सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम की मुहर के बाद केंद्र का बड़ा फैसला: दिल्ली, कर्नाटक समेत 4 हाई कोर्ट को मिले 14 नए जज

सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम की मुहर के बाद केंद्र का बड़ा फैसला: दिल्ली, कर्नाटक समेत 4 हाई कोर्ट को मिले 14 नए जज

भारतीय न्यायपालिका में लंबित मुकदमों के त्वरित निस्तारण और अदालतों की कार्यक्षमता को सुदृढ़ करने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक अहम कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम की आधिकारिक सिफारिशों को मंजूरी देते हुए केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्रालय ने देश के चार प्रमुख उच्च न्यायालयों में कुल चौदह नए न्यायाधीशों की नियुक्ति की अधिसूचना जारी कर दी है। शनिवार को जारी इस आधिकारिक आदेश के तहत राष्ट्रीय राजधानी की दिल्ली हाई कोर्ट समेत कर्नाटक, झारखंड तथा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट में स्थायी और अतिरिक्त जजों की पदस्थापना की गई है। इस बड़े न्यायिक फेरबदल का मुख्य उद्देश्य उच्च न्यायालयों में रिक्त चल रहे पदों को भरकर केसों के बढ़ते बोझ को हल्का करना है।

विधि मंत्रालय द्वारा जारी अलग-अलग अधिसूचनाओं के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि दिल्ली हाई कोर्ट को कार्यबल के लिहाज से सबसे बड़ा लाभ मिला है, जहां सात नए चेहरों को न्यायिक जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसके अलावा दक्षिण भारत के कर्नाटक हाई कोर्ट, पूर्वी भारत के झारखंड हाई कोर्ट और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण केंद्र शासित प्रदेशों जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख के संयुक्त उच्च न्यायालय में भी नई नियुक्तियां प्रभाव में आ चुकी हैं। यह निर्णय देश की शीर्ष न्यायिक पीठ और कार्यपालिका के बीच समन्वय का एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

दिल्ली हाई कोर्ट को मिले 7 नए चेहरे, दो स्थायी और पांच अतिरिक्त जज संभालेंगे कार्यभार

राजधानी में मुकदमों की अत्यधिक संख्या और वाणिज्यिक विवादों के बढ़ते दबाव के बीच दिल्ली हाई कोर्ट की कार्यक्षमता में इस फैसले से बड़ा इजाफा होगा। केंद्र सरकार की अधिसूचना के मुताबिक दिल्ली हाई कोर्ट को दो स्थायी न्यायाधीश और पांच अतिरिक्त न्यायाधीश मिले हैं। दिल्ली की अदालतें राष्ट्रीय महत्व के संवेदनशील संवैधानिक मामलों, कॉरपोरेट विवादों, बौद्धिक संपदा अधिकारों और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के प्रकरणों की लगातार सुनवाई करती हैं। ऐसे में सात नए न्यायाधीशों की यह पदस्थापना सीधे तौर पर मामलों की दैनिक सुनवाई की गति को तेज करेगी।

न्यायिक प्रक्रिया के तय नियमों के अनुसार, हाई कोर्ट में नियुक्तियां दो मुख्य श्रेणियों—न्यायिक सेवा से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों और बार काउंसिल के अनुभवी वरिष्ठ अधिवक्ताओं के कोटे से की जाती हैं। दिल्ली में नियुक्त इन जजों के लंबे कानूनी और न्यायिक अनुभव का लाभ राजधानी की अधीनस्थ अदालतों से आने वाली अपीलों तथा मूल अधिकार क्षेत्र के मुकदमों के त्वरित समाधान में मिलेगा। रोस्टर के संतुलित होने से विभिन्न खंडपीठों का गठन सुगम होगा और याचिकाओं की पेंडेंसी दर में कमी देखने को मिलेगी।

कर्नाटक, झारखंड और जम्मू-कश्मीर व लद्दाख हाई कोर्ट में नई नियुक्तियों का पूरा ब्योरा

