कलकत्ता हाई कोर्ट में गूंजी रिश्वतकांड की ऑडियो क्लिप, शिक्षक तबादला रैकेट पर जस्टिस अमृता सिन्हा सख्त
पश्चिम बंगाल की प्रशासनिक और शैक्षिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार की परतें एक बार फिर अदालत की चौखट पर बेनकाब हुई हैं। राज्य में पूर्ववर्ती और मौजूदा शासनकाल के दौरान शिक्षा महकमे में हुई अनियमिताओं की गूंज अभी थमी भी नहीं थी कि अब सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के मनचाहे तबादले (Teacher Transfer) के नाम पर चल रहे एक सुनियोजित घूसकांड ने तहलका मचा दिया है। कलकत्ता हाई कोर्ट के समक्ष एक पीड़ित शिक्षक ने सीधे सबूत के तौर पर एक सनसनीखेज ऑडियो रिकॉर्डिंग पेश की, जिसने अदालत कक्ष में मौजूद सभी अधिवक्ताओं और अधिकारियों को सन्न कर दिया। इस ऑडियो टेप में एक बिचौलिया साफ तौर पर शिक्षक से यह कहता सुनाई दे रहा है कि यदि वह दो लाख रुपये की नकद रिश्वत दे देता है, तो उसका तबादला उसकी पसंदीदा जगह पर तत्काल करवा दिया जाएगा।
इस चौंकाने वाले ऑडियो साक्ष्य को सुनने के बाद कलकत्ता उच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति अमृता सिन्हा ने मामले की गंभीरता पर गहरी नाराजगी और हैरानी व्यक्त की। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि शिक्षा के पवित्र मंदिर को इस प्रकार सौदेबाजी और दलाली का केंद्र नहीं बनने दिया जा सकता। मामले को अत्यंत संवेदनशील और आपराधिक कदाचार मानते हुए जस्टिस सिन्हा ने कोलकाता पुलिस को तत्काल प्रभाव से इस पूरे प्रकरण में एफआईआर दर्ज कर निष्पक्ष जांच शुरू करने का कड़ा निर्देश जारी कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि न्यायिक प्रणाली ऐसे अवैध रैकेट को कतई बर्दाश्त नहीं करेगी।
कस्बा पुलिस स्टेशन को कॉल डिटेल्स और गिरोह का पर्दाफाश करने का निर्देश, 25 सितंबर तक मांगी रिपोर्ट
अदालत ने कोलकाता पुलिस के अंतर्गत आने वाले कस्बा पुलिस स्टेशन (Kasba Police Station) के प्रभारी अधिकारी (ओसी) को व्यक्तिगत रूप से इस जांच की कमान संभालने का आदेश दिया है। हाई कोर्ट ने पुलिस को यह पता लगाने का स्पष्ट दायित्व सौंपा है कि पीड़ित शिक्षक को जिस मोबाइल नंबर से रिश्वत की मांग वाली कॉल आई थी, उसका वास्तविक स्रोत (Source) क्या है और वह सिम कार्ड किसके नाम पर पंजीकृत है। इसके साथ ही जांच एजेंसी को यह गहराई से पड़ताल करनी होगी कि कॉल करने वाला व्यक्ति क्या किसी बड़े अंतर-विभागीय गिरोह, संगठित दलालों के नेटवर्क या शिक्षा विभाग के किसी आंतरिक कर्मचारी से जुड़ा हुआ है।
न्यायमूर्ति अमृता सिन्हा ने कस्बा थाना प्रभारी को आदेशित किया है कि वे इस मामले में त्वरित तकनीकी छानबीन पूरी करें और 25 सितंबर तक अपनी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में अदालत के समक्ष प्रस्तुत करें। पुलिस को यह भी पता लगाना होगा कि क्या इस बिचौलिये ने पहले भी कई अन्य असहाय शिक्षकों से मनपसंद पोस्टिंग के नाम पर अवैध वसूली की है। गौरतलब है कि राज्य के स्कूल सेवा आयोग (SSC) ने भी इस पूरे वाकये की निष्पक्ष जांच की पैरवी की है, जिससे यह संकेत मिलता है कि प्रशासनिक स्तर पर भी इस कथित रैकेट के तंत्र को लेकर भारी खलबली मची हुई है।
