Mirzapur The Movie में नहीं होने वाला था 'सांसों की माला में', इस गाने के साथ मेकर्स ने किया था अनोखा एक्सपेरिमेंट

Mirzapur The Movie में नहीं होने वाला था 'सांसों की माला में', इस गाने के साथ मेकर्स ने किया था अनोखा एक्सपेरिमेंट

अमेज़न प्राइम वीडियो की सबसे चर्चित क्राइम फ्रेंचाइजी 'मिर्जापुर' जब बड़े पर्दे पर 'मिर्जापुर: द मूवी' (Mirzapur The Movie) के रूप में आई, तो दर्शकों में इसको लेकर जबरदस्त उत्साह देखने को मिला। कालीन भैया, गुड्डू पंडित और मुन्ना भैया का वही पुराना भौकाल बड़े पर्दे पर भी जमकर गूंजा। फिल्म के सीन्स और तीखे डायलॉग्स के साथ-साथ जिस चीज ने सिनेमाघरों में दर्शकों के रोंगटे खड़े कर दिए, वह था नुसरत फतेह अली खान के अमर सूफी कलाम 'सांसों की माला पे' (Sanso Ki Mala Pe) का रीक्रिएटेड वर्जन। क्राइम, बदले और खूनी संघर्ष के दृश्यों के बीच इस गाने के बजते ही थिएटर्स में तालियां और सीटियां बज उठीं। लेकिन अब इस गाने को लेकर एक ऐसा दिलचस्प और हैरान कर देने वाला खुलासा सामने आया है, जिसने फैंस को चौंका दिया है। रिपोर्ट्स और म्यूजिक टीम से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, फिल्म में 'सांसों की माला में' गाना शुरू से तय ही नहीं था; मेकर्स ने पहले एक बिल्कुल अलग क्लासिक गाने के साथ बड़ा एक्सपेरिमेंट किया था।

पहले इस पुराने गाने पर बना था पूरा विजुअल सीन

फिल्म के पोस्ट-प्रोडक्शन और साउंड डिजाइनिंग से जुड़े सूत्रों के अनुसार, निर्देशक गुरमीत सिंह और फिल्म की कोर क्रिएटिव टीम क्लाइमेक्स और अहम फाइट सीक्वेंस के लिए एक ऐसा बैकग्राउंड ट्रैक ढूंढ रहे थे जो देसी माहौल के साथ-साथ भीतर तक सिहरन पैदा कर दे।

शुरुआती चरण में मेकर्स ने 70 और 80 के दशक के एक बेहद लोकप्रिय क्लासिक रेट्रो गाने के डार्क और स्लो रीमिक्स वर्जन के साथ पूरा सीन शूट और एडिट कर लिया था। इस प्रयोग के तहत मेकर्स चाहते थे कि सीन में एक विचित्र विरोधाभास (Irony) पैदा हो, जहां पर्दे पर खूनी खेल चल रहा हो और बैकग्राउंड में एक पुराना नॉस्टैल्जिक बॉलीवुड गीत बज रहा हो। इस तरह के प्रयोग हॉलीवुड सिनेमा और कुछ आधुनिक भारतीय थ्रिलर्स में पहले भी सफल रहे हैं। शुरुआती एडिट में टीम को यह प्रयोग काफी रोचक भी लगा और इसे ही फाइनल ट्रैक के तौर पर आगे बढ़ाया जा रहा था।

एडिट टेबल पर बदला फैसला: जब फीका पड़ा पहला एक्सपेरिमेंट

जब फिल्म का रफ कट तैयार हुआ और मेकर्स ने उस रेट्रो गाने के साथ पूरे सीक्वेंस को बड़े स्क्रीन पर देखा, तो उन्हें महसूस हुआ कि वह प्रयोग देखने में भले ही स्टाइलिश लग रहा था, लेकिन वह मिर्जापुर की ठेठ मिट्टी और बदले की उस तीव्र आग (Raw Emotion) को नहीं पकड़ पा रहा था जो इस फ्रेंचाइजी की आत्मा है।

