पत्रकारिता के काले सच से पर्दा उठाती है 8 एपिसोड की ये वेब सीरीज, कोर्ट-कचहरी और अंडरवर्ल्ड के खेल में 7.6 रेटिंग वाली कहानी ने हिलाया सिस्टम
डिजिटल स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स यानी ओटीटी की दुनिया में हर हफ्ते दर्जनों थ्रिलर और एक्शन ड्रामा रिलीज होते हैं, लेकिन कुछ कहानियां ऐसी होती हैं जो सिर्फ मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि व्यवस्था की उन अंधेरी गलियों का सच सामने लाती हैं जहां आम इंसान की नजर कभी नहीं पहुंच पाती। अगर आप कोर्टरूम ड्रामा, खोजी पत्रकारिता और सिस्टम के अंदरूनी भ्रष्टाचार पर आधारित दमदार कंटेंट देखने के शौकीन हैं, तो नेटफ्लिक्स पर मौजूद 8 एपिसोड की क्राइम-थ्रिलर सीरीज 'स्कूप' (Scoop) आपकी वॉचलिस्ट में जरूर होनी चाहिए। 7.6 की शानदार आईएमडीबी (IMDb) रेटिंग वाली यह सीरीज इस बात का खौफनाक सबूत है कि कैसे ब्रेकिंग न्यूज की अंधी दौड़, पुलिस की सियासी चालें और अंडरवर्ल्ड का दबाव मिलकर एक जांबाज महिला पत्रकार की पूरी जिंदगी तबाह कर देते हैं।
ज्योतिर्मय डे हत्याकांड और जिग्ना वोरा की दर्दनाक दास्तान
यह वेब सीरीज किसी काल्पनिक पटकथा पर नहीं, बल्कि साल 2011 में मुंबई को हिलाकर रख देने वाले बहुचर्चित वरिष्ठ खोजी पत्रकार ज्योतिर्मय डे (जे डे) मर्डर केस पर आधारित है। सीरीज की कहानी पूर्व क्राइम रिपोर्टर जिग्ना वोरा की संस्मरण पुस्तक 'बिहाइंड बार्स इन भायखला: माय डेज इन प्रिजन' से प्रेरित है। कहानी में मुख्य किरदार जागृति पाठक (करिश्मा तन्ना) का है, जो मुंबई के एक नामी अखबार 'द ईस्टर्न एज' में सीनियर क्राइम रिपोर्टर और डिप्टी ब्यूरो चीफ होती हैं। जागृति अपने बेहतरीन नेटवर्क, पुलिस सूत्रों और अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन के सीधे फोन इंटरव्यूज की वजह से अखबार के पहले पन्ने पर हर दिन सबसे बड़ा 'स्कूप' छापने के लिए जानी जाती हैं। हालांकि, उनका यही रुतबा और सफलता उनके पुरुष साथियों और प्रतिस्पर्धी अखबारों की आंखों में चुभने लगती है।
एक सनसनीखेज मर्डर और ब्रेकिंग न्यूज से जेल की कालकोठरी तक का सफर
सीरीज में असली भूचाल तब आता है जब दिनदहाड़े जागृति के वरिष्ठ और जाने-माने पत्रकार जयदेब सेन (फिल्म में जे डे का काल्पनिक नाम) की अंडरवर्ल्ड के गुर्गों द्वारा सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी जाती है। इस हत्याकांड से पूरी मुंबई पुलिस, मीडिया जगत और महाराष्ट्र सरकार में हड़कंप मच जाता है। जब पुलिस पर हत्यारों को पकड़ने और केस सुलझाने का भारी दबाव बनता है, तो जांच एजेंसियां और कुछ भ्रष्ट अफसर मामले का रुख भटकाने के लिए खुद जागृति पाठक को ही इस साजिश की मुख्य संदिग्ध बना देते हैं। आरोप लगाया जाता है कि पेशेवर जलन के चलते जागृति ने छोटा राजन को जे डे का पता और बाइक का नंबर दिया था। कल तक जो रिपोर्टर खुद पुलिस कमिश्नर से सवाल पूछती थी, उसे मकोका (MCOCA) जैसे सख्त आतंकी कानून के तहत गिरफ्तार कर भायखला जेल की सलाखों के पीछे धकेल दिया जाता है।
