'पद्मावत' के जौहर सीन पर बरसों बाद छलका राइटर प्रकाश कपाड़िया का दर्द: बोले- वो उस दौर का खौफनाक सच

'पद्मावत' के जौहर सीन पर बरसों बाद छलका राइटर प्रकाश कपाड़िया का दर्द: बोले- वो उस दौर का खौफनाक सच

भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी भव्यता, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विवादों की बात होगी, तब संजय लीला भंसाली की फिल्म 'पद्मावत' का नाम सबसे आगे लिया जाएगा। साल 2018 में रिलीज हुई इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर 300 करोड़ से ज्यादा की कमाई कर इतिहास रचा था। हालांकि, फिल्म के रिलीज से पहले राजपूत करणी सेना के उग्र विरोध से लेकर रिलीज के बाद इसके बहुचर्चित 'जौहर' सीन तक, इस फिल्म ने कई वैचारिक बहसों को जन्म दिया था। अब रिलीज के वर्षों बाद फिल्म के पटकथा और संवाद लेखक प्रकाश कपाड़िया ने उस विवादास्पद जौहर दृश्य पर अपनी चुप्पी तोड़ी है और आलोचकों को दो-टूक जवाब दिया है।

प्रकाश कपाड़िया ने एक हालिया इंटरव्यू में फिल्म के क्लाइमैक्स पर बात करते हुए कहा कि जौहर कोई मनगढ़ंत कहानी या महिमामंडन नहीं था, बल्कि वह उस दौर की बेहद दर्दनाक और कड़वी सच्चाई थी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि एक फिल्ममेकर और लेखक के तौर पर उनकी जिम्मेदारी इतिहास के पन्नों में दर्ज यथार्थ को ईमानदारी से पर्दे पर उतारने की थी। कपाड़िया ने तंज कसते हुए कहा कि आप चाहे कितनी भी शोधपरक, भव्य और संवेदनशील फिल्म बना लें, समाज में कुछ लोग ऐसे हमेशा मौजूद रहेंगे जिनका एकमात्र काम केवल विवाद खड़े करना और कमियां तलाशना होता है।

2. 14वीं सदी के खौफ और खिलजी के आतंक को 21वीं सदी के आधुनिक चश्मे से देखना गलत

प्रकाश कपाड़िया ने अपनी बात को विस्तार से समझाते हुए कहा कि जब आप 13वीं-14वीं शताब्दी के मध्यकालीन भारत की किसी घटना पर आधारित फिल्म लिख रहे होते हैं, तो आपको उस कालखंड की परिस्थितियों, युद्ध के नियमों और हमलावरों की मानसिकता को समझना पड़ता है। अल्लाउद्दीन खिलजी की सेना जब चित्तौड़गढ़ के किले में दाखिल हुई थी, तो उस वक्त राजपूत वीरांगनाओं के सामने दो ही रास्ते थे—या तो वे विदेशी आक्रांता के हाथों अपमान, दासता और बर्बरता झेलतीं या फिर अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए अपनी जान न्योछावर कर देतीं।

लेखक ने जोर देकर कहा कि रानी पद्मावती और चित्तौड़ की हजारों महिलाओं द्वारा चुना गया जौहर का मार्ग उस दौर की लाचारी और सर्वोच्च आत्मसम्मान का प्रतीक था। आज 21वीं सदी के एयर-कंडीशंड कमरों में बैठकर महिला सशक्तिकरण के आधुनिक पैमानों पर उस दौर के आत्मदाह को 'सती प्रथा का महिमामंडन' कहना इतिहास के प्रति घोर अज्ञानता को दर्शाता है। कपाड़िया के अनुसार, सिनेमा यदि अपने इतिहास के स्याह पहलुओं को दिखाने से डरने लगेगा, तो वह कभी भी प्रामाणिक कला का रूप नहीं ले पाएगा।

3. स्वरा भास्कर के उस चर्चित 'ओपन लेटर' पर फिर उठी बहस: क्या नारी का अस्तित्व सिर्फ देह था?

फिल्म 'पद्मावत' के रिलीज होने के तुरंत बाद बॉलीवुड अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने निर्देशक संजय लीला भंसाली के नाम एक खुला खत (Open Letter) लिखा था, जिसने पूरे देश में बौद्धिक बहस छेड़ दी थी। स्वरा भास्कर ने उस खत में लिखा था कि फिल्म के अंत में जौहर के दृश्य को देखकर उन्हें ऐसा लगा जैसे एक महिला का पूरा अस्तित्व उसकी योनि और देह तक सीमित कर दिया गया हो। उन्होंने आरोप लगाया था कि भंसाली ने अपनी सिनेमाई कला के जरिए महिलाओं के आत्मदाह को खूबसूरत और गौरवशाली बनाकर पेश किया, जो समाज में गलत संदेश देता है।

