'बंटवारा 1947' मूवी रिव्यू: क्या सनी देओल का रौद्र रूप और इमोशनल ड्रामा थिएटर में फिर करेगा कमाल? जानें पैसा वसूल है या नहीं यह ऐतिहासिक फिल्म

'बंटवारा 1947' मूवी रिव्यू: क्या सनी देओल का रौद्र रूप और इमोशनल ड्रामा थिएटर में फिर करेगा कमाल? जानें पैसा वसूल है या नहीं यह ऐतिहासिक फिल्म

भारतीय सिनेमा के पर्दे पर जब भी देशभक्ति, ऐतिहासिक संघर्ष और अपनों की हिफाजत के लिए गरजने वाले नायक की बात आती है, तो अभिनेता सनी देओल का नाम सबसे पहले जेहन में उभरता है। बड़े पर्दे पर अपनी बुलंद आवाज और 'ढाई किलो के हाथ' के दम पर दशकों से दर्शकों के दिलों पर राज करने वाले सनी देओल एक बार फिर 1947 के विभाजन की दर्दनाक और रोंगटे खड़े कर देने वाली पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्म 'बंटवारा 1947' लेकर सिनेमाघरों में हाजिर हैं। भारी-भरकम चर्चाओं, सोशल मीडिया बज और दर्शकों की भारी उम्मीदों के बीच रिलीज हुई यह फिल्म क्या वाकई उस ऐतिहासिक त्रासदी के दर्द और एक्शन को सही तरीके से पर्दे पर उतार पाई है? क्या आपको इस वीकेंड अपने परिवार के साथ टिकट खरीदकर यह फिल्म देखने जाना चाहिए? आइए इस विस्तृत और निष्पक्ष फिल्म रिव्यू में जानते हैं फिल्म के हर एक पहलू का सच।

कहानी का ताना-बाना: विभाजन की आग, उजड़ते परिवार और एक मर्द का संकल्प

फिल्म 'बंटवारा 1947' की कहानी भारतीय इतिहास के सबसे काले और रक्तरंजित अध्याय यानी 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन के इर्द-गिर्द बुनी गई है। जब देश की सीमा पर लकीरें खींची जा रही थीं, तब लाखों मासूम परिवार अपने घरों से बेघर हो रहे थे और चारों तरफ अराजकता, नफरत और दंगों का माहौल था।

कहानी का मुख्य केंद्र एक सीमावर्ती गांव में रहने वाला एक सीधा-साधा लेकिन फौलादी इरादों वाला शख्स (सनी देओल) है, जिसकी जिंदगी में उसका परिवार और मिट्टी ही उसका सब कुछ है। अचानक देश में विभाजन की घोषणा होती है और उसका हंसता-खेलता गांव दंगों और नफरत की आग में झुलसने लगता है। अपनों को सुरक्षित हिंदुस्तान की सरजमीं तक पहुंचाने के लिए वह किस तरह पूरे सिस्टम, दंगाइयों और क्रूर परिस्थितियों से अकेला लड़ता है, यही इस फिल्म की मूल आत्मा है। कहानी में केवल गोलियों की गूंज नहीं है, बल्कि शरणार्थी काफिलों का आंसुओं भरा दर्द, बिछड़ते रिश्तों की चीखें और इंसानियत की हिफाजत का जज्बा भी बहुत ही शिद्दत से पिरोया गया है।

सनी देओल का रौद्र अवतार: स्क्रीन पर आते ही बज उठती हैं सीटियां

इस पूरी फिल्म का सबसे मजबूत और चमकीला पहलू निस्संदेह सनी देओल की मौजूदगी है। 60 पार की उम्र में भी सनी देओल जब पर्दे पर क्रोध से लाल आंखों और भरी हुई आवाज में दहाड़ते हैं, तो थिएटर का माहौल पूरी तरह बदल जाता है। सनी ने अपने किरदार के दोनों पक्षों को बहुत ही खूबसूरती से जिया है। एक तरफ जहां वे एक असहाय पिता और जिम्मेदार पति के रूप में बेहद भावुक और संवेदनशील नजर आते हैं, वहीं दूसरी तरफ जब उनके परिवार पर आंच आती है, तो वे एक ऐसा विध्वंसक रूप धारण करते हैं जिसके सामने कोई भी टिक नहीं पाता।

फिल्म के कई संवाद सीधे दर्शकों के दिलों में उतरते हैं। सनी देओल की डायलॉग डिलीवरी आज भी उतनी ही प्रभावशाली और रोंगटे खड़े करने वाली है जितनी उनके 90 के दशक के दौर में हुआ करती थी। देश की एकता, मिट्टी के प्रति वफादारी और इंसानियत की रक्षा पर बोले गए उनके डायलॉग्स पर दर्शक सिनेमाहॉल्स में तालियां और सीटियां बजाने पर मजबूर हो जाते हैं। सनी देओल ने यह साबित कर दिया है कि इंटेंस और लार्जर-देन-लाइफ किरदारों को निभाने में आज भी उनका कोई सानी नहीं है।