राज्य के स्कूलों में छात्र-शिक्षक अनुपात का असंतुलन: सरप्लस टीचर्स और खाली कक्षाओं का संकट
पश्चिम बंगाल के प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों की तैनाती और अनुपात (Pupil-Teacher Ratio - PTR) को लेकर लंबे समय से गंभीर विसंगतियां सामने आती रही हैं। राज्य के ग्रामीण और सुदूरवर्ती इलाकों के अनेक सरकारी स्कूल शिक्षकों के भारी अभाव से जूझ रहे हैं, जहां सैकड़ों विद्यार्थियों पर मात्र एक या दो शिक्षक ही तैनात हैं। वहीं दूसरी तरफ, कोलकाता और उसके नजदीकी शहरी व उपनगरीय इलाकों के कुछ स्कूलों में छात्रों का नामांकन नगण्य या शून्य के बराबर है, लेकिन वहां आवश्यकता से अधिक शिक्षक (Surplus Teachers) वर्षों से कार्यरत हैं। इस भारी असंतुलन के कारण राज्य की बुनियादी शिक्षा व्यवस्था बुरी तरह चरमरा रही थी।
इस प्रशासनिक संकट और असंतुलन को दुरुस्त करने का हवाला देते हुए स्कूल शिक्षा विभाग (School Education Department) ने इसी साल जुलाई में एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जारी की थी। इस नीति का मुख्य उद्देश्य ऐसे अतिरिक्त शिक्षकों की पहचान करना था जो कम छात्र संख्या वाले स्कूलों में जमे हुए हैं, ताकि उन्हें उन दूरदराज के स्कूलों में स्थानांतरित किया जा सके जहां शिक्षकों की भारी कमी है। विभाग ने दावा किया था कि इस प्रक्रिया से छात्र-शिक्षक अनुपात को तार्किक बनाया जाएगा। हालांकि, वास्तविक धरातल पर इस एसओपी की आड़ में दलालों और बिचौलियों का एक समानांतर सिंडिकेट सक्रिय हो गया, जिसने तबादला रुकवाने या मनपसंद स्कूल में पोस्टिंग दिलाने के नाम पर शिक्षकों से लाखों रुपये की खुली उगाही शुरू कर दी।
शिक्षा विभाग की ट्रांसफर एसओपी पर हाई कोर्ट की अंतरिम रोक, 18 दिसंबर तक तबादलों पर पूरी तरह ताला
राज्य सरकार की उस विवादास्पद एसओपी के तहत सबसे पहले खाली नामांकन वाले स्कूलों, अतिरिक्त शिक्षकों वाले परिसरों और हाई-पीटीआर वाले शिक्षण संस्थानों की एक समेकित सूची बनाकर सार्वजनिक की जानी थी। परंतु पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता के अभाव, मनमानी और अब रिश्वतखोरी के ऑडियो सबूत सामने आने के बाद कलकत्ता उच्च न्यायालय ने इस पूरी कवायद की विश्वसनीयता पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। जस्टिस अमृता सिन्हा की एकल पीठ ने राज्य सरकार की इस ट्रांसफर प्रणाली में भारी खामियों और संभावित भ्रष्टाचार को देखते हुए तत्काल प्रभाव से कड़ा कदम उठाया है।
अदालत ने स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा जारी की गई संबंधित एसओपी पर 18 दिसंबर तक के लिए अंतरिम रोक (Interim Stay) लगा दी है। अपने विस्तृत निर्देश में पीठ ने दो टूक शब्दों में रेखांकित किया कि जब तक इस पूरे तंत्र की निष्पक्ष समीक्षा नहीं हो जाती और कथित घूसकांड की जांच पूरी नहीं होती, तब तक राज्य का कोई भी विभाग किसी भी शिक्षक का 'सरप्लस ट्रांसफर' नहीं कर सकेगा। अदालत के इस कड़े हस्तक्षेप से एक ओर जहां रिश्वत के दबाव में जी रहे सैकड़ों शिक्षकों को फौरी राहत मिली है, वहीं दूसरी ओर राज्य के शिक्षा महकमे में तबादला नीति के नाम पर चल रहे खेल पर पूरी तरह ब्रेक लग गया है।