'एसिड की खुदरा बिक्री पर हमेशा के लिए लगा दिया जाए पूर्ण प्रतिबंध?' सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम; केंद्र और राज्य सरकारों से मांगी विस्तृत राय
देश भर में तमाम कड़े कानूनों, पुलिसिया निगरानी और दिशा-निर्देशों के बावजूद महिलाओं एवं युवतियों पर होने वाले बर्बर एसिड हमलों की घटनाओं पर देश की शीर्ष अदालत ने एक बार फिर कड़ा और ऐतिहासिक रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट में एसिड हमलों से संबंधित एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश और संबंधित पीठ ने गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए सवाल उठाया कि क्यों न देश भर में एसिड (तेजाब) की दुकानों, हार्डवेयर स्टोर्स और खुदरा बाजारों में होने वाली खुली बिक्री (Over-the-Counter Retail Sale) पर पूरी तरह से रोक लगा दी जाए। अदालत ने इस संवेदनशील और मानवीय विषय पर केंद्र सरकार तथा सभी राज्य सरकारों एवं केंद्र शासित प्रदेशों से उनकी आधिकारिक राय और विस्तृत हलफनामा मांगा है।
अदालत का स्पष्ट मानना है कि जब तक बाजारों, मोहल्ले की किराना दुकानों और ऑनलाइन ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर तेजाब चंद रुपयों में बेहद आसानी से उपलब्ध होता रहेगा, तब तक इस जघन्य अपराध की मानसिकता और आसान पहुंच पर लगाम लगाना नामुमकिन होगा। दिल्ली-एनसीआर, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, राजस्थान और कर्नाटक समेत देश के विभिन्न हिस्सों से आए दिन सामने आने वाली घटनाएं यह साबित करती हैं कि कागजी नियम और प्रशासनिक चेतावनियां जमीनी स्तर पर महिलाओं और मासूम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रही हैं।
2013 के ऐतिहासिक दिशा-निर्देश और जमीनी हकीकत: क्यों नाकाम रहे पुराने नियम?
भारत में एसिड हमलों के खिलाफ सबसे बड़ा कानूनी और नीतिगत मोड़ साल 2013 में आया था, जब एसिड अटैक सर्वाइवर लक्ष्मी अग्रवाल द्वारा दायर ऐतिहासिक जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने कई कड़े दिशा-निर्देश जारी किए थे। उस ऐतिहासिक फैसले में शीर्ष अदालत ने आदेश दिया था कि देश में कोई भी व्यापारी या दुकानदार बिना वैध पहचान पत्र (Photo ID) और खरीददार के पते के प्रमाण के किसी भी व्यक्ति को एसिड नहीं बेचेगा। इसके अलावा हर विक्रेता के लिए यह अनिवार्य किया गया था कि वह एसिड के कुल स्टॉक और खरीददारों के नाम-पते का एक अलग रजिस्टर (Logbook) संधारित करेगा और इसकी जानकारी संबंधित सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (SDM) और स्थानीय पुलिस को समय-समय पर देगा।
उस फैसले में 18 वर्ष से कम उम्र के किसी भी नाबालिग को तेजाब बेचना पूर्णतः प्रतिबंधित किया गया था और बिना लाइसेंस खुदरा बिक्री पर दंडात्मक कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे। हालांकि, इस ऐतिहासिक आदेश के एक दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी हकीकत यह है कि देश के लगभग हर छोटे-बड़े शहर के बाजारों में कोई भी व्यक्ति बिना किसी पहचान पत्र, पूछताछ या रिकॉर्ड के 20 से 50 रुपये में तीव्र सांद्रता (High Concentration) वाला जानलेवा तेजाब आसानी से खरीद सकता है। स्थानीय स्तर पर प्रशासन और पुलिस द्वारा दुकानों का औचक निरीक्षण न किए जाने और स्टॉक रजिस्टरों की नियमित जांच के अभाव में ये नियम केवल फाइलों और कोर्ट के दस्तावेजों तक ही सीमित रह गए हैं।
ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स और किराना दुकानों पर आसान उपलब्धता: सुरक्षा तंत्र पर सवाल
डिजिटल युग में एसिड की उपलब्धता ने एक नया और खतरनाक रूप ले लिया है। बीते कुछ वर्षों में दिल्ली और अन्य महानगरों में ऐसे कई सनसनीखेज मामले सामने आए जहां हमलावरों ने किसी स्थानीय दुकान पर जाने का जोखिम उठाने के बजाय नामी ई-कॉमर्स वेबसाइट्स से घर बैठे घातक एसिड ऑर्डर किया और उसका इस्तेमाल अपराध में किया। जब पुलिस ने मामलों की तहकीकात की, तो यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर बिना किसी कड़े पहचान सत्यापन और निगरानी के औद्योगिक ग्रेड का अत्यधिक सांद्र एसिड सामान्य घरेलू सामान की तरह डिलीवर किया जा रहा था।
