मौलवी की नसीहत पर भड़के सीएम सतीशन ने दी 19वीं सदी वाली दलील, तो भड़क उठे इस्लामिक स्कॉलर्स; समस्थ नेताओं ने सीएम को दी नसीहत

मौलवी की नसीहत पर भड़के सीएम सतीशन ने दी 19वीं सदी वाली दलील, तो भड़क उठे इस्लामिक स्कॉलर्स; समस्थ नेताओं ने सीएम को दी नसीहत

केरल की प्रबुद्ध और प्रगतिशील राजनीति में धर्म, आधुनिकता और महिला अधिकारों को लेकर एक अभूतपूर्व वैचारिक घमासान छिड़ गया है। राज्य के मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन द्वारा एक वरिष्ठ और प्रभावशाली मुस्लिम धर्मगुरु की सार्वजनिक मंच से तीखी आलोचना किए जाने के बाद राज्य के प्रमुख इस्लामिक विद्वान और धार्मिक संगठन लामबंद हो गए हैं। महिलाओं के सार्वजनिक जीवन में आने पर पाबंदी लगाने और उन्हें केवल घर की चहारदीवारी तक सीमित रखने की वकालत करने वाले मौलवी के बयान को सीएम सतीशन ने '19वीं सदी की पिछड़ी सोच' करार दिया था। इसके साथ ही उन्होंने हदीस और इस्लामिक इतिहास के सुनहरे पन्नों का हवाला देते हुए महिलाओं के नेतृत्व का पुरजोर बचाव किया था। मुख्यमंत्री का यह बेबाक अंदाज रूढ़िवादी इस्लामिक संगठनों और प्रमुख सुन्नी विद्वानों को रास नहीं आया है। गुरुवार को मुख्यमंत्री से मिलने पहुंचे इस्लामिक विद्वानों के प्रतिनिधिमंडल ने उनके बयानों पर गहरी नाराजगी जताते हुए दो टूक शब्दों में कह दिया है कि राज्य के संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को शरिया और धार्मिक आस्था की व्याख्या करने का कोई अधिकार नहीं है।

मौलवी का बयान और विवाद की शुरुआत: 'महिलाएं घर में रहें, बाहर आने से होगी तबाही'

इस पूरे विवाद की चिंगारी केरल के 95 वर्षीय वरिष्ठ सुन्नी धर्मगुरु, समस्थ केरल जम-इय्यतुल उलमा (एपी गुट) के महासचिव और भारत के ग्रैंड मुफ्ती कांथापुरम एपी अबूबकर मुसलियार के एक सार्वजनिक बयान से भड़की। हाल ही में कोच्चि में आयोजित एक बड़े धार्मिक सम्मेलन और ईद मिलाद-उन-नबी के मौके पर मुस्लिम समुदाय के लिए जारी एक लिखित निर्देश में उन्होंने महिलाओं की सार्वजनिक उपस्थिति पर बेहद सख्त और विवादित टिप्पणी की थी।

कांथापुरम अबूबकर मुसलियार ने अपने संबोधन में कहा था कि महिलाओं को केवल अपने घरों के भीतर ही सीमित रहना चाहिए और उन्हें सार्वजनिक मंचों या पुरुषों के बीच जाने से बचना चाहिए। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यदि महिलाओं को खुले सार्वजनिक स्थानों पर लाया जाएगा, तो इससे समाज में 'भारी तबाही और तबाही का मंजर' पैदा होगा। उन्होंने कुरान की आयतों और पर्दे की व्यवस्था का संदर्भ देते हुए तर्क दिया कि महिलाओं की सुरक्षा और सामाजिक व्यवस्था इसी में है कि वे घरेलू दायरे में शांति से रहें। धर्मगुरु के इस बयान का वीडियो और संदेश जैसे ही सार्वजनिक हुआ, केरल के आधुनिक शिक्षित वर्ग, महिला संगठनों और सोशल मीडिया पर इसकी तीखी आलोचना शुरू हो गई।

सीएम सतीशन का पलटवार: 19वीं सदी की सोच, हजरत खदीजा और आयशा का दिया ऐतिहासिक उदाहरण

राज्य में गहराते आक्रोश के बीच मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन ने तिरुवनंतपुरम में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान धर्मगुरु के इस बयान को सिरे से खारिज करते हुए असाधारण रूप से कड़ा और प्रगतिशील रुख अपनाया। मुख्यमंत्री ने गठबंधन की राजनीतिक सीमाओं की परवाह किए बिना स्पष्ट किया कि न तो उनकी सरकार और न ही कोई सभ्य समाज ऐसी मध्यकालीन सोच का समर्थन कर सकता है।

