'मौत का मतलब संत बन जाना नहीं!' नाना पाटेकर के निधन पर तनुश्री के समर्थन में उतरीं सोना महापात्रा

'मौत का मतलब संत बन जाना नहीं!' नाना पाटेकर के निधन पर तनुश्री के समर्थन में उतरीं सोना महापात्रा

दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर के निधन के बाद फिल्म इंडस्ट्री और सोशल मीडिया पर जहां एक तरफ शोक की लहर दौड़ गई, वहीं दूसरी तरफ भारत के बहुचर्चित 'मी टू' (#MeToo) आंदोलन से जुड़े पुराने जख्म और तीखे विवाद एक बार फिर खुलकर सामने आ गए हैं। नाना पाटेकर के जाने के बाद जब पूर्व अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने अपने पुराने आरोपों, न्याय न मिलने के दर्द और उस दौरान झेले गए मानसिक उत्पीड़न पर प्रतिक्रिया व्यक्त की, तो उन्हें सोशल मीडिया पर भारी ट्रोलिंग और 'मौत के बाद मर्यादा बनाए रखने' की नसीहतों का सामना करना पड़ा। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में अपनी बेबाक और निर्भीक आवाज के लिए मशहूर पार्श्व गायिका सोना महापात्रा ने खुलकर तनुश्री दत्ता का पक्ष लिया है। सोना महापात्रा ने सामाजिक पाखंड और चयनात्मक संवेदनशीलता पर जोरदार हमला बोलते हुए साफ लफ्जों में कहा कि किसी के दुनिया से चले जाने भर से उसका अतीत और उसके कर्म नहीं बदल जाते।

'मौत किसी को संत नहीं बना देती': सोना महापात्रा का बेबाक पलटवार

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक लंबी और तीखी पोस्ट साझा करते हुए सोना महापात्रा ने उन लोगों को सीधे निशाने पर लिया जो तनुश्री दत्ता को चुप कराने की कोशिश कर रहे थे। सोना ने लिखा—"क्या मौत का मतलब यह होता है कि इंसान अपने पिछले सारे कर्मों से मुक्त हो गया और अचानक कोई संत बन गया? मरने से किसी के किए गए अपराध, किसी को दिया गया असहनीय दर्द या किसी का करियर बर्बाद कर देने की हकीकत खत्म नहीं हो जाती।" सोना ने जोर देकर कहा कि तनुश्री दत्ता ने जो झेला, उसका असर उनकी पूरी जिंदगी, करियर और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ा। जब एक पीड़िता अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ बोलती है, तो समाज उसे ही मर्यादा और संस्कार का पाठ पढ़ाने लगता है, जबकि सालों तक आरोपी को मूक सहमति और संरक्षण दिया जाता रहा।

मी टू आंदोलन की कड़वी यादें: 2018 का वो भूचाल जिसने हिला दिया था बॉलीवुड

यह पूरा विवाद साल 2018 में शुरू हुए भारतीय मी टू आंदोलन से जुड़ा हुआ है, जिसकी पहली और सबसे बुलंद आवाज तनुश्री दत्ता ही बनी थीं। तनुश्री ने 2008 की फिल्म 'हॉर्न ओके प्लीज' के सेट पर एक स्पेशल गाने की शूटिंग के दौरान नाना पाटेकर पर अनुचित व्यवहार और उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगाए थे। तनुश्री के उस खुलासे के बाद पूरे देश में महिला सशक्तिकरण और वर्कप्लेस पर सुरक्षा को लेकर एक अभूतपूर्व क्रांति आई थी। हालांकि, लंबी कानूनी प्रक्रिया और पुलिस जांच के बाद पुलिस ने साक्ष्यों के अभाव में केस में बी-समरी रिपोर्ट दाखिल कर दी थी। तनुश्री ने हमेशा यह दावा किया कि व्यवस्था और शक्तिशाली रसूख के कारण उन्हें कभी इंसाफ नहीं मिला और उन्हें बॉलीवुड छोड़कर अमेरिका जाना पड़ा। अब जब नाना पाटेकर के निधन के बाद यह मुद्दा फिर उठा, तो समाज का एक तबका इसे असमय और अपमानजनक बताने लगा, जिसका सोना महापात्रा ने पुरजोर विरोध किया है।

पीड़ितों के मानसिक आघात को नजरअंदाज करने का दोहरा मापदंड

सोना महापात्रा, जिन्होंने खुद मी टू आंदोलन के दौरान संगीत उद्योग के कई बड़े नामों के खिलाफ मोर्चा खोला था, ने हमेशा पीड़ितों के अधिकार और सम्मान की वकालत की है। उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि भारतीय समाज में अक्सर यह परंपरा रही है कि किसी के निधन के बाद केवल उसकी अच्छाइयों को ही याद किया जाए। लेकिन जब कोई व्यक्ति किसी गंभीर आरोप का केंद्र रहा हो, तो उसके चले जाने से पीड़ित के दिल का घाव अचानक नहीं भर जाता। पीड़िता से यह उम्मीद करना कि वह तुरंत सब कुछ भुलाकर शोक जताए या चुप बैठ जाए, उसके दर्द और जीवनभर के मानसिक आघात का सरासर अपमान है। सोना ने सवाल उठाया कि क्यों हमारी संवेदनाएं हमेशा ताकतवर और चले गए लोगों के लिए सुरक्षित रहती हैं, जबकि जिंदा संघर्ष कर रही महिलाओं को लगातार कटघरे में खड़ा किया जाता है।

सोशल मीडिया पर दो धड़ों में बंटी राय: बहस ने पकड़ा तूल

सोना महापात्रा के इस कड़े बयान के सामने आते ही इंटरनेट पर पक्ष और विपक्ष में तीव्र बहस छिड़ गई है। एक तरफ जहां मानवाधिकार और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने सोना के रुख की सराहना करते हुए कहा कि सच बोलने की कोई समय सीमा नहीं होती और किसी के निधन से ऐतिहासिक तथ्य नहीं मिटते, वहीं दूसरी ओर नाना पाटेकर के अनगिनत प्रशंसकों और कुछ सिने हस्तियों ने इसे असंवेदनशील करार दिया। प्रशंसकों का तर्क है कि जब कोई व्यक्ति अब इस दुनिया में अपना बचाव करने के लिए मौजूद नहीं है, तब उस पर टिप्पणी करना भारतीय संस्कृति और बुनियादी शिष्टाचार के खिलाफ है। बहरहाल, सोना महापात्रा की इस दो-टूक प्रतिक्रिया ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वे किसी भी विवादित मुद्दे पर जनभावनाओं के दबाव में आए बिना अपने सिद्धांतों और सच के साथ खड़े होने से कभी पीछे नहीं हटतीं।