और सुविधाजनक माना गया है। FIP का कहना है कि लार के जरिए होने वाली यह जांच प्रक्रिया न केवल अधिक पारदर्शी और सटीक परिणाम देती है, बल्कि इससे एयरलाइंस के क्रू मेंबर्स और पायलटों को परीक्षण के दौरान आने वाली व्यावहारिक परेशानियों से भी काफी हद तक राहत मिल सकती है। इस पद्धति से ड्रग्स के सेवन का तुरंत और सटीक पता लगाया जा सकता है, जो उड़ान सुरक्षा (Flight Safety) के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है।
वर्तमान ड्रग टेस्टिंग प्रक्रिया और आने वाली व्यावहारिक चुनौतियां
वर्तमान में डीजीसीए के कड़े नियमों के तहत देश के कमर्शियल पायलटों और एयर ट्रैफिक कंट्रोलर्स (ATCs) को समय-समय पर रैंडम ड्रग टेस्ट से गुजरना पड़ता है। इस प्रक्रिया के तहत आमतौर पर यूरिन (Urine Sample) या ब्लड सैंपल्स लिए जाते हैं, जिनकी लैब में जांच की जाती है। हालांकि यह व्यवस्था सुरक्षा के दृष्टिकोण से बहुत सख्त है, लेकिन कई बार सैंपल्स जुटाने की प्रक्रिया, उनकी गोपनीयता बनाए रखने और रिपोर्ट आने में लगने वाले समय के कारण परिचालन में कई तरह की अड़चनें आती हैं। पायलट यूनियंस और एविएशन एक्सपर्ट्स का लंबे समय से यह मानना रहा है कि यदि टेस्टिंग के तरीकों को थोड़ा और आधुनिक और सरल बना दिया जाए, तो यह प्रक्रिया पूरी तरह सुचारू हो सकती है।
एविएशन सेफ्टी और यात्रियों की सुरक्षा पर इसका प्रभाव
विमानन उद्योग में यात्रियों की सुरक्षा से बड़ा कोई दूसरा पैमाना नहीं हो सकता। पायलटों का मानसिक और शारीरिक रूप से पूरी तरह फिट होना उड़ान भरने की अनिवार्य शर्त है। किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों या प्रतिबंधित दवाओं का सेवन करने वाले व्यक्ति के हाथ में हजारों फीट की ऊंचाई पर विमान की कमान सौंपना यात्रियों की जान के साथ सीधा खिलवाड़ साबित हो सकता है। डीजीसीए द्वारा पायलटों पर रैंडम ड्रग स्क्रीनिंग लागू करने का मुख्य उद्देश्य भी यही था कि फ्लाइट डेक पर शून्य सहिष्णुता (Zero Tolerance) की नीति को सख्ती से लागू किया जा सके। अब यदि FIP की इस मांग पर डीजीसीए विचार करता है और ओरल-फ्लूइड टेस्टिंग को मंजूरी मिलती है, तो यह जांच और अधिक प्रभावी व तेज हो जाएगी।
डीजीसीए का रुख और भविष्य की तैयारियां
फेडरेशन ऑफ इंडियन पायलट्स की इस मांग पर नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) और अन्य संबंधित चिकित्सा विशेषज्ञों की कमेटियां गहराई से मंथन कर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (ICAO) के वैश्विक मानकों और सुरक्षा दिशा-निर्देशों को ध्यान में रखते हुए यह देखा जा रहा है कि क्या भारत में भी ओरल-फ्लूइड टेस्टिंग को कानूनी और तकनीकी रूप से पूरी तरह लागू किया जा सकता है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि डीजीसीए इस प्रस्ताव पर क्या अंतिम निर्णय लेता है, क्योंकि यह बदलाव देश के पूरे एविएशन सेक्टर के कार्यकुशलता और सुरक्षा ढांचे को एक नई दिशा दे सकता है।