अमिताभ-रेखा के साथ बनने वाली थी 'रॉकी': सुनील दत्त ने बदली पूरी कहानी, जानिए कैसे बनी संजय दत्त की डेब्यू फिल्म

अमिताभ-रेखा के साथ बनने वाली थी 'रॉकी': सुनील दत्त ने बदली पूरी कहानी, जानिए कैसे बनी संजय दत्त की डेब्यू फिल्म

साल 1981 में रिलीज हुई फिल्म 'रॉकी' ने बॉलीवुड को एक ऐसा एक्शन स्टार दिया, जिसने आने वाले चार दशकों तक दर्शकों के दिलों पर राज किया। यह फिल्म कोई और नहीं बल्कि संजय दत्त की बहुचर्चित डेब्यू फिल्म थी। लंबे बाल, गठीला बदन, आंखों में आक्रोश और चेहरे पर मासूमियत लिए 21 साल के संजू बाबा ने अपनी पहली ही फिल्म से हिंदी सिनेमा में तहलका मचा दिया था। लेकिन बहुत कम लोग यह जानते हैं कि जिस फिल्म से संजय दत्त ने बॉलीवुड में कदम रखा, वह मूल रूप से उनके लिए लिखी ही नहीं गई थी। सिनेमा के गलियारों का यह अनसुना सच बेहद दिलचस्प है कि 'रॉकी' की पहली पसंद बॉलीवुड के एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन और एवरग्रीन अदाकारा रेखा थीं।

अगर किस्मत और दिग्गज अभिनेता-निर्देशक सुनील दत्त ने सही वक्त पर फैसला न बदला होता, तो आज 'रॉकी' का इतिहास कुछ और ही होता। उस दौर में जब अमिताभ बच्चन अपने करियर के शीर्ष पर थे और रेखा के साथ उनकी जोड़ी सिल्वर स्क्रीन पर आग लगा रही थी, तब सुनील दत्त ने इस प्रोजेक्ट का रुख अपने बेटे की ओर मोड़ दिया था।

अमिताभ-रेखा की हिट जोड़ी के लिए तैयार हुई थी 'रॉकी' की मूल स्क्रिप्ट

70 के दशक के अंतिम वर्षों में सुनील दत्त एक बड़े बजट की एक्शन-थ्रिलर फिल्म बनाने की योजना पर काम कर रहे थे। उस समय अमिताभ बच्चन का बॉक्स ऑफिस पर एकछत्र राज था और रेखा के साथ उनकी ऑनस्क्रीन केमिस्ट्री दर्शकों की पहली पसंद मानी जाती थी। सुनील दत्त ने एक ऐसी रिवेंज-ड्रामा पटकथा तैयार करवाई थी, जिसमें एक परिपक्व, गंभीर और एक्शन से भरपूर नायक की जरूरत थी जो अपने पिता की मौत का बदला लेता है।

कहानी में हीरो के साथ एक मजबूत और ग्लैमरस महिला किरदार की आवश्यकता थी, जिसके लिए रेखा का नाम लगभग तय माना जा रहा था। सुनील दत्त खुद इस प्रोजेक्ट को बहुत बड़े पैमाने पर डायरेक्ट करने की तैयारी में थे। फिल्म के प्री-प्रोडक्शन का काम शुरू हो चुका था और शुरुआती ड्राफ्ट अमिताभ बच्चन के एंग्री यंग मैन वाले स्टारडम को ध्यान में रखकर ही लिखा गया था।

जब बिग बी की तारीखों और संजय दत्त के भविष्य ने बदला खेल

इसी बीच संजय दत्त अपनी पढ़ाई पूरी करके मुंबई लौट चुके थे। संजू बाबा का झुकाव फिल्मों की तरफ तेजी से बढ़ रहा था, लेकिन वह अपनी जिंदगी के एक बेहद भटके हुए दौर से भी गुजर रहे थे। बुरी आदतों और गलत संगत के चलते संजय का भविष्य दांव पर लगा हुआ था। एक पिता के रूप में सुनील दत्त अपने इकलौते बेटे को लेकर बेहद चिंतित थे और उन्हें लगा कि संजय को अनुशासित करने और सही रास्ते पर लाने का सबसे बेहतर जरिया सिनेमा ही हो सकता है।

