70 की उम्र में काम मांगने पर इंडस्ट्री का बेरुखा चेहरा: सीनियर एक्ट्रेस का छलका दर्द, कास्टिंग डायरेक्टर्स को लगाई फटकार
मनोरंजन की चकाचौंध से भरी मायानगरी मुंबई जितनी बाहर से सुनहरी और आकर्षक नजर आती है, अंदर से इसका यथार्थ उतना ही निर्मम और अकेला कर देने वाला है। दशकों तक अपनी कला, मेहनत और अदाकारी से दर्शकों के दिलों पर राज करने वाले कलाकारों को जब उम्र के आखिरी पड़ाव पर उपेक्षा का सामना करना पड़ता है, तो वह दर्द शब्दों में बयां करना मुश्किल होता है। हाल ही में 70 की उम्र पार कर चुकी एक जानी-मानी सीनियर अभिनेत्री ने फिल्म और टीवी इंडस्ट्री के मौजूदा कार्यसंस्कृति पर बेहद तीखा हमला बोला है। उन्होंने बिना लाग-लपेट के साझा किया कि जब आज वह काम मांगने के लिए फोन या मैसेज करती हैं, तो नए दौर के मेकर्स और युवा कास्टिंग डायरेक्टर्स उनके साथ कितना गैर-जिम्मेदाराना और अपमानजनक बर्ताव करते हैं।
अभिनेत्री ने अपना दुख जाहिर करते हुए कहा कि एक कलाकार ताउम्र केवल अभिनय करना चाहता है, क्योंकि कैमरा और मंच ही उसकी असली जिंदगी होते हैं। लेकिन आज जब वह काम की तलाश में आगे बढ़ती हैं, तो उन्हें जिस बेरुखी का सामना करना पड़ता है, वह दिल तोड़ने वाला है। उन्होंने दो-टूक कहा कि अगर किसी प्रोजेक्ट में उनके लायक कोई किरदार नहीं है, तो सीधे तौर पर मना किया जा सकता है, लेकिन किसी सीनियर कलाकार की अनदेखी करना और उनसे अदब से बात न करना सीधे तौर पर तमीज की कमी को दर्शाता है।
2. 'मैसेज देखकर छोड़ देते हैं': नए दौर की कास्टिंग संस्कृति और अनप्रोफेशनल रवैये पर फूटा गुस्सा
सीनियर अभिनेत्री ने आज के डिजिटल दौर में पनपी 'घोस्टिंग' और अनप्रोफेशनल वर्क कल्चर पर खुलकर नाराजगी जताई। उन्होंने बताया कि पहले के दौर में अगर किसी सीनियर कलाकार से संपर्क किया जाता था या वह खुद किसी निर्माता-निर्देशक से बात करते थे, तो दोनों तरफ से एक गरिमा और आदर बना रहता था। अगर भूमिका उपयुक्त नहीं होती थी, तो वरिष्ठता का सम्मान करते हुए बेहद विनम्रता से बात स्पष्ट कर दी जाती थी।
लेकिन आज स्थिति पूरी तरह उलट चुकी है। अभिनेत्री ने दर्द साझा करते हुए कहा कि जब वह किसी नए कास्टिंग डायरेक्टर या प्रोडक्शन हाउस के प्रतिनिधि को काम के सिलसिले में मैसेज भेजती हैं, तो अक्सर उनके मैसेज 'सीन' (Seen) करके छोड़ दिए जाते हैं। कई बार दिनों तक कोई जवाब नहीं आता और अगर कोई फोन उठा भी ले, तो बात करने का लहजा ऐसा होता है मानो वे किसी नवागंतुक या अवांछित व्यक्ति से बात कर रहे हों। अभिनेत्री ने सवाल उठाया कि जिन कलाकारों ने अपनी पूरी जवानी और आधी से ज्यादा जिंदगी इस इंडस्ट्री को संवारने में लगा दी, क्या वे आज एक बुनियादी शिष्टाचार और सम्मानजनक संवाद के भी हकदार नहीं हैं?