जेल की यातनाएं और मीडिया ट्रायल का वीभत्स चेहरा
निर्देशक हंसल मेहता ने सीरीज में केवल कानूनी लड़ाई ही नहीं दिखाई है, बल्कि उस खौफनाक दौर को भी उजागर किया है जब एक महिला पत्रकार को जेल के अंदर कैदियों की नफरत और सिस्टम की बर्बरता झेलनी पड़ती है। जेल में जागृति का सामना उन कैदियों से होता है जिनके अपराधों पर कभी उसने खुद फ्रंट पेज स्टोरी लिखी थी। दूसरी तरफ, बाहर की दुनिया में उसी का अपना मीडिया समाज टीआरपी और सनसनी के लिए जागृति को 'अंडरवर्ल्ड की मोहरा' और 'गैंगस्टर की करीबी' बताकर उसका चरित्र हनन करने लगता है। सीरीज बहुत तीखे अंदाज में सवाल उठाती है कि जब चौथे स्तंभ का ही एक हिस्सा बिना किसी सबूत के अपने ही साथी को दोषी ठहराने पर आमादा हो जाए, तो न्याय की उम्मीद किससे की जा सकती है।
करिश्मा तन्ना की जिंदगी का सबसे बेहतरीन अभिनय
'स्कूप' का सबसे मजबूत पक्ष इसका दमदार अभिनय और निर्देशन है। जागृति पाठक के रूप में करिश्मा तन्ना ने अपने करियर का सर्वश्रेष्ठ अभिनय पेश किया है। एक आत्मविश्वासी और महत्वाकांक्षी पत्रकार से लेकर सलाखों के पीछे बेबस, डरी हुई और टूटती हुई महिला के दर्द को उन्होंने स्क्रीन पर जिस शिद्दत से जिया है, वह दर्शकों के रोंगटे खड़े कर देता है। वहीं, अखबार के संपादक इमरान सिद्दीकी की भूमिका में अभिनेता मोहम्मद जीशान अय्यूब ने कमाल का काम किया है। वह उसूलों पर चलने वाले एक ऐसे संपादक बने हैं जो अपनी सहयोगी के निर्दोष होने पर भरोसा करता है और मैनेजमेंट के भारी दबाव के बावजूद सच्चाई की लड़ाई लड़ता है। इसके अलावा प्रसनजीत चटर्जी, हरमन बावेजा और तनिष्ठा चटर्जी जैसे मंझे हुए कलाकारों ने अपने-अपने किरदारों में जान फूंक दी है।
क्यों हर दर्शक को देखनी चाहिए 8 एपिसोड की यह थ्रिलर सीरीज?
अगर आप एक ऐसी कहानी देखना चाहते हैं जिसमें कोई फिजूल का मेलोड्रामा या जबरन खींचा गया थ्रिलर न हो, तो 'स्कूप' हर लिहाज से खरी उतरती है। 8 कड़े एपिसोड्स में बंधी यह सीरीज लगातार यह सोचने पर मजबूर करती है कि सत्ता, पुलिस और अंडरवर्ल्ड के खेल में किस तरह एक पत्रकार की साख और आजादी को कुचला जा सकता है। यह सीरीज हमें याद दिलाती है कि पत्रकारिता सिर्फ हेडलाइंस बनाने का नाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बहुत बड़ी नैतिक जिम्मेदारी होती है। नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध यह सीरीज आपको पहले एपिसोड से लेकर क्लाइमेक्स तक सीट से बांधे रखती है और सिस्टम की हकीकत से रूबरू कराती है।