दूसरी तरफ, अमिताभ बच्चन उस समय बैक-टू-बैक कई फिल्मों की शूटिंग में व्यस्त थे और उनके पास तुरंत देने के लिए लंबी डेट्स उपलब्ध नहीं थीं। सुनील दत्त अपने बेटे को लेकर ज्यादा इंतजार नहीं करना चाहते थे। ऐसे नाजुक मोड़ पर सुनील दत्त ने एक बड़ा और साहसी फैसला लिया। उन्होंने अमिताभ और रेखा वाले प्रोजेक्ट को वहीं रोकने का मन बनाया और स्क्रिप्ट राइटर्स को निर्देश दिया कि इस पूरी कहानी को एक युवा नायक के इर्द-गिर्द री-राइट किया जाए।

स्क्रिप्ट में हुए बड़े बदलाव और टीना मुनीम की नई एंट्री

अमिताभ बच्चन के हिसाब से लिखी गई कहानी काफी गंभीर और बदले की आग में जलते परिपक्व नायक की थी। जब इसे 21 साल के संजय दत्त के लिए री-डिजाइन किया गया, तो कहानी में कॉलेज लाइफ, यूथ रोमांस, बाइक स्टंट्स और रॉक म्यूजिक जैसे आधुनिक तत्वों को जोड़ा गया। फिल्म के टाइटिल कैरेक्टर का नाम रखा गया 'रॉकी', जो सीधे तौर पर हॉलीवुड की चर्चित बॉक्सिंग फिल्मों से प्रेरित एक युवा एनर्जी का प्रतीक था।

नायक के बदलते ही नायिका का चयन भी बदलना जरूरी हो गया। रेखा की जगह उस दौर की सबसे खूबसूरत और उभरती हुई अभिनेत्री टीना मुनीम (अब टीना अंबानी) को साइन किया गया। टीना और संजय दत्त की असल जिंदगी की नजदीकियों ने पर्दे पर उनकी केमिस्ट्री को और भी जीवंत बना दिया। फिल्म में रीना रॉय, अमजद खान, रणजीत, शक्ति कपूर और खुद सुनील दत्त ने महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं।

दर्द और आंसुओं के बीच रिलीज हुई 'रॉकी'

'रॉकी' 8 मई 1981 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई और रिलीज होते ही बॉक्स ऑफिस पर ब्लॉकबस्टर साबित हुई। फिल्म का गाना 'क्या यही प्यार है' और 'रॉकी मेरा नाम' गली-गली में गूंजने लगे। संजय दत्त रातों-रात देश के सबसे बड़े यूथ आइकन बन गए। लेकिन इस ऐतिहासिक कामयाबी के पीछे एक बहुत बड़ा निजी दर्द भी छिपा था। फिल्म के रिलीज होने से ठीक पांच दिन पहले, यानी 3 मई 1981 को संजय दत्त की मां और महान अभिनेत्री नरगिस दत्त का कैंसर के चलते निधन हो गया था।

फिल्म के भव्य प्रीमियर के दौरान मुंबई के सिनेमाहॉल में सुनील दत्त और संजय दत्त के बीच की एक सीट खाली रखी गई थी, जो नरगिस दत्त की याद में आरक्षित थी। प्रीमियर में मौजूद हर शख्स की आंखें नम थीं। अगर सुनील दत्त ने उस दिन अमिताभ बच्चन की जगह अपने बेटे पर दांव न लगाया होता, तो शायद बॉलीवुड को उसका सबसे चहेता 'संजू बाबा' इतनी जल्दी न मिल पाता।