प्रकाश कपाड़िया ने बिना किसी का सीधा नाम लिए इस तरह की आलोचनाओं को सतही करार दिया। उन्होंने कहा कि फिल्म में जौहर को किसी उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि चित्तौड़ के संपूर्ण विनाश और एक असहनीय त्रासदी के रूप में दिखाया गया था। जब रानी पद्मावती (दीपिका पादुकोण) आग के कुंड की तरफ कदम बढ़ाती हैं, तो पार्श्व संगीत और सिनेमैटोग्राफी में गर्व के साथ-साथ एक गहरा मातम और पीड़ा झलकती है। लेखक ने सवाल उठाया कि क्या इतिहास में दर्ज इस तरह के बलिदान को सिर्फ इसलिए छुपा दिया जाना चाहिए क्योंकि वह आज के प्रगतिशील विचारों से मेल नहीं खाता? इतिहास जैसा घटा था, उसे उसी परिप्रेक्ष्य में समझना एक परिपक्व दर्शक की निशानी है।

4. संजय लीला भंसाली की शोध और सिनेमाई दृष्टि: विवादों के बीच रची गई अमर कृति

'पद्मावत' के निर्माण की यात्रा किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थी। राजस्थान में शूटिंग के दौरान भंसाली पर हुए हमले से लेकर दीपिका पादुकोण की नाक काटने की धमकियों तक, फिल्म ने रिलीज से पहले देशव्यापी हिंसा और सेंसर बोर्ड की कड़ी जांच का सामना किया था। फिल्म का नाम 'पद्मावती' से बदलकर 'पद्मावत' करना पड़ा था और कई डिस्क्लेमर जोड़े गए थे ताकि यह स्पष्ट हो सके कि फिल्म मलिक मोहम्मद जायसी के 16वीं सदी के महाकाव्य और इतिहास के संगम पर आधारित है।

कपाड़िया ने निर्देशक संजय लीला भंसाली की प्रतिबद्धता की सराहना करते हुए कहा कि भंसाली अपने विजन को लेकर पूरी तरह अडिग थे। खिलजी के किरदार में रणवीर सिंह की हैवानियत और वहशीपन को स्थापित करना बेहद जरूरी था, ताकि दर्शक यह महसूस कर सकें कि चित्तौड़ की रानियां मौत को क्यों गले लगा रही थीं। अगर खिलजी के खतरे को कम करके आंका जाता, तो जौहर का महत्व समझ ही नहीं आता। फिल्म की हर एक पंक्ति और दृश्य को राजपूत मर्यादा और ऐतिहासिक तथ्यों के बीच संतुलन बैठाकर लिखा गया था।

5. ऐतिहासिक फिल्मों का मूल्यांकन: कलात्मक स्वतंत्रता और समाज का दोहरा रवैया

आज के दौर में जब पीरियड ड्रामा और ऐतिहासिक फिल्मों को लेकर संवेदनशीलता बहुत बढ़ चुकी है, प्रकाश कपाड़िया का यह बयान फिल्म इंडस्ट्री के लिए एक बड़ा सबक है। फिल्म लेखक का मानना है कि भारतीय समाज अक्सर कला के साथ दोहरा रवैया अपनाता है। जब इतिहास की कोई दुखद या जटिल घटना दिखाई जाती है, तो एक वर्ग उस पर इतिहास से छेड़छाड़ का आरोप लगाता है, वहीं दूसरा वर्ग उसे मॉडर्न लिबरल विचारों की कसौटी पर कसकर खारिज कर देता है।

कपाड़िया ने कहा कि 'पद्मावत' ने भारतीय सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर, वेशभूषा, संवाद और कलाकारों का अभिनय आज भी मील का पत्थर माना जाता है। ऐसे में सिर्फ एक दृश्य को उसके संदर्भ से काटकर विवाद पैदा करना उन हजारों तकनीशियनों और कलाकारों की मेहनत के साथ अन्याय है जिन्होंने वर्षों तक उस प्रोजेक्ट पर पसीना बहाया था।

'पद्मावत' आज भी दुनिया भर के सिनेमाप्रेमियों के बीच एक उत्कृष्ट कृति के रूप में देखी जाती है। प्रकाश कपाड़िया के इस ताजा स्पष्टीकरण ने यह साफ कर दिया है कि कला कभी भी समय के दबाव में झुककर इतिहास को नहीं बदल सकती। जौहर का वह दृश्य किसी प्रथा का प्रचार नहीं था, बल्कि चित्तौड़ के किले की उन खामोश दीवारों की चीख थी, जिसे भंसाली और कपाड़िया ने पर्दे पर अमर कर दिया।