मुख्यमंत्री सतीशन ने कहा, "यह 21वीं सदी का दौर है। कोई 19वीं सदी की घिसी-पिटी और प्रतिगामी सोच को आज के प्रगतिशील समाज पर नहीं थोप सकता। महिलाएं केवल घर की चहारदीवारी में कैद रहने के लिए पैदा नहीं हुई हैं, बल्कि वे समाज की मुख्यधारा का हिस्सा हैं और उन्हें जीवन के हर क्षेत्र में पूरी बराबरी के साथ आगे आने का हक है।" मुख्यमंत्री ने धर्मगुरु द्वारा धर्म का हवाला दिए जाने पर खुद इस्लामिक इतिहास की मिसालें पेश करते हुए कहा कि धर्म का गलत मतलब निकाला जा रहा है। उन्होंने रेखांकित किया, "पैगंबर हजरत मोहम्मद की पहली पत्नी बीबी खदीजा अपने दौर की एक बहुत बड़ी और सफल व्यवसायी थीं। पैगंबर की दूसरी पत्नी हजरत आयशा ने 'जंग-ए-जमल' (ऊंट की लड़ाई) में सेना का नेतृत्व किया था और वे कमांडर-इन-चीफ थीं। हजरत उमर के दरबार में एक महिला ने मेहर की रकम घटाने के फैसले पर खुलेआम सवाल खड़े किए थे। जब इस्लाम का इतिहास खुद महिलाओं के नेतृत्व और सशक्तिकरण का गवाह रहा है, तो आज महिलाओं को घर में बंद करने की बात करना इतिहास और धर्म दोनों के साथ अन्याय है।"

इस्लामिक स्कॉलर्स का कड़ा विरोध: जिफरी मुथुकोया थंगल और समस्थ की दो टूक नसीहत

मुख्यमंत्री द्वारा इस्लामिक इतिहास के संदर्भ देकर धर्मगुरु को कठघरे में खड़ा करना केरल के रूढ़िवादी धार्मिक नेतृत्व को नागवार गुजरा। केरल के सबसे बड़े और प्रभावशाली मुस्लिम संगठन 'समस्थ केरल जम-इय्यतुल उलमा' के प्रमुख जिफरी मुथुकोया थंगल और कांथापुरम गुट के शीर्ष विद्वानों ने मुख्यमंत्री के रुख पर गहरा ऐतराज जताया। गुरुवार को मुख्यमंत्री कार्यालय में हुई एक पूर्व-निर्धारित बैठक के दौरान यह मुद्दा सबसे गरमा-गरम बहस का केंद्र बन गया।

बैठक के बाद समस्थ अध्यक्ष जिफरी मुथुकोया थंगल ने मीडिया के सामने बिना नाम लिए मुख्यमंत्री पर सीधा तंज कसा। थंगल ने कहा, "शरिया कानून हर काल, हर दौर और हर सदी में पूरी तरह प्रासंगिक और मान्य है, क्योंकि यह पवित्र कुरान का फैसला है। लोकतंत्र में किसी व्यक्ति को इसे मानने या न मानने की व्यक्तिगत आजादी हो सकती है, लेकिन जिम्मेदार और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को धार्मिक विद्वानों का उपहास उड़ाने या उन पर कटाक्ष करने से बचना चाहिए।" वहीं, समस्थ नेता नासर फैजी कूड़ाथयी ने धर्मगुरु का बचाव करते हुए कहा कि उनके बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है। उन्होंने कहा कि मौलवी महिलाओं के खिलाफ नहीं थे, बल्कि वे महिलाओं के व्यवसायीकरण और उन्हें नुमाइश की वस्तु बनाए जाने के खिलाफ बोल रहे थे। इस्लामिक स्कॉलर्स ने दो टूक शब्दों में कहा कि धर्म क्या है और धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या कैसे होनी चाहिए, यह तय करना किसी निर्वाचित सरकार या मुख्यमंत्री का काम नहीं है। मुख्यमंत्री को केवल प्रशासनिक व्यवस्था और सुशासन पर ध्यान देना चाहिए।

सहयोगी दल मुस्लिम लीग (IUML) का संशय: सादिक अली थंगल की 'सुरक्षा' वाली दलील

इस पूरे प्रकरण ने केरल के सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर भी एक असहज स्थिति पैदा कर दी है। कांग्रेस के नेतृत्व वाले मोर्चे में सबसे अहम सहयोगी दल 'इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग' (IUML) धर्मगुरु के बयान की सीधी निंदा करने से पूरी तरह बचता हुआ नजर आया। मुस्लिम लीग पारंपरिक रूप से रूढ़िवादी धार्मिक हलकों और आधुनिक राजनीति के बीच संतुलन साधने का काम करती रही है, लेकिन इस बार वह पूरी तरह रक्षात्मक मुद्रा में आ गई।

