'हेरा फेरी ने मेरी जिंदगी मुश्किल बना दी, मुझे कॉमेडी फिल्में बनाना पसंद ही नहीं': कल्ट क्लासिक के 26 साल बाद डायरेक्टर प्रियदर्शन का छलका दर्द
भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी हास्य, व्यंग्य और सिचुएशनल कॉमेडी की बात होती है, तो साल 2000 में रिलीज हुई फिल्म 'हेरा फेरी' का नाम सबसे पहले पायदान पर आता है। बाबूराव गणपतराव आप्टे, राजू और घनश्याम (श्याम) की तिगड़ी ने पर्दे पर जो जादू बिखेरा था, वह पिछले ढाई दशकों से मीम्स, सोशल मीडिया और आम जनमानस की बोलचाल में अमर हो चुका है। इस कल्ट क्लासिक के शिल्पकार और दिग्गज फिल्ममेकर प्रियदर्शन को पूरे देश में 'कॉमेडी का सुल्तान' माना जाता है, जिन्होंने 'हंगामा', 'हलचल', 'गरम मसाला', 'भागम भाग', 'चुप चुप के', 'दे दना दन' और 'भूल भुलैया' जैसी फिल्मों से दशकों तक दर्शकों को लोटपोट किया है। हालांकि, अब खुद राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्देशक प्रियदर्शन ने अपने एक बेहद भावुक और बेबाक साक्षात्कार में ऐसा बयान दिया है जिसने पूरी फिल्म इंडस्ट्री और उनके करोड़ों प्रशंसकों को स्तब्ध कर दिया है। प्रियदर्शन ने दो टूक शब्दों में स्वीकार किया है कि 'हेरा फेरी' की ऐतिहासिक सफलता ने वास्तव में उनकी जिंदगी और करियर को आसान बनाने के बजाय बेहद मुश्किल बना दिया था, क्योंकि वे व्यक्तिगत रूप से कभी कॉमेडी फिल्में बनाना पसंद ही नहीं करते थे।
सिनेमाई गलियारों में प्रियदर्शन का यह बयान एक ऐसे विरोधाभास को उजागर करता है, जहां दुनिया जिस काम के लिए किसी कलाकार को पूजती है, वही काम उस कलाकार के भीतर की रचनात्मक आत्मा को भीतर ही भीतर बेचैन कर रहा होता है। उत्तर प्रदेश से लेकर केरल और मुंबई तक फैले सिनेप्रेमियों के लिए यह विश्वास करना कठिन हो सकता है कि जिस निर्देशक के विजुअल सेंस और टाइमिंग ने भारतीय दर्शकों को पेट पकड़कर हंसने पर मजबूर किया, वह निर्देशक दिल से एक बेहद संजीदा, यथार्थवादी और गहरे मानवीय संवेगों को दर्शाने वाला फिल्मकार है। प्रियदर्शन का कहना है कि 'हेरा फेरी' की ब्लॉकबस्टर सफलता के बाद बॉलीवुड के निर्माताओं और स्टूडियोज ने उनके ऊपर एक ऐसा ठप्पा (टाइपकास्ट) लगा दिया जिससे वे अगले 15 वर्षों तक चाहकर भी बाहर नहीं निकल सके। जब भी वे किसी गंभीर या सामाजिक विषय पर फिल्म बनाना चाहते थे, तो निर्माता उनसे केवल एक ही मांग करते थे—'हमें एक और हेरा फेरी या हंगामा चाहिए।'
'हेरा फेरी' बनी वरदान या अभिशाप: जब कल्ट क्लासिक ने बदल दिया प्रियदर्शन का सफर
