'अपनी बातें हमारे मुंह में न डालें, फॉर्म-6 पर कोई फैसला नहीं दिया'; गलत दावों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) और नए मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 से जुड़े मामले में अपनी मौखिक टिप्पणियों की गलत व्याख्या पर बेहद सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने सुनवाई के दौरान दो टूक शब्दों में स्पष्ट किया कि पीठ ने फॉर्म-6 की वैधता या प्रक्रिया को लेकर कोई अंतिम निर्णय नहीं सुनाया है। अदालत ने याचिकाकर्ताओं और कानूनी प्रतिनिधियों को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा, "अपनी बातें हमारे मुंह में डालने की कोशिश न करें।" शीर्ष अदालत की इस तल्ख टिप्पणी के बाद कानूनी और राजनीतिक गलियारों में चल रही उन अटकलों पर विराम लग गया है, जिनमें दावा किया जा रहा था कि कोर्ट ने चुनाव आयोग की फॉर्म-6 प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कोई बड़ा निर्देश जारी कर दिया है।
'अदालत ने जो नहीं कहा, उसे आदेश न बनाएं': पीठ की कड़ी फटकार
मामले की सुनवाई के दौरान जब एक पक्ष के वकील ने पिछली कार्यवाही का हवाला देते हुए यह दावा करने की कोशिश की कि शीर्ष अदालत ने फॉर्म-6 से जुड़े नियमों पर असहमति जताई है, तो पीठ ने तुरंत हस्तक्षेप करते हुए उन्हें टोक दिया। अदालत ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि सुनवाई के दौरान जजों द्वारा पूछे गए सवाल या की गई मौखिक टिप्पणियां अदालत का औपचारिक फैसला नहीं होतीं। पीठ ने कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि अदालती संवाद को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है और ऐसे बयान दिए जा रहे हैं मानो अदालत ने कोई फैसला दे दिया हो। पीठ ने साफ किया कि उसने फॉर्म-6 पर कोई निर्णय नहीं दिया है और न ही इस पर कोई अंतिम राय बनाई है।
क्या है फॉर्म-6 और एसआईआर से जुड़ा पूरा विवाद?
चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक फॉर्म-6 का इस्तेमाल किसी भी भारतीय नागरिक द्वारा मतदाता सूची में पहली बार अपना नाम जुड़वाने के लिए किया जाता है। पिछले कुछ समय से विपक्षी दलों और कई नागरिक संगठनों ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और फॉर्म-6 के सत्यापन नियमों में किए गए हालिया तकनीकी बदलावों पर सवाल उठाए हैं। आरोप लगाया गया है कि इन बदलावों और सख्त दस्तावेजों की शर्तों के कारण कई पात्र नागरिकों और वंचित वर्गों के नाम मतदाता सूची में जुड़ने से रह जा रहे हैं। इसी मुद्दे को लेकर शीर्ष अदालत में याचिकाएं दायर की गई हैं, जिनमें पूरी प्रक्रिया की समीक्षा और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की गुहार लगाई गई है।
मौखिक टिप्पणियों की रिपोर्टिंग और सोशल मीडिया नैरेटिव पर चिंता
अदालत ने इस बात पर भी गहरी चिंता जताई कि संवेदनशील संवैधानिक और चुनावी मामलों में अदालती कार्यवाहियों को सोशल मीडिया और बयानों के जरिए किस तरह सनसनीखेज बनाया जाता है। जजों ने कहा कि खुली अदालत में कानून के विभिन्न पहलुओं को समझने के लिए कई तरह के सवाल पूछे जाते हैं, लेकिन कुछ लोग केवल अपनी सुविधा के मुताबिक चुनिंदा वाक्यों को उठाकर सार्वजनिक विमर्श में यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि अदालत उनके पक्ष में खड़ी है। अदालत ने चेतावनी दी कि न्यायिक प्रक्रिया की शुचिता को बनाए रखना सभी पक्षों की जिम्मेदारी है और बिना लिखित आदेश के किसी भी तरह का भ्रामक दावा अदालत की अवमानना के दायरे में आ सकता है।
निष्पक्ष सुनवाई और लिखित आदेश के महत्व पर अदालत का जोर
शीर्ष अदालत ने दोहराया कि वह संविधान और कानून के दायरे में रहकर सभी पक्षों की दलीलों को विस्तार से सुन रही है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब भी इस मामले में कोई आदेश या फैसला आएगा, वह लिखित रूप में आधिकारिक तौर पर सार्वजनिक किया जाएगा। तब तक किसी भी पक्ष को अपने निष्कर्ष निकालने या अदालत के हवाले से मनगढ़ंत दावे करने से पूरी तरह बचना चाहिए। इस सख्त टिप्पणी के साथ अदालत ने मामले की अगली तारीख तय करते हुए दोनों पक्षों को अपनी लिखित दलीलें तय समयसीमा में जमा करने का निर्देश दिया।