इसके साथ ही, शहरी और ग्रामीण इलाकों में टॉयलेट क्लीनर, टाइल्स साफ करने और नालियां खोलने के नाम पर आज भी अत्यंत तीव्र हाइड्रोक्लोरिक और सल्फ्यूरिक एसिड खुलेआम बोतलों में बेचा जाता है। पर्यावरण और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि आज के आधुनिक दौर में जब सुरक्षित, गैर-घातक और जैविक क्लीनिंग एजेंट्स (Bio-friendly Cleaners) बाजार में व्यापक रूप से उपलब्ध हैं, तो फिर आम घरों में ऐसे जानलेवा रसायनों के खुदरा उपयोग की कोई तार्किक या व्यावहारिक आवश्यकता ही नहीं रह जाती। सुप्रीम कोर्ट ने इसी पहलू को रेखांकित करते हुए सरकारों से पूछा है कि जब खुदरा स्तर पर इसकी कोई अपरिहार्य जरूरत नहीं है, तो इसकी खुली बिक्री की अनुमति देकर समाज के निर्दोष नागरिकों को खतरे में क्यों डाला जाए।
एसिड अटैक सर्वाइवर्स का दर्द: सिर्फ मुआवजा नहीं, हथियार पर रोक जरूरी
एसिड अटैक केवल एक शारीरिक चोट या सामान्य हमला नहीं है, बल्कि यह किसी इंसान की पूरी पहचान, गरिमा, मानसिक स्वास्थ्य और भविष्य को एक पल में जलाकर राख कर देने वाला सबसे अमानवीय और क्रूरतम अपराध है। इस हमले का शिकार होने वाले व्यक्ति—जिनमें 80 प्रतिशत से अधिक संख्या कम उम्र की महिलाओं और लड़कियों की होती है—को जीवन भर असहनीय शारीरिक पीड़ा, चेहरे और शरीर के विकृत होने का आघात, दृष्टिहीनता और समाज के उपेक्षापूर्ण रवैये का दंश झेलना पड़ता है।
पीड़ितों को सामान्य जीवन में वापस लौटने के लिए दर्जनों जटिल सर्जरी, स्किन ग्राफ्टिंग और लाखों-करोड़ों रुपये के चिकित्सा खर्च से गुजरना पड़ता है। हालांकि सरकार ने पीड़ितों के लिए वित्तीय मुआवजे, मुफ्त इलाज और नौकरियों में कुछ राहत के प्रावधान किए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर निजी अस्पतालों द्वारा मुफ्त इलाज में आनाकानी और सरकारी सहायता मिलने में लगने वाली लालफीताशाही पीड़ितों के जख्मों को और गहरा कर देती है। शीर्ष अदालत में याचिकाकर्ताओं की यह प्रमुख दलील रही है कि अपराध घटित होने के बाद मुआवजा देने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि अपराध के सबसे बड़े हथियार यानी खुले तेजाब की बाजार में मौजूदगी को ही हमेशा के लिए समाप्त कर दिया जाए।
औद्योगिक जरूरत बनाम आम सुरक्षा: क्या हो सकता है रेगुलेशन का सही मॉडल?
एसिड की खुदरा बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के रास्ते में अक्सर कपड़ा उद्योग, चमड़ा उद्योग, मेटल पॉलिशिंग, बैटरी निर्माण और वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में इसके अपरिहार्य उपयोग का तर्क दिया जाता है। हालांकि, कानूनी जानकारों और सुरक्षा विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि औद्योगिक उपयोग (Industrial & Commercial Use) और खुदरा बाजार (Retail Market) के बीच एक स्पष्ट और सख्त विभाजन रेखा खींची जा सकती है।
यदि केंद्र और राज्य सरकारें कड़ा कानून बनाकर केवल लाइसेंस प्राप्त पंजीकृत उद्योगों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और अधिकृत शैक्षणिक संस्थानों को ही भारी निगरानी में एसिड की थोक आपूर्ति की अनुमति दें, और किसी भी आम नागरिक या स्थानीय दुकानदार को खुले रूप में इसे रखने या बेचने पर गैर-जमानती अपराध के तहत पूर्ण प्रतिबंध लगा दें, तो इस समस्या पर 95 प्रतिशत तक काबू पाया जा सकता है। इसके लिए एक एकीकृत डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम और बारकोड व्यवस्था लागू की जा सकती है जिससे उत्पादक रासायनिक संयंत्र से लेकर अंतिम औद्योगिक उपभोक्ता तक रसायन के हर लीटर का सटीक डिजिटल हिसाब रखा जा सके।
संविधान के अनुच्छेद 21 और गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार की रक्षा
सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले में केंद्र और राज्यों से मांगी गई आधिकारिक राय देश में महिला सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के संरक्षण की दिशा में एक युगांतरकारी कदम साबित हो सकती है। मुख्य न्यायाधीश की बेंच ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत देश के प्रत्येक नागरिक को मिले 'जीवन और गरिमा के अधिकार' (Right to Life and Dignity) से बढ़कर कोई व्यापारिक या खुदरा हित नहीं हो सकता।
आने वाले दिनों में जब केंद्र और राज्य सरकारें अपना जवाब अदालत के समक्ष प्रस्तुत करेंगी, तब यह तय होगा कि क्या देश में एसिड की बिक्री को लेकर कोई नया, व्यापक और अभेद्य राष्ट्रीय कानून अस्तित्व में आता है। पूरे देश के सामाजिक संगठन, मानवाधिकार कार्यकर्ता और करोड़ों नागरिक अब शीर्ष अदालत के इस ऐतिहासिक कदम की ओर बड़ी उम्मीद से देख रहे हैं, ताकि आने वाले समय में किसी भी मासूम को इस खौफनाक और अमानवीय त्रासदी का शिकार न होना पड़े।