प्रियदर्शन ने अपने करियर के उस निर्णायक मोड़ को याद करते हुए बताया कि मलयालम फिल्म 'रामजी राव स्पीकिंग' पर आधारित 'हेरा फेरी' को जब उन्होंने हिंदी में रीमेक करने का फैसला किया था, तो उनका उद्देश्य केवल एक हल्का-फुल्का और मनोरंजक सिनेमा प्रयोग करना था। उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि परेश रावल का बाबूराव का किरदार और अक्षय कुमार व सुनील शेट्टी की कॉमिक टाइमिंग भारतीय सिनेमा में एक मील का पत्थर बन जाएगी। फिल्म जब थिएटर्स में आई, तो उसने बॉक्स ऑफिस के तमाम पारंपरिक समीकरणों को ध्वस्त कर दिया। फिल्म की सफलता इतनी विराट थी कि उसने प्रियदर्शन को रातों-रात हिंदी सिनेमा का सबसे अधिक मांग वाला निर्देशक बना दिया।
लेकिन इसी अप्रत्याशित शोहरत के साथ उनके जीवन की असली रचनात्मक त्रासदी शुरू हुई। प्रियदर्शन ने दर्द साझा करते हुए कहा कि 'हेरा फेरी' के बाद उनके पास गंभीर पटकथाओं के साथ जाने का हर रास्ता बंद हो गया। मुंबई का हर बड़ा प्रोड्यूसर ब्रीफकेस में एडवांस भरकर सिर्फ इसलिए उनके दरवाजे पर खड़ा रहता था क्योंकि उसे अपनी फिल्म में वही पागलपन, अफरा-तफरी और हंसी के फव्वारे चाहिए थे। निर्देशक ने कहा कि हास्य फिल्में बनाना उनके लिए कभी उनका पहला प्यार या दिली ख्वाहिश नहीं थी, बल्कि यह केवल एक शिल्प और तकनीकी कौशल (क्राफ्ट) था जिसे वे कुशलता से अंजाम देना जानते थे। मजबूरी यह थी कि बॉलीवुड उन्हें किसी अन्य शैली में देखने को तैयार ही नहीं था, जिसके चलते उन्हें एक के बाद एक लगातार दर्जनों कॉमेडी फिल्में निर्देशित करनी पड़ीं।
गंभीर और संवेदनशील सिनेमा के पुरोधा: 'विरासत' और 'कालपानी' से शुरू हुई थी दास्तान
प्रियदर्शन को करीब से जानने वाले और दक्षिण भारतीय सिनेमा के पारखी भली-भांति जानते हैं कि प्रियदर्शन की मूल पहचान कभी हल्के-फुल्के हास्य से जुड़ी नहीं थी। उन्होंने अपने निर्देशन करियर की शुरुआत में 'चित्रम', 'किलुक्कम', 'अद्वैतम' और 'थेनमाविन कोमबाथ' जैसी क्लासिक फिल्में बनाई थीं जिनमें हास्य के साथ-साथ गहरी मानवीय संवेदनाएं घुली हुई थीं। वर्ष 1996 में मोहनलाल और प्रभु के साथ बनाई गई उनकी ऐतिहासिक महागाथा 'कालपानी' (अंडमान की सेल्युलर जेल पर आधारित) को आज भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर बनी सबसे यथार्थवादी और हृदयविदारक फिल्मों में गिना जाता है।
हिंदी सिनेमा में भी प्रियदर्शन की शुरुआत 'हेरा फेरी' से नहीं, बल्कि साल 1993 की कड़क ड्रामा फिल्म 'गर्दिश' से हुई थी, जिसमें जैकी श्रॉफ और अमरीश पुरी के पिता-पुत्र के जटिल रिश्ते को जिस क्रूर यथार्थवाद के साथ पेश किया गया था, उसने समीक्षकों को दंग कर दिया था। इसके बाद 1997 में अनिल कपूर, अमरीश पुरी और तब्बू स्टारर 'विरासत' आई, जिसने ग्रामीण राजनीति, जातिगत तनाव और पारिवारिक विघटन को पर्दे पर एक अमर कविता की तरह उकेरा था और कई राष्ट्रीय पुरस्कार जीते थे। प्रियदर्शन का असली विजन वही गंभीर और मार्मिक सिनेमा था, लेकिन 'हेरा फेरी' के बवंडर ने उनकी इस सशक्त पहचान को दर्शकों और फिल्म निर्माताओं की नजरों से पूरी तरह ओझल कर दिया।