आईयूएमएल के प्रदेश अध्यक्ष और प्रभावशाली धार्मिक नेता पानाकड़ सैयद सादिक अली शिहाब थंगल ने धर्मगुरु के बयान को सही ठहराने की कोशिश करते हुए इसे महिलाओं की 'सुरक्षा' से जोड़ दिया। सादिक अली थंगल ने कहा, "आज के आधुनिक समाज में महिलाएं सबसे ज्यादा अपराध और हमलों का शिकार हो रही हैं। संभवतः मौलवी साहब ने वर्तमान सामाजिक हालात और महिलाओं की सुरक्षा की गहरी चिंता को ध्यान में रखकर यह बात कही होगी। एक धार्मिक नेता के रूप में समाज और कौम की एकता बनाए रखना सबसे महत्वपूर्ण है।" मुस्लिम लीग के मंत्रियों ने भी इस संवेदनशील मुद्दे पर खुलकर कोई टिप्पणी करने से किनारा कर लिया, जिससे यह साफ हो गया कि वोट बैंक के दबाव में सहयोगी दल धर्मगुरु का सीधा विरोध करने का साहस नहीं जुटा पा रहा है।

केरल की प्रगतिशील छवि और मुस्लिम महिलाओं की भागीदारी: ओणम से लेकर स्थानीय निकायों तक

केरल की सामाजिक पृष्ठभूमि में यह विवाद इसलिए भी बहुत बड़ा रूप ले चुका है क्योंकि राज्य देश भर में 100 प्रतिशत साक्षरता, उच्च जीवन स्तर और महिला सशक्तिकरण का सबसे बड़ा मॉडल माना जाता है। पिछले कुछ दशकों में केरल की मुस्लिम महिलाओं ने सार्वजनिक, सामाजिक और राजनीतिक फलक पर अभूतपूर्व प्रगति की है।

केरल के त्रि-स्तरीय पंचायती राज और स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण लागू होने के बाद हजारों की संख्या में मुस्लिम महिलाएं ग्राम प्रधान, ब्लॉक प्रमुख, जिला पंचायत अध्यक्ष और नगर पालिका अध्यक्ष के रूप में सफल प्रशासनिक नेतृत्व दे रही हैं। हाल ही में राज्य भर के कॉलेजों और दफ्तरों में मनाए गए ओणम उत्सव के दौरान भी मुस्लिम छात्राओं और कामकाजी महिलाओं ने पारंपरिक परिधानों में बढ़-चढ़कर सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लिया था। ऐसे में जब किसी बड़े धर्मगुरु की ओर से महिलाओं को घर के भीतर कैद रहने का फरमान आता है, तो वह केरल की आधुनिक और प्रगतिशील चेतना से सीधे टकराता है। कई युवा मुस्लिम महिलाओं, महिला वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने सोशल मीडिया पर अभियान चलाकर मौलवी की इस संकीर्ण सोच का खुलकर विरोध किया है और मुख्यमंत्री सतीशन के साहसिक स्टैंड का समर्थन किया है।

सियासी तपिश और आगे की राह: क्या आस्था की व्याख्या पर बैकफुट पर आएंगे मुख्यमंत्री?

विपक्ष में बैठी माकपा (CPI-M) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने भी इस पूरे विवाद पर तीखी राजनीतिक प्रतिक्रिया दी है। माकपा के वरिष्ठ नेता एम. ए. बेबी ने धर्मगुरु के बयान को संविधान विरोधी और लैंगिक समानता की भावना पर हमला बताते हुए कहा कि यह सोच दक्षिणपंथी संगठनों की विचारधारा से मेल खाती है। वहीं भाजपा ने इसे मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति का नतीजा बताते हुए कहा कि वह महिलाओं के संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए हर स्तर पर संघर्ष करेगी।

उधर, धार्मिक स्कॉलर्स द्वारा सीएम पर हमला बोले जाने और माफी की मांग किए जाने के बावजूद मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन अपने प्रगतिशील रुख पर मजबूती से डटे हुए हैं। सूत्रों का कहना है कि सीएम कार्यालय ने साफ कर दिया है कि वे 21वीं सदी के लोकतांत्रिक मूल्यों और लैंगिक समानता के पक्ष में खड़े हैं और महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। केरल में छिड़ा यह वैचारिक संग्राम केवल एक नेता और धर्मगुरु के बीच की जुबानी जंग नहीं है, बल्कि यह इस बड़े सवाल का इम्तिहान है कि क्या आज के लोकतांत्रिक भारत में धार्मिक रूढ़िवादिता महिला सशक्तिकरण की रफ्तार को रोक पाएगी, या फिर आधुनिक संवैधानिक अधिकार धार्मिक सीमाओं को लांघकर हर महिला को उसकी आजादी दिलाएंगे।