दिल्ली के अतिरिक्त देश के तीन अन्य राज्यों के उच्च न्यायालयों में भी न्यायिक रिक्तियों को भरने की प्रक्रिया पूरी की गई है। दक्षिण भारत के प्रमुख तकनीकी और औद्योगिक केंद्र कर्नाटक हाई कोर्ट में तीन अतिरिक्त जजों की तैनाती की गई है। कर्नाटक में बेंगलूरु पीठ के अलावा धारवाड़ और कलबुर्गी की सर्किट बेंचों पर मुकदमों का भारी दबाव रहता है, जहां इन अतिरिक्त जजों के कार्यभार ग्रहण करने से नागरिकों को शीघ्र न्याय प्राप्त करने में सहायता मिलेगी।

पूर्वी राज्य झारखंड के रांची स्थित हाई कोर्ट में तीन नियमित जजों की नियुक्ति को अंतिम रूप दिया गया है। औद्योगिक विवादों, खनन कानूनों, जनहित याचिकाओं और आपराधिक अपीलों के निपटारे के संदर्भ में झारखंड हाई कोर्ट के लिए यह पदस्थापना बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। वहीं सामरिक दृष्टि से संवेदनशील केंद्र शासित प्रदेशों जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख के साझा उच्च न्यायालय में एक नए न्यायाधीश की नियुक्ति को स्वीकृति मिली है। यह नियुक्ति इस सीमावर्ती क्षेत्र में विधिक प्रशासन को और अधिक प्रभावी तथा पारदर्शी बनाने में योगदान देगी।

अतिरिक्त जज से स्थायी जज बनने की संवैधानिक व्यवस्था और कार्यकाल के नियम

उच्च न्यायालयों में न्यायिक नियुक्तियों की एक तय संवैधानिक और प्रशासनिक कार्यप्रणाली होती है। भारतीय संविधान के तहत जब किसी वकील या न्यायिक अधिकारी को पहली बार उच्च न्यायालय में अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया जाता है, तो उनका कार्यकाल सामान्य तौर पर दो वर्षों की निश्चित अवधि के लिए निर्धारित होता है। इस दो साल के कार्यकाल के दौरान उनके न्यायिक निर्णयों, कार्यशैली, निष्पक्षता और मुकदमों के निस्तारण की गुणवत्ता का आंतरिक मूल्यांकन किया जाता है।

दो वर्ष की यह मूल्यांकन अवधि सफलतापूर्वक पूरी होने के उपरांत सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम और संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश पर उन्हें स्थायी न्यायाधीश के पद पर पदोन्नत करने की वैधानिक प्रक्रिया अमल में लाई जाती है। यह प्रणाली यह सुनिश्चित करती है कि उच्चतर न्यायपालिका में आने वाले न्यायाधीशों की दक्षता निरंतर बनी रहे। संविधान के अनुच्छेद 217 और अनुच्छेद 224 के अंतर्गत संचालित यह प्रक्रिया देश की कानून व्यवस्था में संतुलन और न्यायिक शुचिता बनाए रखने का एक प्रमुख आधार स्तंभ है।

लंबित मुकदमों की चुनौती और भारतीय न्यायपालिका के लिए इस फैसले के मायने

भारत भर के उच्च न्यायालयों में लाखों दीवानी और फौजदारी मामले कई वर्षों से लंबित हैं। न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या और वास्तविक तैनाती के बीच का अंतर हमेशा से एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती रहा है। सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम लगातार विभिन्न उच्च न्यायालयों से नामों का चयन कर केंद्र को अपनी संस्तुति भेजता रहा है। 14 जजों की इस संयुक्त नियुक्ति से अदालतों में जजों के खाली बेंचों को क्रियान्वित करने में सीधी मदद मिलेगी, जिससे प्रतिदिन सूचीबद्ध होने वाले मुकदमों की संख्या बढ़ सकेगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर नियुक्तियां होने से न्यायिक ढांचे पर जनता का विश्वास सुदृढ़ होता है। विशेष रूप से दिल्ली और कर्नाटक जैसे बड़े आर्थिक व प्रशासनिक केंद्रों में जजों की उपलब्धता सीधे तौर पर व्यापार सुगमता, संविदात्मक विवादों के शीघ्र समाधान और आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों के संरक्षण पर असर डालती है। विधि मंत्रालय द्वारा यह त्वरित कदम उठाये जाने से उम्मीद बंधी है कि शेष उच्च न्यायालयों में भी रिक्त चल रहे अन्य पदों पर शीघ्र ही नियुक्तियों की अधिसूचनाएं जारी की जाएंगी।