सीन में गुस्सा, प्रतिशोध, समर्पण और सत्ता का वह जुनून मिसिंग लग रहा था जो मिर्जापुर के किरदारों की पहचान है। इसके बाद म्यूजिक डायरेक्टर्स और राइटर्स की टीम ने ब्रेनस्टॉर्मिंग शुरू की। निर्देशक का मानना था कि बैकग्राउंड में ऐसा म्यूजिक होना चाहिए जो भक्ति, प्रेम और हिंसक बदले के बीच की बारीक लकीर को मिटा दे। इसी मंथन के दौरान किसी ने नुसरत फतेह अली खान की अमर कव्वाली 'सांसों की माला पे सिमरूं मैं शिव का नाम' / 'पी का नाम' का सुझाव दिया।

'सांसों की माला में': भक्ति और बदले का खूनी संगम

जैसे ही इस आइकॉनिक सूफी ट्रैक के क्लासिक सुरों को भारी बेस, इलेक्ट्रॉनिक बीट्स और इंटेंस ऑर्केस्ट्रा के साथ री-अरेंज करके सीन पर सुपरइम्पोज किया गया, पूरा ड्रामा ही बदल गया।

'सांसों की माला में' का मूल भाव खुद को अपने महबूब या ईश्वर के प्रति पूरी तरह समर्पित कर देने का है। लेकिन जब इसे मिर्जापुर के खूनी संघर्ष, हथियारों की तड़तड़ाहट और गुड्डू-कालीन भैया के आमने-सामने के टकराव के साथ पिरोया गया, तो इसने सीन में एक रूह कंपा देने वाला प्रभाव पैदा कर दिया। मेकर्स ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपने पुराने एक्सपेरिमेंट को पूरी तरह कचरे के डिब्बे में डाल दिया और रातों-रात राइट्स हासिल करके इस नए ट्रैक को फिल्म के सबसे अहम हिस्से में शामिल कर लिया।

थिएटर्स में बना 'गूजबंप्स मोमेंट', सोशल मीडिया पर वायरल हुई रील्स

रिलीज के बाद मेकर्स का यह फैसला शत-प्रतिशत सही साबित हुआ। सिनेमाघरों में जैसे ही फिल्म के क्रूशियल पॉइंट पर यह गाना बजता है, दर्शकों को रोंगटे खड़े कर देने वाला अनुभव होता है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स—विशेषकर इंस्टाग्राम, यूट्यूब शॉर्ट्स और एक्स पर फिल्म के इस ट्रैक के साथ एडिटेड सीन्स और रील्स की बाढ़ आ गई है। म्यूजिक लवर्स और मिर्जापुर के फैंस इस बात की जमकर तारीफ कर रहे हैं कि किस तरह एक पारंपरिक सूफी कलाम को आधुनिक सिनेमैटिक बीट्स के साथ ढालकर सिनेमाई जादू रचा गया है।

जब सही म्यूजिक बदल देता है फिल्म का पूरा प्रभाव

सिनेमा के जानकारों का मानना है कि 'मिर्जापुर: द मूवी' का यह किस्सा इस बात का बड़ा उदाहरण है कि किसी भी दृश्य के लिए सही बैकग्राउंड स्कोर कितना अहम होता है। अगर मेकर्स अपने पहले एक्सपेरिमेंट पर ही अड़े रहते, तो शायद यह सीन इतना कल्ट और प्रभावशाली नहीं बन पाता। 'सांसों की माला में' के चयन ने यह साबित कर दिया कि जब लोक संगीत और क्लासिक धुनों को आधुनिक सिनेमा के विजुअल्स के साथ सही संवेदनशीलता से मिलाया जाता है, तो वह पीढ़ियों को मंत्रमुग्ध कर देने वाला अनुभव बन जाता है।