'मिर्जापुर: द मूवी' में मुन्ना भैया का छलका दर्द: बोले- इंटीमेट सीन से ज्यादा इस चीज में नंगा महसूस करता हूं

'मिर्जापुर: द मूवी' में मुन्ना भैया का छलका दर्द: बोले- इंटीमेट सीन से ज्यादा इस चीज में नंगा महसूस करता हूं

ओटीटी से लेकर सिनेमाघरों तक भौकाल मचाने वाली सबसे लोकप्रिय क्राइम फ्रेंचाइजी 'मिर्जापुर' में 'मुन्ना भैया' का किरदार निभाकर घर-घर में अमर हो चुके अभिनेता दिव्येंदु शर्मा इन दिनों लगातार सुर्खियों में बने हुए हैं। 'मिर्जापुर: द मूवी' के जरिए बड़े पर्दे पर मुन्ना त्रिपाठी की अप्रत्याशित और विस्फोटक वापसी ने दर्शकों को झकझोर कर रख दिया है। अपनी बेलगाम ऊर्जा, तीखे संवादों और हिंसक मिजाज के पीछे छिपे एक गहरे अकेलेपन को दिव्येंदु ने जिस शिद्दत से पर्दे पर उतारा है, उसकी चारों तरफ तारीफ हो रही है। इसी बीच दिव्येंदु ने एक इंटरव्यू के दौरान अपने अभिनय के सबसे संवेदनशील पहलू और कैमरे के सामने अपनी सीमाओं पर खुलकर बात की है। अभिनेता ने एक ऐसा सनसनीखेज बयान दिया है जिसने दर्शकों और आलोचकों का ध्यान खींच लिया है; उन्होंने कहा कि वे ऑन-स्क्रीन इंटीमेट या बोल्ड सीन्स के मुकाबले एक खास किस्म की भावनाओं को व्यक्त करते समय खुद को कहीं अधिक 'नंगा' और असुरक्षित महसूस करते हैं।

भावनात्मक रूप से टूटने वाले दृश्य होते हैं सबसे ज्यादा नग्न

दिव्येंदु शर्मा ने एक बातचीत के दौरान अभिनय की आंतरिक परतों को समझाते हुए कहा कि आम तौर पर लोगों को लगता है कि कैमरे के सामने कपड़े उतारना या कोई शारीरिक रूप से इंटीमेट सीन करना एक कलाकार के लिए सबसे मुश्किल और असहज काम होता है। लेकिन उनके लिए यह धारणा बिल्कुल उलट है। दिव्येंदु ने कहा, "किसी इंटीमेट या लव-मेकिंग सीन में आप बहुत हद तक तकनीकी होते हैं। वहां मूवमेंट, एंगल और रिहर्सल पहले से तय होती है। लेकिन जब आपको कैमरे के सामने अपने दिल की सबसे गहरी पीड़ा, कमजोरी या रोने वाले दृश्य करने होते हैं, तो आप वास्तव में अपनी आत्मा को सबके सामने खोलकर रख देते हैं। इंटीमेट सीन से कहीं ज्यादा मैं उस वक्त खुद को नंगा (Vulnerable) महसूस करता हूं जब मुझे किसी सीन में अंदर से पूरी तरह टूटकर बिखरना होता है।"

मुन्ना भैया की हिंसक छवि के पीछे का गहरा दर्द

अपने आइकॉनिक किरदार मुन्ना त्रिपाठी का विश्लेषण करते हुए दिव्येंदु ने बताया कि दुनिया मुन्ना को एक बेखौफ, बेरहम और सनकी गैंगस्टर के रूप में देखती है, लेकिन एक अभिनेता के तौर पर वे जानते हैं कि मुन्ना अंदर से कितना अकेला और टूटा हुआ लड़का था। दिव्येंदु ने कहा, "मुन्ना भैया सिर्फ गोलियां चलाना या गालियां देना नहीं था। वह एक ऐसा बेटा था जो अपने पिता (कालीन भैया) की आंखों में सिर्फ थोड़ा सा प्यार और इज्जत पाने के लिए जिंदगी भर तड़पता रहा। जब भी मुझे मुन्ना के उस अनदेखे दर्द और बेबसी को कैमरे के सामने लाना होता था, तो मुझे अपने भीतर के घावों को कुरेदना पड़ता था। दर्शकों के सामने अपनी भावनाओं का इस तरह कच्चा प्रदर्शन करना किसी भी शारीरिक बोल्ड सीन से सौ गुना ज्यादा डरावना और थका देने वाला होता है।"

कैमरे के सामने खुद को पूरी तरह सौंप देना ही असली कला

दिव्येंदु ने आगे स्पष्ट किया कि एक अभिनेता के लिए भावनात्मक नग्नता (Emotional Vulnerability) सबसे कठिन परीक्षा होती है। जब आप कैमरे के सामने फूट-फूट कर रोते हैं, अपनी बेबसी दिखाते हैं या किसी अपमान का घूंट पीते हैं, तो आप अपने वास्तविक व्यक्तित्व की परतों को दुनिया के सामने रख रहे होते हैं। उन्होंने कहा कि कपड़े तो एक शॉट के बाद दोबारा पहने जा सकते हैं, लेकिन जब आप किसी किरदार के अवसाद और दर्द में पूरी तरह डूब जाते हैं, तो उस मानसिक स्थिति से बाहर निकलने में कई दिन लग जाते हैं। यही वजह है कि वे एक्शन या रोमांस के मुकाबले भावनात्मक दृश्यों को सबसे जटिल और चुनौतीपूर्ण मानते हैं।

'मिर्जापुर द मूवी' में मुन्ना भैया के भावनात्मक रूप ने फिर जीता दिल

'मिर्जापुर: द मूवी' में दिव्येंदु के इस नजरिए की झलक साफ तौर पर देखने को मिल रही है। फिल्म में न सिर्फ उनका वही पुराना बेबाक तेवर दर्शकों को तालियां बजाने पर मजबूर कर रहा है, बल्कि कुछ बेहद संवेदनशील और गहरे दृश्यों में उनकी आंखों की तड़प ने दर्शकों को भावुक भी कर दिया है। दिव्येंदु की यह बात साबित करती है कि वे केवल एक मंझे हुए कमर्शियल स्टार नहीं हैं, बल्कि अभिनय की गहराइयों और मानवीय मनोविज्ञान को जीने वाले एक बेहद संजीदा और समर्पित कलाकार हैं।