'14-15 करोड़ लोगों को हटा दिया!': SIR अभियान पर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैशी का चुनाव आयोग पर तीखा तंज
देश के विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूचियों के शुद्धिकरण के नाम पर चलाए जा रहे 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) अभियान को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद लगातार गहराता जा रहा है। भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (पूर्व CEC) एस. वाई. कुरैशी ने चुनाव आयोग (ECI) की कार्यप्रणाली और बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम सूची से गायब होने पर बेहद तीखा हमला बोला है। न्यूज एजेंसी एएनआई (ANI) से बातचीत करते हुए उन्होंने तंज कसा कि चुनाव आयोग ने इस विशेष अभियान के जरिए देश की लगभग 14 से 15 करोड़ आबादी को मतदाता सूची से बाहर करने का 'कठिन मिशन' पूरा कर दिखाया है। उन्होंने आयोग को चुनौती देते हुए कहा कि जिस मुख्य उद्देश्य यानी 'अवैध प्रवासियों' की पहचान के लिए यह भारी-भरकम कवायद शुरू की गई थी, आयोग को सार्वजनिक करना चाहिए कि आखिरकार उन्हें कितने अवैध विदेशी नागरिक मिले।
'जो जनसंख्या आयोग नहीं कर सका, वह चुनाव आयोग ने कर दिखाया': कुरैशी का कटाक्ष
एस. वाई. कुरैशी ने चुनाव आयोग द्वारा बड़े स्तर पर वोटरों के नाम हटाए जाने को लोकतंत्र से खिलवाड़ करार दिया। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि चुनाव आयोग को इस सफलता के लिए बधाई मिलनी चाहिए।
पूर्व सीईसी ने कहा—"मैं चुनाव आयोग को भारत की लगभग 14-15 करोड़ आबादी को इस कसरत के जरिए बाहर करने का मुश्किल काम पूरा करने के लिए बधाई देना चाहता हूं। मुझे नहीं पता कि उन्हें कितने अवैध प्रवासी मिले, जो इस पूरी प्रक्रिया का घोषित मुख्य उद्देश्य था। दुख की बात है कि उन्होंने इस आंकड़े का अब तक खुलासा नहीं किया है। मैं आयोग से अनुरोध करूंगा कि वे इस आंकड़े के साथ सामने आएं ताकि देश को पता चले कि आप कितने सफल रहे हैं। आपने वह कर दिखाया जो राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग (National Population Commission) भी नहीं कर सका। भारत की 15% आबादी को हटाकर आपने जनसंख्या नियंत्रण में बड़ा योगदान दिया है।'
'मतदान संवैधानिक अधिकार है, चुनाव आयोग की खैरात नहीं'
कुरैशी ने एसआईआर (SIR) अभियान की मंशा और कानूनी वैधता पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि यह पूरी कवायद सही नीयत से नहीं की जा रही है।
उन्होंने संविधान के प्रावधानों का हवाला देते हुए याद दिलाया:
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अनुच्छेद 326 का हवाला: संविधान का अनुच्छेद 326 स्पष्ट रूप से हर वयस्क भारतीय नागरिक को मतदाता के रूप में पंजीकृत होने और मताधिकार का उपयोग करने की गारंटी देता है।
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आयोग की खैरात नहीं वोट का हक: उन्होंने कहा कि वोट डालना प्रत्येक नागरिक का बुनियादी संवैधानिक अधिकार है। यह चुनाव आयोग द्वारा दी गई कोई 'खैरात' या दान नहीं है जिसे वह अपनी मर्जी से किसी से भी छीन ले। करोड़ों पात्र वोटरों के नाम ड्राफ्ट लिस्ट से काटकर बाहर करना लोकतांत्रिक ढांचे को हिलाने जैसा है।
क्या है SIR अभियान और क्यों उपजा यह विवाद?
चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने देश भर के राज्यों में 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (विशेष गहन पुनरीक्षण) अभियान की घोषणा की थी।
आयोग का आधिकारिक तर्क यह था कि:
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मतदाता सूची को शत-प्रतिशत सटीक, अद्यतन और त्रुटिरहित बनाना।
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दोहरी प्रविष्टियों (Duplicate Entries), मृत मतदाताओं के नाम हटाना और गैर-नागरिकों या अवैध प्रवासियों की पहचान कर उन्हें बाहर करना।
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बड़े पैमाने पर होने वाले पलायन (Migration) और सत्यापन के दौरान घरों में ताले लटके मिलने के कारण नामों को अस्थायी रूप से हटाना।
हालांकि, जैसे-जैसे राज्यों की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट सामने आ रही है, वैसे-वैसे इस पर सवाल खड़े हो रहे हैं। खासतौर पर महाराष्ट्र में हाल ही में जारी एसआईआर की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में कुल 9.78 करोड़ मतदाताओं में से करीब 2.07 करोड़ नाम (लगभग 21%) घट गए, जिससे विपक्ष ने सीधे तौर पर 'वोट चोरी' का आरोप लगाया था।
चुनाव आयोग का रुख: ड्राफ्ट लिस्ट अंतिम निष्कासन नहीं
विवाद बढ़ने के बीच चुनाव आयोग के अधिकारियों का कहना है कि ड्राफ्ट लिस्ट का मतलब अंतिम निष्कासन नहीं होता है।
आयोग के अनुसार, जो मतदाता अनुपस्थित (Absent), स्थानांतरित (Shifted) या फॉर्म जमा न होने के कारण ड्राफ्ट सूची में शामिल नहीं हो पाए हैं, उनके पास पर्याप्त समय है। पात्र नागरिक फॉर्म 6 (Form 6) भरकर दोबारा अपना नाम जुड़वाने के लिए दावा और आपत्ति दर्ज करा सकते हैं, जिसके बाद ही अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जाएगी। इसके बावजूद, चुनाव आयोग के ही पूर्व प्रमुख द्वारा इस प्रक्रिया पर तंज कसते हुए 14-15 करोड़ लोगों के नाम गायब होने का मुद्दा उठाने से निर्वाचन प्रणाली की निष्पक्षता को लेकर एक नया राष्ट्रीय विमर्श छिड़ गया है।