सपोर्टिंग कास्ट और कलाकारों की सधी हुई जुगलबंदी

किसी भी ऐतिहासिक और भावनात्मक फिल्म को मुकम्मल बनाने के लिए केवल मुख्य नायक ही काफी नहीं होता, बल्कि उसके आसपास के किरदारों का जीवंत होना भी जरूरी होता है। 'बंटवारा 1947' में सनी देओल के साथ नजर आई सपोर्टिंग कास्ट ने भी अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है।

पत्नी की भूमिका में नजर आई अभिनेत्री ने उस दौर की एक संजीदा और डरी हुई महिला के दर्द को अपनी आंखों और हाव-भाव से बहुत ही प्रामाणिक तरीके से पेश किया है। वहीं विलेन के रूप में नजर आए मुख्य खलनायक ने नफरत और क्रूरता के भाव को इतनी शिद्दत से निभाया है कि दर्शक उससे स्वाभाविक रूप से नफरत करने लगते हैं। शरणार्थियों की भीड़ में शामिल छोटे-छोटे कलाकारों, बुजुर्गों और बच्चों के चेहरों पर दिखती बेबसी फिल्म के भावनात्मक प्रभाव को कई गुना गहरा कर देती है।

निर्देशन, सिनेमैटोग्राफी और पीरियड लुक का तकनीकी जादू

निर्देशक ने 1947 के दौर को पर्दे पर दोबारा जीवंत करने के लिए काफी रिसर्च और मेहनत की है। उस दौर के पुराने भाप के इंजन वाली रेलगाड़ियां, धूल भरी कच्ची सड़कें, लकड़ी के बने घर और लोगों की पारंपरिक वेशभूषा दर्शकों को सीधे 70-80 साल पुराने भारत में ले जाती है।

सिनेमैटोग्राफी की बात करें तो फिल्म के वाइड शॉट्स बेहद भव्य और प्रभावशाली हैं। विशेष रूप से रात के अंधेरे में जलते हुए गांवों और दिन के उजाले में मीलों लंबे शरणार्थी काफिलों के दृश्य देखकर आंखें नम हो जाती हैं। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर (BGM) तनावपूर्ण पलों में धड़कनें बढ़ा देता है और भावुक दृश्यों में आंखों में आंसू ला देता है। एक्शन सीन्स में ज्यादा वीएफएक्स (VFX) की मिलावट करने के बजाय देसी, भारी और यथार्थवादी स्टंट्स को तरजीह दी गई है, जो फिल्म के मिजाज के बिल्कुल अनुकूल है।

फिल्म की कमजोरियां: कहां भटकती है कहानी और क्या हैं खामियां?

हर फिल्म की तरह 'बंटवारा 1947' भी कुछ कमजोरियों से अछूती नहीं है। फिल्म का सबसे बड़ा कमजोर पक्ष इसका स्क्रीनप्ले और फर्स्ट हाफ की धीमी गति है। फिल्म की शुरुआत में किरदारों की दुनिया स्थापित करने में निर्देशक ने जरूरत से ज्यादा वक्त लिया है, जिससे शुरुआती 30-40 मिनट कहानी थोड़ी खिंची हुई और थकाऊ लगने लगती है।

इसके अलावा, कुछ दृश्यों में मेलोड्रामा थोड़ा ज्यादा लाउड हो जाता है, जिसे यदि थोड़ा संयमित रखा जाता तो फिल्म और अधिक संजीदा बन सकती थी। फिल्म का रन-टाइम लगभग 2 घंटे 45 मिनट के करीब है, जिसे एडिटिंग टेबल पर 15-20 मिनट आसानी से काटा जा सकता था ताकि कहानी का फ्लो और अधिक कसा हुआ रहता। कुछ जगहों पर कहानी प्रेडिक्टेबल (पूर्वानुमानित) लगने लगती है, जहां दर्शक पहले ही भांप लेते हैं कि अगले दृश्य में क्या होने वाला है।

फाइनल वर्डिक्ट: थिएटर्स में फिल्म देखें या नहीं?

यदि आप शुद्ध, इमोशनल और भारी-भरकम डायलॉग्स से भरा देसी एक्शन सिनेमा देखना पसंद करते हैं, तो 'बंटवारा 1947' आपके लिए एक पैसा वसूल अनुभव साबित होगी। यह फिल्म आपको केवल एक्शन का रोमांच ही नहीं देती, बल्कि हमारे देश के इतिहास के उस दर्दनाक पन्ने से भी रूबरू कराती है जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।

सनी देओल के फैंस के लिए यह फिल्म किसी त्योहार से कम नहीं है। यदि आप लॉजिक से ज्यादा इमोशंस, फैमिली बॉन्डिंग और देशभक्ति के जज्बे को तरजीह देते हैं, तो इस वीकेंड अपने पूरे परिवार के साथ सिनेमाघर जाकर इस फिल्म का आनंद जरूर लें। बड़े पर्दे का साउंड सिस्टम और सनी देओल का रौद्र रूप आपके टिकट के हर एक पैसे को पूरी तरह वसूल करा देगा।