रचनात्मक घुटन और राष्ट्रीय पुरस्कार की कसक: 'कांचीवरम' थी मेरी असली आत्मा
प्रियदर्शन ने इस बात का खुलकर इजहार किया कि जब वे मुंबई के सेट्स पर सितारों की भीड़ के साथ स्लैपस्टिक और सिचुएशनल कॉमेडी शूट कर रहे होते थे, तो उनके भीतर का असली लेखक और निर्देशक अक्सर घुटन महसूस करता था। उन्होंने कहा कि दूसरों को हंसाना दुनिया का सबसे कठिन काम है और एक निर्देशक के तौर पर उन्होंने अपनी हर कॉमेडी फिल्म को पूरी निष्ठा के साथ तराशा, लेकिन उन फिल्मों को पूरा करने के बाद उन्हें कभी वह आत्मिक शांति और संतुष्टि नहीं मिली जो एक सार्थक सिनेमा बनाने के बाद मिलती है।
यही कारण था कि जब वे बॉलीवुड की फॉर्मूला कॉमेडी से पूरी तरह थक गए, तो उन्होंने साल 2008 में तमिल भाषा में सिल्क बुनकरों के दर्द, साम्यवाद और मानवीय त्रासदी पर आधारित फिल्म 'कांचीवरम' बनाई। प्रकाश राज के अभिनय से सजी इस मार्मिक फिल्म ने सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म और सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता। प्रियदर्शन ने गर्व के साथ कहा कि 'कांचीवरम' जैसी फिल्में ही उनकी वास्तविक सिनेमाई आत्मा हैं। उन्होंने अफसोस जताया कि अगर हिंदी फिल्म उद्योग ने उन्हें 'हेरा फेरी' के बाद केवल कॉमेडी के संकीर्ण दायरे में कैद न किया होता, तो शायद वे भारतीय सिनेमा को कई और 'विरासत' और 'कांचीवरम' जैसी कालजयी कृतियां सौंप सकते थे।
'हेरा फेरी 3' और भविष्य का विजन: अब अपनी शर्तों पर काम करने का फैसला
मौजूदा दौर में जब 'हेरा फेरी 3' को लेकर सोशल मीडिया पर निरंतर बज बना रहता है और दर्शक यह उम्मीद लगाए बैठे रहते हैं कि प्रियदर्शन ही अपनी पुरानी तिकड़ी को लेकर दोबारा कमान संभालेंगे, ऐसे समय में उनका यह बयान बहुत बड़े मायने रखता है। हालांकि प्रियदर्शन ने यह भी स्पष्ट किया कि वे अपनी पुरानी फिल्मों और दर्शकों से मिले अगाध प्रेम का पूरा सम्मान करते हैं। उन्हें इस बात का गर्व है कि जब देश का कोई आम नागरिक तनाव, अवसाद या उदासी में होता है, तो वह मुस्कुराने के लिए उनकी बनाई फिल्मों का ही सहारा लेता है।
अपने जीवन और करियर के इस परिपक्व पड़ाव पर प्रियदर्शन अब केवल उन कहानियों को छूना चाहते हैं जो सीधे उनके दिल को छूती हैं। वे अब किसी बॉक्स ऑफिस दबाव या कमर्शियल फॉर्मूले के तहत कॉमेडी बनाने के मूड में नहीं हैं। उनका यह ताजा स्वीकारोक्ति सिनेमाई दुनिया के लिए एक बड़ा सबक है कि कैसे एक अत्यधिक सफल फिल्म किसी कलाकार के बाकी संपूर्ण विजन को लील जाती है। प्रियदर्शन की इस बेबाकी ने यह साबित कर दिया है कि एक सच्चा फिल्मकार कभी व्यावसायिक आंकड़ों से संतुष्ट नहीं होता; उसकी असली भूख हमेशा उस सिनेमाई सत्य की तलाश में रहती है जो सदियों तक मानवीय चेतना को झकझोर सके।