3. उम्र के इस पड़ाव पर काम मांगने की झिझक और स्वाभिमान की निरंतर लड़ाई
बुजुर्ग कलाकारों के लिए सबसे बड़ा संकट यह होता है कि वे अपने आत्मसम्मान और काम करने की स्वाभाविक ललक के बीच लगातार जूझते रहते हैं। 70 साल की उम्र में पहुंचकर किसी के आगे काम की गुजारिश करना अपने आप में बहुत बड़े कलेजे की बात है। यह कदम कोई मजबूरी से ज्यादा अभिनय के प्रति अपने अटूट समर्पण की वजह से उठाता है।
अभिनेत्री ने स्पष्ट किया कि वह किसी पर अहसान जताने या खैरात मांगने के लिए फोन नहीं करतीं। वे आज भी पूरी तरह स्वस्थ, ऊर्जावान और कैमरे का सामना करने के लिए सक्षम हैं। वे अपनी योग्यता, अनुभव और किरदार के आधार पर काम की उम्मीद करती हैं। लेकिन जब सामने से अहंकारी और रूखा रवैया मिलता है, तो यह केवल उनका व्यक्तिगत अपमान नहीं होता, बल्कि पूरी उस पीढ़ी का अपमान होता है जिसने सिनेमा को अपने खून-पसीने से सींचा है। उन्होंने कहा कि इंडस्ट्री के युवाओं को यह समझना चाहिए कि उम्र का तकाजा हर किसी के साथ आना है, इसलिए वरिष्ठ कलाकारों के साथ बात करते समय शब्दों और लहजे में तहजीब का होना बेहद जरूरी है।
4. नीना गुप्ता से लेकर अन्य दिग्गजों तक: जब-जब सीनियर एक्टर्स ने उठाई बेबाक आवाज
यह पहला मौका नहीं है जब किसी दिग्गज कलाकार ने काम मांगने और उसके बाद मिले कटु अनुभवों पर अपनी आवाज बुलंद की हो। कुछ साल पहले मशहूर अभिनेत्री नीना गुप्ता ने सोशल मीडिया पर अपनी एक तस्वीर साझा करते हुए लिखा था कि वह मुंबई में रहती हैं, काम करती हैं और एक अच्छी अभिनेत्री हैं जो अच्छे किरदारों की तलाश में हैं। नीना गुप्ता के उस ईमानदार पोस्ट ने पूरे देश में तहलका मचा दिया था, जिसके बाद उन्हें 'बधाई हो' जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्म मिली और उनके करियर को एक नया जीवनदान मिला।
इसी तरह इला अरुण, जरीना वहाब, दिवंगत सुरेखा सीकरी और जीनत अमान जैसे कई वरिष्ठ कलाकारों ने अलग-अलग मौकों पर इस बात की तस्दीक की है कि बॉलीवुड में 60 और 70 साल से अधिक उम्र के कलाकारों के लिए सम्मानजनक परिस्थितियों में काम मिलना कितना मुश्किल हो चुका है। पश्चिमी सिनेमा (हॉलीवुड) में जहां एंथनी हॉपकिंस, मेरिल स्ट्रीप और रॉबर्ट डी नीरो जैसे कलाकारों को 70 और 80 की उम्र में भी मुख्य भूमिकाओं में रखकर ऑस्कर विजेता फिल्में बनाई जाती हैं, वहीं हमारे यहां बुजुर्ग कलाकारों को अक्सर पारिवारिक ड्रामा में बैकग्राउंड प्रॉप्स की तरह इस्तेमाल करके छोड़ दिया जाता है।
5. भारतीय सिनेमा और ओटीटी का दोहरा चरित्र: उम्रदराज कलाकारों के लिए किरदारों का सूखा
डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और ओटीटी के आने के बाद यह दावा किया गया था कि अब हर उम्र, वर्ग और जॉनर के लिए बेहतरीन और अर्थपूर्ण कंटेंट तैयार होगा। लेकिन हकीकत यह है कि ओटीटी पर भी बुजुर्ग किरदारों के लिए कहानियां बेहद सीमित हैं। आज भी अधिकांश वेब सीरीज और फिल्मों में वरिष्ठ कलाकारों को सिर्फ असहाय दादा-दादी, बीमार मां-बाप या कॉमिक रिलीफ के घिसे-पिटे सांचों में ही कैद रखा जाता है।
गंभीर और परतदार चरित्रों का अभाव वरिष्ठ कलाकारों के लिए सबसे बड़ी निराशा का कारण बनता है। 70 की उम्र में पहुंचने का मतलब यह कतई नहीं है कि एक इंसान के भीतर की भावनाएं, उसका संघर्ष या उसकी अभिनय क्षमता खत्म हो गई है। जब तक लेखक और निर्देशक सीनियर कलाकारों को केंद्र में रखकर सशक्त पटकथाएं नहीं लिखेंगे, तब तक सिनेमा का फलक अधूरा ही रहेगा।
6. बुनियादी शिष्टाचार और गरिमा की दरकार: इंडस्ट्री को तुरंत आत्ममंथन करने की जरूरत
सीनियर अभिनेत्री का यह फूटा गुस्सा केवल एक व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि पूरी एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के लिए एक आईना है। आज जब बड़े-बड़े स्टूडियोज और कॉर्पोरेट एजेंसियां प्रोफेशनलिज्म की बड़ी-बड़ी बातें करती हैं, तो उन्हें यह बुनियादी पाठ सीखने की सबसे ज्यादा जरूरत है कि प्रोफेशनलिज्म की पहली सीढ़ी मानवीय गरिमा और शिष्टाचार है।
कास्टिंग डायरेक्टर्स, फिल्ममेकर्स और प्रोडक्शन हेड्स को यह समझना होगा कि काम देना या न देना स्क्रिप्ट और बजट की मांग हो सकता है, लेकिन किसी का आदरपूर्वक अभिवादन करना, उनके संदेश का मर्यादा के साथ उत्तर देना और उनके दशकों के योगदान का सम्मान करना कोई विकल्प नहीं बल्कि अनिवार्य कर्तव्य है। जब तक भारतीय मनोरंजन उद्योग अपने वरिष्ठ और बुजुर्ग कलाकारों को वह सम्मान और जगह नहीं देगा जिसके वे हकदार हैं, तब तक इसका विकास अधूरा ही कहलाएगा।